वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in contextभूमिका १९
मान लेने पर ज्ञान-सुखादि का प्रत्यक्ष न हो सकेगा; क्योंकि गुणप्रत्यक्ष के प्रति
आश्रय का महत्त्व भी कारण है, चूँकि मन अणु है, अतः उसमें रहनेवाले
ज्ञानसुखादि का प्रत्यक्ष संभव नहीं होगा। तस्मात् मन भी आत्मा नहीं है। अतः
पृथिव्यादि आठों द्रव्यों से अतिरिक्त आत्मा नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य मानना
आवश्यक है।
यह आत्मा ईश्वर और जीव भेद से दो प्रकार का है। ईश्वर एक ही
है और सर्वज्ञत्वादि गुणों से विभूषित है। जीव अदृष्टादि गुणों के द्वारा बद्ध
है और प्रत्येक शरीर में अलग-अलग होने के कारण अनन्त है। मन रूप नवम
द्रव्य के प्रसङ्ग में जानने योग्य सभी बातें आत्मनिरूपण के प्रसङ्ग में अधिकतर कह
दी गयी हैं।
गुण
रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व,
अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, यल, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म,
अधर्म और शब्द ये चौबीस गुण हैं।
रूप
केवल आँखों से ही दीखने वाला गुण 'रूप' है। द्रव्य भी वही आँखों से देखा
जाता है जिसमें कि रूप हो। आकाशादि में रूप नहीं है, अतः वे नहीं देखे
जाते। सुतरां द्रव्य के चाक्षुष प्रत्यक्ष में भी रूप सहायककारण है। केवल
द्रव्य ही नहीं जिस किसी का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष हो-रूप किसी न किसी प्रकार
अपेक्षित होगा ही। फलतः चक्षु से सभी ज्ञानकार्यों के सम्पादन में रूप
सहायककारण है। यह शुक्ल, नील, पीत, हरित, रक्त, कपिश और चित्र भेद
से सात प्रकार का है।
चित्र रूप के प्रसङ्ग में कुछ विवाद है। कुछ लोग कथित नीलादि रूपों से भिन्न
चित्र नाम का कोई अतिरिक्त रूप नहीं मानते। सिद्धान्तियों का कहना है कि
संयोग की तरह रूप अपने किसी आश्रय के एक अंश में रहे और दूसरे अंश में
नहीं-ऐसा नहीं होता (रूप अव्याप्यवृत्ति नहीं है); किन्तु रूप अपने आश्रय के
सभी अंशों में रहता है (अतः वह व्याप्यवृत्ति है)। इस नियम के अनुसार जो
छींट प्रभृति अनेक रङ्गों के कपड़े हैं, उनमें कोई रूप सभी अंशों में नहीं है; किन्तु
वे सभी रूपवाले द्रव्य हैं; क्योंकि उनका चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है। तस्मात् उनमें
नीलादि से भिन्न कोई रूप मानना पड़ेगा। वही चित्र रूप है।
पृथिवी में ये सभी रूप रहते हैं। जल और तेज इन दोनों में केवल शुक्ल
रूप ही है। शुक्ल रूप को छोड़कर और किसी रूप का अवान्तर वास्तविक भेद