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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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भूमिका १३
प्रत्यक्ष-विरुद्ध है, अतः विनाश-परम्परा का कहीं विश्राम मानना आवश्यक है।
जहाँ पर उसका विश्राम होगा उसको ही 'परमाणु' कहते हैं । इसे मान लेने पर
राई और पर्वत के समान परिमाण का प्रसङ्ग उपस्थित नहीं होता है; क्योंकि
दोनों के परमाणुओं में संख्या का तारतम्य ही दोनों के परिमाण में भी न्यूनाधिक
का ज्ञापक होगा । परमाणु को नित्य मानना भी आवश्यक है; क्योंकि परमाणुओं
को अनित्य मानने पर ऐसे द्रव्य रूप कार्यों को भी मानना पड़ेगा, जिनके अवयव
नहीं हैं; किन्तु यह प्रत्यक्ष विरुद्ध होने के कारण उचित नहीं है । इस प्रकार दो
परमाणुओं से द्वयणुक और तीन द्वयणुक से त्र्यसरेणु वा त्र्यणुक की उत्पत्ति होती
है । त्र्यसरेणु में महत्त्व आ जाता है । फिर आगे की सृष्टि होती है । वैशेषिकमत
के अनुसार अवयवों से जिस अवयवी की उत्पत्ति होती है, वह अवयवों से सर्वथा
भिन्न वस्तु है और उत्पत्ति से पूर्व उसकी और किसी रूप में सत्ता नहीं रहती है ।
इसी को 'असत्कार्यवाद' या 'आरम्भवाद' कहते हैं ।
आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन इन पाँच द्रव्यों का प्रत्यक्ष नहीं होता
है । अतः इनके विवरण से पहले इनकी सत्ता में अनुमान को प्रमाण रूप में
उपस्थित करने की आवश्यकता होती है; क्योंकि सभी शब्दप्रमाणों में सभी की
आस्था नहीं होती । किसी वस्तु की सत्ता को जहाँ अनुमान के द्वारा स्थापित
करना होता है, वहाँ थोड़ा कौशल का अवलम्बन आवश्यक होता है; क्योंकि सीधे
विवादास्पद वस्तु को पक्ष बनाकर अनुमान को उपस्थित नहीं किया जा सकता;
जैसे कि 'आकाशः अस्ति, शब्दाश्रयत्वात्' यह अनुमान नहीं हो सकता, क्योंकि
पक्ष को अपने स्वरूप (पक्षतावच्छेदक) से युक्त होकर पहले से सिद्ध रहना चाहिए ।
जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' इत्यादि स्थलों में पर्वतत्वादि से युक्त पर्वतादि पहले
प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध रहता है । अतः इस प्रकार के स्थलों में परिशेषानुमान का
अवलम्बन करना पड़ता है ।
आकाश नाम के एक स्वतन्त्र द्रव्य के साधक परिशेषानुमानों की परम्परा इस
प्रकार है कि चक्षु से न दीखनेवाले, अथ च रसनादि और बाह्य इन्द्रियों से गृहीत
होनेवाले गुण सामान्य गुण नहीं होते, विशेष गुण ही होते हैं-यह बात स्पर्श को
दृष्टान्त मानकर अच्छी तरह समझी जा सकती है; क्योंकि स्पर्शगुण का चक्षु से
ग्रहण नहीं हो सकता, अथ च वह त्वचा रूप बहिरिन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः
वह विशेष गुण है ।
इसी प्रकार शब्द भी विशेष गुण ही है; क्योंकि उसका ग्रहण चक्षु से नहीं हो
सकता, अथ च श्रोत्र रूप बहिरिन्द्रिय से उसका ग्रहण होता है । अतः शब्द
विशेष गुण ही है, सामान्य गुण नहीं । यह पहले सिद्धवत् समझ लेना चाहिए कि
दिक्, काल और मन इन तीन द्रव्यों में विशेष गुण नहीं रहते, अतः शब्द