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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished261 pages

About this granth

The Taittiriya Upanishad (तैत्तिरीयोपनिषद्) is the principal Upanishad of the Krishna Yajurveda. The Gita Press foreword explains that it consists of the seventh, eighth and ninth prapathakas of the Taittiriya Aranyaka: the Shiksha Valli, and the Brahmananda and Bhrigu Vallis. It contains the definition of Brahman as truth, knowledge and infinity, the teaching of the five sheaths from the physical to the blissful, Varuna's instruction to Bhrigu, and the well-known graduation address beginning 'speak the truth, follow dharma'.

This Gita Press, Gorakhpur, edition gives each mantra with its meaning, Adi Shankaracharya's commentary and a Hindi translation of the commentary. The imprint records a first edition in Samvat 1993 and a third in Samvat 2000. An alphabetical index of mantras closes the book. The copy comes from the collection of Pt. Chakradhar Joshi of Devprayag.

The volume has about 261 pages.

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖ ─── ❖
समाज्ञाः, आध्यात्मिक्यः समाज्ञा | रहनेवाली समाज्ञा है, अर्थात् यह
ज्ञानानि विज्ञानान्युपासनानी- | आध्यात्मिक समाज्ञा-ज्ञान-विज्ञान
त्यर्थः । | यानी उपासना है-यह इसका तात्पर्य है ।
अथानन्तरं दैवीर्दैवत्यो देवेषु | अब इसके पश्चात् दैवी-देव-
'दैवी समाज्ञा' भवाः समाज्ञा उ- | सम्बन्धिनी अर्थात् देवताओंमें होने-
च्यन्ते । तृप्तिरिति | वाली समाज्ञा कही जाती है । तृप्ति
वृष्टौ । वृष्टेरन्नादिद्वारेण तृप्ति- | इस भावसे वृष्टिमें [ ब्रह्मकी उपासना
हेतुत्वाद्व्रह्मैव तृप्त्यात्मना वृष्टौ | करे ] । अन्नादिके द्वारा वृष्टि तृप्ति-
व्यवस्थितमित्युपास्यम् । तथान्येषु | का कारण है । अतः तृप्तिरूपसे
तेन तेनात्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । | ब्रह्म ही वृष्टिमें स्थित है-इस प्रकार
तथा बलरूपेण विद्युति ॥ २ ॥ | उसकी उपासना करनी चाहिये ।
यशोरूपेण पशुषु । ज्योतीरूपेण | इसी प्रकार अन्य पर्यायोंमें भी उन-
नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतममृतत्व- | उनके रूपसे ब्रह्मकी ही उपासना
प्राप्तिः पुत्रेण ऋणविमोक्षद्वारेणा- | करनी चाहिये । अर्थात् बलरूपसे
नन्दः सुखमित्येतत्सर्वमुपस्थनि- | विद्युत्में ॥ २ ॥ यशरूपसे पशुओंमें,
मिक्तं ब्रह्मैवानेनात्मनोपस्थे प्रति- | ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, प्रजाति
ष्ठितमित्युपास्यम् । | ( पुत्रादि प्रजा ) अमृत-अर्थात् पुत्र-
सर्वं ह्याकाशे प्रतिष्ठितमतो | द्वारा पितृऋणसे मुक्त होनेके द्वारा
यत्सर्वमाकाशे तद्ब्रह्मैवेत्युपास्यम् । | अमृतत्वकी प्राप्ति और आनन्द-सुख
तच्चाकाशं ब्रह्मैव । तस्मात्तत् | ये सब उपस्थके निमित्तसे ही
| होनेवाले हैं; अतः इनके रूपसे
| ब्रह्म ही उपस्थमें स्थित है-इस प्रकार
| उसकी उपासना करनी चाहिये ।
| सब कुछ आकाशमें ही स्थित
| है । अतः आकाशमें जो कुछ है
| वह सब ब्रह्म ही है-इस प्रकार
| उसकी उपासना करनी चाहिये ।
| तथा वह आकाश भी ब्रह्म ही है ।
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२३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३


[मूल एवं संस्कृत-टीका]

सर्वस्य प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठा-
गुणोपासनात्प्रतिष्ठावान्भवति ।
एवं पूर्वेष्वपि यद्यत्तदधीनं फलं
तद्ब्रह्मैव तदुपासनात्तद्वान्भवतीति
द्रष्टव्यम् । श्रुत्यन्तराच्च—"तं
यथा यथोपासते तदेव भवति"
इति ।
तन्मह इत्युपासीत । महो
महत्त्वगुणवत्तदुपासीत । महान्
भवति । तन्मन इत्युपासीत ।
मननं मनः । मानवान्भवति
मननसमर्थो भवति ॥ ३॥ तन्नम
इत्युपासीत । नमनं नमो नमन-
गुणवत्तदुपासीत । नम्यन्ते प्रह्ली-
भवन्त्यस्मा उपासित्रे कामाः
काम्यन्त इति भोग्या विषया
इत्यर्थः ।


[हिन्दी अनुवाद]

अतः वह सबकी प्रतिष्ठा (आश्रय) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे।
प्रतिष्ठा गुणवान् ब्रह्मकी उपासना करनेसे उपासक प्रतिष्ठावान् होता
है । ऐसा ही पूर्व सब पर्यायोंमें समझना चाहिये । जो-जो उसके
अधीन फल है वह ब्रह्म ही है । उसकी उपासनासे पुरुष उसी फलसे
युक्त होता है—ऐसा जानना चाहिये। यही बात “जिस-जिस प्रकार उसकी
उपासना करता है वह (उपासक) वही हो जाता है" इस एक दूसरी
श्रुतिसे प्रमाणित होती है ।
वह महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । महः अर्थात् महत्त्व
गुणवाला है—ऐसे भावसे उसकी उपासना करे । इससे उपासक
महान् हो जाता है । वह मन है—इस प्रकार उसकी उपासना करे।
मननका नाम मन है । इससे वह मानवान्—मननमें समर्थ हो जाता है
॥३॥ वह नमः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । नमनका नाम ‘नमः’
है अर्थात् उसे नमन-गुणवान् समझकर उपासना करे । इससे उस
उपासकके प्रति सम्पूर्ण काम—जिनकी कामना की जाय वे भोग्य विषय
नत अर्थात् विनम्र हो जाते हैं ।


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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७

तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्म परि- | वह ब्रह्म है-इस प्रकार उसकी
वृढतममित्युपासीत । ब्रह्मवांस्तद्- | उपासना करे । ब्रह्म यानी सबसे
गुणो भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर | बढ़ा हुआ है-इस प्रकार उपासना
इत्युपासीत । ब्रह्मणः परिमरः | करे । इससे वह ब्रह्मवान्-ब्रह्मके-से
परिम्रियन्तेऽस्मिन्पञ्च देवता | गुणवाला हो जाता है । वह ब्रह्मका
विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदि- | परिमर है-इस प्रकार उसकी
त्योऽग्निरित्येताः । अतो वायुः | उपासना करे । ब्रह्मका परिमर-
परिमरः श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः । स | जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य
एष एवार्थं वायुराकाशेनानन्य | और अग्नि-ये पाँच देवता मृत्युको
इत्याकाशो ब्रह्मणः परिमरः | प्राप्त होते हैं उसे परिमर कहते हैं;
तमाकाशं वाय्वात्मानं ब्रह्मणः | अतः वायु ही परिमर है, जैसा कि
परिमर इत्युपासीत । | [ "वायुर्वाव संवर्गः" इस ] एक
| अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वही
एनमेवंविदं प्रतिस्पर्धिनो | यह वायु आकाशसे अभिन्न है, इसलिये
द्विषन्तोऽद्विषन्तोऽपि सपत्ना यतो | आकाश ही ब्रह्मका परिमर है । अतः
भवन्त्यतो विशेष्यन्ते द्विषन्तः | वायुरूप आकाशकी 'यह ब्रह्मका
सपत्ना इति, एनं द्विषन्तः | परिमर है' इस भावसे उपासना करे ।
सपत्नास्ते परिम्रियन्ते प्राणाञ्ज- |
हति । किं च ये चाप्रिया अस्य | इस प्रकार जाननेवाले इस
भ्रातृव्या अद्विषन्तोऽपि ते च | उपासकके द्वेष करनेवाले प्रतिपक्षी-
परिम्रियन्ते । | क्योंकि प्रतिपक्षी द्वेष न करनेवाले
| भी होते हैं इसलिये यहाँ 'द्वेष
| करनेवाले' यह विशेषण दिया गया
| है-मर जाते हैं अर्थात् प्राण त्याग
| देते हैं । तथा इसके जो अप्रिय
| भ्रातृव्य होते हैं वे, द्वेष करनेवाले
| न होनेपर भी, मर जाते हैं ।

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२३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

[वाम स्तम्भ - संस्कृत]
'प्राणो वा अन्नं शरीरमन्ना-
दमू' इत्यारभ्याका-
शान्तस्य कार्यस्यै-
वान्नान्नादत्वमुक्तम् ।
उक्तं नाम किं तेन ?
तेनैतत्सिद्धं भवति—कार्य-
विषय एव भोज्यभोक्तृत्वकृतः
संसारो न त्वात्मनीति । आत्मनि
तु भ्रान्त्योपचर्यते ।
नन्वात्मापि परमात्मनः कार्यं
ततो युक्तस्तस्य संसार इति ।
न; असंसारिण एव प्रवेश-
श्रुतेः । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि-
शत्” ( तै० उ० २ । ६ । १ )
इत्याकाशादिकारणस्य ह्यसंसा-
रिण एव परमात्मनः कार्येष्वनु-
प्रवेशः श्रूयते । तस्मात्कार्यानु-
प्रविष्टो जीव आत्मा पर एव
असंसारी । सृष्ट्वानुप्राविशदिति
समानकर्तृकत्वोपपत्तेश्च । सर्ग-
[हाशिये में टिप्पणी: आत्मनोऽसंसारित्वस्थापनम्]


[दक्षिण स्तम्भ - हिन्दी]
'प्राण ही अन्न है और शरीर
अन्नाद है' यहाँसे लेकर आकाशपर्यन्त
कार्यवर्गका ही अन्न और अन्नादत्व
प्रतिपादन किया गया है ।
पूर्व०—कहा गया है—सो इससे
क्या हुआ ?
सिद्धान्ती—इससे यह सिद्ध
होता है कि भोज्य और भोक्ताके
कारण होनेवाला संसार कार्यवर्गसे
ही सम्बन्धित है, वह आत्मामें नहीं
है; आत्मामें तो भ्रान्तिवश उसका
उपचार किया जाता है ।
पूर्व०—परन्तु आत्मा भी तो
परमात्माका कार्य है । इसलिये उसे
संसारकी प्राप्ति होना उचित ही है ।
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्रवेश-
श्रुति असंसारीका ही प्रवेश प्रति-
पादन करती है । “उसे रचकर वह
पीछेसे उसीमें प्रविष्ट हो गया” इस
श्रुतिद्वारा आकाशादिके कारणरूप
असंसारी परमात्माका ही कार्योंमें
अनुप्रवेश सुना गया है । अतः
कार्यमें अनुप्रविष्ट जीवात्मा असंसारी
परमात्मा ही है । 'रचकर पीछेसे
प्रविष्ट हो गया' इस वाक्यसे एक
ही कर्ता होना सिद्ध होता है । यदि

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९
प्रवेशक्रिययोश्चैकश्चेत्कर्ता ततः | सृष्टि और प्रवेशक्रियाका एक ही
क्त्वाप्रत्ययो युक्तः । | कर्त्ता होगा तभी ‘क्त्वा’ प्रत्यय होना
| युक्त होगा ।
प्रविष्टस्य तु भावान्तरापत्ति- | पूर्व०–प्रवेश कर लेनेपर उसे
रिति चेत् ? | दूसरे भावकी प्राप्ति हो जाती है–
| ऐसा माने तो ?
न; प्रवेशस्यान्यार्थत्वेन | सिद्धान्ती–नहीं, क्योंकि प्रवेश-
| का प्रयोजन दूसरा ही है–ऐसा
प्रत्याख्यातत्वात् । “अनेन जीवे- | कहकर हम इसका पहले ही
| निराकरण कर चुके हैं ।* यदि
नात्मना” (छा० उ० ६ । ३ | कहो कि “अनेन जीवेन आत्मना”
२) इति विशेषश्रुतेर्धर्मान्तरेणा- | इत्यादि विशेष श्रुति होनेके कारण
| उसका धर्मान्तररूपसे ही प्रवेश
नुप्रवेश इति चेत् ? न; “तत्त्वमसि” | होता है–तो ऐसा कहना ठीक नहीं;
| क्योंकि “वह तू है” इस श्रुतिद्वारा
इति पुनस्तद्भावोक्तेः । भावा- | पुनः उसकी तद्रूपताका वर्णन किया
| गया है। और यदि कहो कि भावान्तर-
न्तरापन्नस्यैव तदपोहार्था संप- | को प्राप्त हुए ब्रह्मके उस भावका
| निषेध करनेके लिये ही वह केवल
दिति चेत् ? न; “तत्सत्यं स | दृष्टिमात्र कही गयी है तो ऐसी बात
| भी नहीं है; क्योंकि “वह सत्य है,
आत्मा तत्त्वमसि” (छा० उ० | वह आत्मा है, वह तू है” इत्यादि
| श्रुतिसे उसका परमात्माके साथ
६ । ८–१६) इति सामानाधि- | सामानाधिकरण्य सिद्ध होता है ।
करण्यात् । |
दृष्टं जीवस्य संसारित्वमिति | पूर्व०–जीवका संसारित्व तो
चेत् ? | स्पष्ट देखा है ।

  • देखिये ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ६ का भाष्य ।
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२४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

न; उपलब्धुरनुपलभ्यत्वात् । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि जो
| ( जीव ) सबका द्रष्टा है वह देखा
| नहीं जा सकता ।
संसारधर्मविशिष्ट आत्मोप- | पूर्व०—सांसारिक धर्मोंसे युक्त
लभ्यत इति चेत् ? | आत्मा तो उपलब्ध होता ही है ?
न; धर्माणां धर्मिणोऽव्यति- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है;
| क्योंकि धर्म अपने धर्मीसे अभिन्न
रेकात्कर्मत्वानुपपत्तेः, उष्णप्र- | होते हैं अतः वे उसके कर्म नहीं
| हो सकते, जिस प्रकार कि [ सूर्यके
काशयोर्दाह्यप्रकाश्यत्वानुपपत्ति- | धर्म ] उष्ण और प्रकाशका दाह्यत्व
| और प्रकाश्यत्व सम्भव नहीं है ।
वत् । त्रासादिदर्शनाद्दुःखित्वा- | यदि कहो कि भय आदि देखनेसे
| आत्माके दुःखित्व आदिका अनुमान
द्यनुमीयत इति चेत् ? न; त्रासा- | होता ही है—तो ऐसा कहना भी
| ठीक नहीं; क्योंकि भय आदि दुःख
देर्दुःखस्य चोपलभ्यमानत्वान्नो- | उपलब्ध होनेवाले होनेके कारण
| उपलब्ध करनेवाले [ आत्मा ] के
पलब्धृधर्मत्वम् । | धर्म नहीं हो सकते ।
कापिलकाणादादितर्कशास्त्र- | पूर्व०—परन्तु ऐसा माननेसे तो
| कपिल और कणाद आदिके तर्क-
विरोध इति चेत् ? | शास्त्रसे विरोध आता है ।
न; तेषां मूलाभावे वेद- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक
| नहीं; क्योंकि उनका कोई आधार
विरोधे च भ्रान्तत्वोपपत्तेः । | न होनेसे और वेदसे विरोध होनेसे
| भ्रान्तिमय होना उचित ही है । श्रुति
श्रुत्युपपत्तिभ्यां च सिद्धमात्म- | और युक्तिसे आत्माका असंसारित्व
| सिद्ध होता है तथा एक होनेके
नोऽसंसारित्वमेकत्वाच्च । | कारण भी ऐसा ही जान पड़ता है ।
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१
कथमेकत्वमित्युच्यते-स यश्चायं | उसका एकत्व कैसे है ? सो सबका
पुरुषे यश्चासावादित्ये स | सब पूर्ववत् 'वह जो कि इस
पुरुषमें है और जो यह आदित्यमें
एक इत्येवमादि पूर्ववत् | है एक है,' इस वाक्यद्वारा
सर्वम् ॥४॥ | बतलाया गया है ॥४॥
आदित्य और देहोपाधिक चेतनकी एकता जाननेवाले
उपासकको मिलनेवाला फल
स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमय-
मात्मानमुपसंक्रम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य ।
एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं विज्ञानमयमात्मान-
मुपसंक्रम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य । इमाँ-
ल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते ।
हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥
वह जो इस प्रकार जाननेवाला है इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट
विषय-समूह) से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्माके प्रति संक्रमण कर,
इस प्राणमय आत्माके प्रति संक्रमण कर, इस मनोमय आत्माके प्रति
संक्रमण कर, इस विज्ञानमय आत्माके प्रति संक्रमण कर तथा इस
आनन्दमय आत्माके प्रति संक्रमण कर इन लोकोंमें कामान्नी (इच्छा-
नुसार भोग भोगता हुआ) और कामरूपी होकर (इच्छानुसार रूप
धारण कर) विचरता हुआ यह सामगान करता रहता है—हा ३ वु
हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥
तै० उ० ३१-
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२४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
अन्नमयादिक्रमेणानन्दमयमा- अन्नमय आदिके क्रमसे आनन्द-
त्मानमुपसंक्रम्यैतत्साम गाय- मय आत्माके प्रति संक्रमण कर वह
न्नास्ते। यह सामगान करता रहता है।
सत्यं ज्ञानमित्यस्या ऋचोऽर्थो 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस
सोऽश्नुते व्याख्यातो विस्त- ऋचाके अर्थकी, इसकी विवरणभूता
सर्वान्कामानिति रेण तद्विवरणभूत- ब्रह्मानन्दवल्लीके द्वारा विस्तारपूर्वक
मीमांस्यते यानन्दवल्लया । व्याख्या कर दी गयी थी। किन्तु
उसके फलका निरूपण करनेवाले
“सोऽश्नुते सर्वान्कामान्सह “वह सर्वज्ञ ब्रह्मस्वरूपसे एक साथ
ब्रह्मणा विपश्चिता” (तै० उ० सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त कर लेता है”
इस वचनके अर्थका विस्तारपूर्वक
२।१।१) इति तस्यफलवचन- वर्णन नहीं किया गया था। वे
भोग क्या हैं? उनका किन
स्यार्थविस्तारो नोक्तः। के ते विषयोंसे सम्बन्ध है? और किस
किंविषया वा सर्वे कामाः कथं प्रकार वह उन्हें ब्रह्मरूपसे एक
साथ ही प्राप्त कर लेता है?—यह
वा ब्रह्मणा सह समश्नुत इत्येत- सब बतलाना है, अतः अब इसीका
द्वक्तव्यमितीदमिदानीमारभ्यते— विचार आरम्भ किया जाता है—
तत्र पितापुत्राख्यायिकायां तहाँ पूर्वोक्त विद्याकी शेषभूत
पितापुत्रसम्बन्धिनी आख्यायिकामें
पूर्वविद्याशेषभूतायां तपो ब्रह्म- तप ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिका साधन
विद्यासाधनमुक्तम्। प्राणादेरा- बतलाया गया है; तथा आकाशपर्यन्त
प्राणादि कार्यवर्गका अन्न और
काशान्तस्य च कार्यस्यान्नान्ना- अन्नादरूपसे विनियोग एवं ब्रह्म-
सम्बन्धिनी उपासनाओंका प्रतिपादन
दत्वेन विनियोगश्चोक्तः, ब्रह्म- किया गया है। इसी प्रकार
विषयोपासनानि च। ये च सर्वे आकाशादि कार्यभेदसे सम्बन्धित
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
कामाः प्रतिनियतानेकसाधन- | एवं प्रत्येकके लिये नियत अनेक
साध्या आकाशादिकार्यभेद- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले जो सम्पूर्ण
| भोग हैं वे भी दिखला दिये गये हैं।
विषया एते दर्शिताः। एकत्वे | परन्तु यदि आत्माका एकत्व स्वीकार
| किया जाय तब तो काम और
पुनः कामकामित्वानुपपत्तिः। | कामित्वका होना ही असम्भव होगा;
| क्योंकि सम्पूर्ण भेदजात आत्मस्वरूप
भेदजातस्य सर्वस्यात्मभूतत्वात्। | ही है। ऐसी अवस्थामें इस प्रकार
| जाननेवाला उपासक ब्रह्मरूपसे
तत्र कथं युगपद्ब्रह्मस्वरूपेण | किस प्रकार एक ही साथ सम्पूर्ण
| भोगोंको प्राप्त कर लेता है? सो
सर्वान्कामानेवंवित्तसमश्नुत इत्यु- | बतलाया जाता है—उसका सर्वात्म-
| भाव सम्भव होनेके कारण ऐसा हो
च्यते—सर्वात्मत्वोपपत्तेः। | सकता है।*
कथं सर्वात्मत्वोपपत्तिरित्याह- | उसका सर्वात्मत्व किस प्रकार
| सम्भव है ? सो बतलाते हैं—पुरुष
पुरुषादित्यस्यात्मैकत्वविज्ञानेना- | और आदित्यमें स्थित आत्माके
| एकत्वज्ञानसे उनके उत्कर्ष और
पोह्योत्कर्षापकर्षावन्नमयाद्यात्मनो- | अपकर्षका निराकरण कर आत्माके
| अज्ञानसे कल्पना किये हुए अन्नमयसे
ऽविद्याकल्पितान्क्रमेण संक्रम्या- | लेकर आनन्दमयपर्यन्त सम्पूर्ण
| कोशोंके प्रति संक्रमण कर जो सबका
नन्दमयान्तान्सत्यं ज्ञानमनन्तं | फलरूप है उस अदृश्यादि धर्म-
ब्रह्मादृश्यादिधर्मकं स्वाभाविक- | वाले स्वाभाविक आनन्दरूप

