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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

तैत्तिरीय उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की प्रमुख उपनिषद् है। गीताप्रेस के 'निवेदन' में स्पष्ट किया गया है कि तैत्तिरीय आरण्यक के सातवें, आठवें और नवें प्रपाठक ही तैत्तिरीय उपनिषद् हैं। सातवाँ प्रपाठक शीक्षावल्ली है, जिसे सांहिती उपनिषद् कहा जाता है, और आठवाँ तथा नवाँ, अर्थात् ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली, वारुणी उपनिषद् कहलाते हैं। 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' की परिभाषा, अन्नमय से आनन्दमय तक पाँच कोशों का विवेचन और भृगु को वरुण का उपदेश इसी उपनिषद् में हैं, और दीक्षान्त का प्रसिद्ध उपदेश 'सत्यं वद, धर्मं चर' भी शीक्षावल्ली में आता है।

यह गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण है, जिसमें मूल मन्त्र, उनका अर्थ, आदि शङ्कराचार्य का भाष्य और भाष्य का हिन्दी अनुवाद एक साथ दिए गए हैं। प्रकाशन-पृष्ठ के अनुसार इसका प्रथम संस्करण संवत् १९९३ में और तीसरा संवत् २००० में छपा। अन्त में मन्त्रों की वर्णानुक्रमणिका है। यह प्रति देवप्रयाग के पं. चक्रधर जोशी के संग्रह से आई है।

लगभग २६१ पृष्ठों का यह ग्रन्थ शाङ्कर वेदान्त को मूल उपनिषद् के साथ पढ़ने वालों के लिए उपयोगी है।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri