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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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॥ श्रीः ॥
विज्ञप्तिः
[ प्रथमसंस्करणस्य ]
गङ्गानाथान् गुरून् नत्वा बहुग्रन्थानुवादकान् ।
तन्नाम्ना ग्रन्थमालायाः प्रक्रमं करवाण्यहम् ॥
प्रशस्तपादभाष्यस्य कन्दलीटीकया सह ।
प्रकाशः क्रियतेऽस्माभिरनूद्य देशभाषया ॥
संशोधनं कृतं यत्नैर्हिन्दीभाषानुवादिना ।
अस्मत्सहायकेनैव श्रीदुर्गाधरशर्मणा ॥
लिखिता भूमिकाय्येका न्यायशास्त्रविदाऽमुना ।
वैशेषिकपदार्थानां सम्यग् बोधो यथा भवेत् ॥
मालायाः सुमनश्चायं सौमनस्यं प्रसारयेत् ।
प्रार्थना काशिकापुर्यां क्षेत्रेशचन्द्रशर्मणः ॥
शास्त्रज्ञ पण्डितों के अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त अथवा हिन्दी भाषा के
वेत्ता साधारण बुद्धिमान् जनता में अथवा विद्वानों में प्राचीन भारतीय दर्शनों के
प्रति विशेष रुचि आजकल पाई जाती है; परन्तु संस्कृत-भाषा में पूर्ण ज्ञान न होने
के कारण वे मूल ग्रन्थों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं । इस त्रुटि की पूर्ति के
लिए यह आवश्यक है कि हमारे मुख्य-मुख्य दार्शनिक तथा अन्य शास्त्रों के ग्रन्थों
का प्रामाणिक अनुवाद के साथ प्रकाशन हो, जैसे ग्रीक तथा लातिन भाषा की
लोएब क्लैसिकल लाइब्रेरी (LOEB CLASSICAL LIBRARY) में हुआ है ।
काशी से प्रकाशित 'अच्युतग्रन्थमाला' ने अंशतः यह कार्य किया है; परन्तु इस
ग्रन्थमाला में कुछ ही शास्त्रों का समावेश हुआ । यह ग्रन्थमाला भी इधर बन्द हो
गई ।
सन् १९५८ में काशी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के "वाराणसेय संस्कृत
विश्वविद्यालय" में परिणत होने पर अनुसन्धान संचालक के पद पर जब
मेरी नियुक्ति हुई, मैंने प्रथम उपकुलपति श्री आदित्यनाथ झा जी से प्रार्थना की
कि ऐसी एक ग्रन्थमाला हम भी प्रकाशित करें और उन्होंने इस प्रस्ताव को
स्वीकृत किया । ग्रन्थमाला का नाम रखा गया 'गङ्गानाथझा-ग्रन्थमाला' । इस
नामकरण के दो कारण थे-(१) हमारे दिवङ्गत गुरु विद्यासागर महामहोपाध्याय