  • तात्पर्य यह है कि जो ब्रह्मकी अभेदोपासना करते-करते उससे
    तादात्म्य अनुभव करने लगता है वह सबका अन्तरात्मा ही हो जाता है; इसलिये
    सबके अन्तरात्मस्वरूपसे वह सम्पूर्ण भोगोंको भोगता है।
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२४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
मानन्दमजममृतमभयमद्वैतं फल- | अजन्मा, अमृत, अभय, अद्वैत एवं
सत्य, ज्ञान और अनन्त ब्रह्मको
भूतमापन्न इमाँल्लोकान्भूरादीन- | प्राप्त हो इन भूः आदि लोकोंमें
सञ्चार करता हुआ-इस प्रकार इन
नुसंचरन्निति व्यवहितेन संबन्धः। | व्यवधानयुक्त पदोंसे इस वाक्यका
कथमनुसंचरन् ? कामान्नी | सम्बन्ध है-किस प्रकार सञ्चार
करता हुआ ? कामान्नी-जिसको
कामतोऽन्नमस्येति कामान्नी। | इच्छासे ही अन्न प्राप्त हो जाय उसे
कामान्नी कहते हैं तथा जिसे इच्छासे
तथा कामतो रूपाण्यस्येति | ही [ इष्ट ] रूपोंकी प्राप्ति हो
जाय ऐसा कामरूपी होकर सञ्चार
कामरूपी । अनुसंचरन्सर्वात्मने- | करता हुआ अर्थात् सर्वात्मभावसे
माँल्लोकानात्मत्वेनानुभवन्- | इन लोकोंको अपने आत्मरूपसे
अनुभव करता हुआ-क्या करता है ?
किम् ? एतत्साम गायन्नास्ते । | इस सामका गान करता रहता है ।
समत्वाद्व्रह्मैव साम सर्व्वा- | समरूप होनेके कारण ब्रह्म ही
[टिप्पणी: ब्रह्मविदः साम- | नन्यरूपं गायन्नश- | साम है । उस सबसे अभिन्नरूप
गानाभिप्रायः] | सामका गान-उच्चारण करता हुआ
ब्दयन्नात्मैकत्वं प्र- | अर्थात् लोकपर अनुग्रह करनेके लिये
ख्यापयँल्लोकानुग्रहार्थं तद्विज्ञान- | आत्माकी एकताको प्रकट करता
हुआ और उसकी उपासनाके फल
फलं चातीव कृतार्थत्वं गायन्ना- | अत्यन्त कृतार्थत्वका गान करता
हुआ स्थित रहता है । किस प्रकार
स्ते तिष्ठति । कथम् ? हा ३ वु ! | गान करता है-हा ३ वु ! हा
हा३वु! हा३वु! अहो इत्येतस्मिन्न- | ३ वु ! हा ३ वु ! ये तीन शब्द
'अहो !' इस अर्थमें अत्यन्त विस्मय
र्थेऽत्यन्तविस्मयख्यापनार्थम् ॥५॥ | प्रकट करनेके लिये हैं ॥ ५ ॥

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
ब्रह्मवेत्ताद्वारा गाया जानेवाला साम
कः पुनरसौ विस्मयः ? | किन्तु वह विस्मय क्या है ? सो
इत्युच्यते— | बतलाया जाता है—
अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादो ३ ऽहमन्नादो ३
ऽहमन्नादः । अह ँश्लोककृदह ँश्लोककृदह ँश्लोककृत् ।
अहमस्मि प्रथमजा ऋता ३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना ३
भायि । यो मा ददाति स इदेव मा ३वाः । अहमन्नमन्नम-
दन्तमा ३द्मि । अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा ३म् । सुवर्न ज्योतिः
य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥
मैं अन्न ( भोग्य ) हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ; मैं ही अन्नाद
( भोक्ता ) हूँ, मैं ही अन्नाद हूँ, मैं ही अन्नाद हूँ; मैं ही श्लोककृत्
( अन्न और अन्नादके संघातका कर्ता ) हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ, मैं ही
श्लोककृत् हूँ । मैं ही इस सत्यासत्यरूप जगत्के पहले उत्पन्न हुआ
[ हिरण्यगर्भ ] हूँ । मैं ही देवताओंसे पूर्ववर्ती विराट् एवं अमृतत्वका
केन्द्रस्वरूप हूँ । जो [ अन्नस्वरूप ] मुझे [ अन्नार्थियोंको ] देता है वह
इस प्रकार मेरी रक्षा करता है, किन्तु [ जो मुझ अन्नस्वरूपको दान न
करता हुआ स्वयं भोगता है उस ] अन्न भक्षण करनेवालेको मैं अन्नरूपसे
भक्षण करता हूँ । मैं इस सम्पूर्ण भुवनका पराभव करता हूँ, हमारी
ज्योति सूर्यके समान नित्यप्रकाशस्वरूप है । ऐसी यह उपनिषद् [ ब्रह्म-
विद्या ] है । जो इसे इस प्रकार जानता है [ उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त
होता है ] ॥ ६ ॥
अद्वैत आत्मा निरञ्जनोऽपि | निर्मल अद्वैत आत्मा होनेपर भी
सन्नहमेवान्नमन्नादश्च । किं चाह- | मैं ही अन्न और अन्नाद हूँ तथा मैं
मेव श्लोककृत् । श्लोको नामा- | ही श्लोककृत् हूँ । 'श्लोक' अन्न और
न्नान्नादयोः संघातस्तस्य कर्ता | अन्नादके संघातको कहते हैं उसका
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२४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
चेतनावान् । अन्नस्यैव वा परा- | चेतनावान् कर्ता हूँ । अथवा परार्थ
र्थस्यान्नादार्थस्य सतोऽनेकात्म- | यानी अन्नादके लिये होनेवाले अन्नका
कस्य परार्थ्येन हेतुना संघात- | जो परार्थ्यरूप हेतुके कारण ही अनेकात्मक है, मैं संघात करनेवाला
कृत् । त्रिरुक्तिर्विस्मयत्वख्याप- | हूँ । मूलमें जो तीन बार कहा गया है
नार्था । | वह विस्मयत्व प्रकट करनेके लिये है ।
अहमस्मि भवामि । प्रथमजाः | मैं इस ऋत—सत्य यानी मूर्त्ता-
प्रथमजः प्रथमोत्पन्न ऋतस्य | मूर्त्तरूप जगत्का 'प्रथमजा'—प्रथम
सत्यस्य मूर्त्तामूर्त्तस्यास्य जगतः । | उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ) हूँ।
देवेभ्यश्च पूर्वम् । अमृतस्य नाभि- | मैं देवताओंसे पहले होनेवाला और
रमृतत्वस्य नाभिम्र्मध्यं मत्संस्र्थ- | अमृतका नाभि यानी अमरत्वका
मममृतत्वं प्राणिनामित्यर्थः । | मध्य (केन्द्रस्थान) हूँ; अर्थात् प्राणियोंका अमृतत्व मेरेमें स्थित है ।
यः कश्चिन्मा मामन्नमन्नार्थि- | जो कोई अन्नरूप मुझे अन्नार्थियों-
भ्यो ददाति प्रयच्छत्यन्नात्मना | को दान करता है अर्थात् अन्नात्म-
ब्रवीति स इदित्यमेवमविनष्टं | भावसे मेरा वर्णन करता है वह इस प्रकार अविनष्ट और यथार्थ
यथाभूतमावा अवतीत्यर्थः । यः | अन्नस्वरूप मेरी रक्षा करता है।
पुनरन्यो मामदत्त्वार्थिभ्यः काले | किन्तु जो समय उपस्थित होनेपर
प्राप्तेऽन्नमत्ति तमन्नमदन्तं भक्ष- | अन्नार्थियोंको मेरा दान न कर स्वयं ही अन्न भक्षण करता है उस
यन्तं पुरुषमहमन्नमेव संप्रत्यद्मि | अन्न भक्षण करनेवाले पुरुषको मैं
भक्षयामि । | अन्न ही खा जाता हूँ।
अत्राहैवं तर्हि बिभेमि सर्वा- | इसपर कोई वादी कहता है—
यदि ऐसी बात है तब तो मैं
सर्वात्मत्वप्राप्तिरूप मोक्षसे डरता हूँ;
त्मत्वप्राप्तेर्मोक्षादस्तु संसार एव | इससे तो मुझे संसारहीकी प्राप्ति
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७


[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]

यतो मुक्तोऽप्यहमन्नभूत आद्यः
स्यामन्नस्य ।
एवं मा भैषीः संव्यवहार-
विषयत्वात्सर्वकामाशनस्य अती-
त्यायं संव्यवहारविषयमन्नान्ना-
दादिलक्षणमविद्याकृतं विद्यया
ब्रह्मत्वमापन्नो विद्वांस्तस्य नैव
द्वितीयं वस्त्वन्तरमस्ति यतो
बिभेत्यतो न भेतव्यं मोक्षात् ।
एवं तर्हि किमिदमाह-अह-
मन्नमहमन्नाद इति ? उच्यते-यो-
ऽयमन्नान्नादादिलक्षणः संव्यव-
हारः कार्यभूतः स संव्यवहार-
मात्रमेव न परमार्थवस्तु । स
एवंभूतोऽपि ब्रह्मनिमित्तो ब्रह्म-
व्यतिरेकेणासन्निति कृत्वा ब्रह्म-
विद्याकार्यस्य ब्रह्मभावस्य स्तुत्य-
र्थमुच्यते । अहमन्नमहमन्नमह-
मन्नम् । अहमन्नादोऽहमन्नादो-
ऽहमन्नाद इत्यादि । अतो भया-


[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]

हो [ यही अच्छा है ]; क्योंकि
मुक्त होनेपर मैं भी अन्नभूत होकर
अन्नका भक्ष्य होऊँगा ।
सिद्धान्ती—ऐसे मत डरो, क्योंकि
सब प्रकारके भोगोंको भोगना यह
तो व्यावहारिक ही है । विद्वान् तो
ब्रह्मविद्याके द्वारा इस अविद्याकृत
अन्न-अन्नादरूप व्यावहारिक विषय-
का उल्लङ्घन कर ब्रह्मत्वको प्राप्त हो
जाता है । उसके लिये कोई दूसरी
वस्तु ही नहीं रहती, जिससे कि
उसे भय हो । इसलिये तुझे मोक्षसे
नहीं डरना चाहिये ।
यदि ऐसी बात है तो 'मैं अन्न
हूँ, मैं अन्नाद हूँ' ऐसा क्यों कहा
है--ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता
है-यह जो अन्न और अन्नादरूप
कार्यभूत व्यवहार है वह व्यवहार-
मात्र ही है—परमार्थवस्तु नहीं है ।
वह ऐसा होनेपर भी ब्रह्मका कार्य
होनेके कारण ब्रह्मसे पृथक् असत्
ही है—इस आशयको लेकर ही
ब्रह्मविद्याके कार्यभूत ब्रह्मभावकी
स्तुतिके लिये 'मैं अन्न हूँ, मैं अन्न
हूँ, मैं अन्न हूँ; मैं अन्नाद हूँ, मैं
अन्नाद हूँ, मैं अन्नाद हूँ' इत्यादि कहा
जाता है । इस प्रकार अविद्याका
नाश हो जानेके कारण ब्रह्मभूत

२४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३


[वाम स्तम्भ / संस्कृत भाष्य]

दिदोषगन्धोऽप्यविद्यानिमित्तो-
ऽविद्योच्छेदाद्ब्रह्मभूतस्य नास्तीति ।
अहं विश्वं समस्तं भुवनं भूतैः
संभजनीयं ब्रह्मादिभिर्भवन्तीति
वास्मिन्भूतानीति भुवनमभ्यभवा-
मभिभवामि परेणेश्वरेण स्वरू-
पेण । सुवर्न ज्योतिः सुवरा-
दित्यो नकार उपमार्थे । आदित्य
इव सकृद्विभातमस्मदीयं ज्योति-
र्ज्योतिः प्रकाश इत्यर्थः ।
इति वल्लीद्वयविहितोपनिष-
त्परमात्मज्ञानं तामेतां यथोक्ता-
मुपनिषदं शान्तो दान्त उपरत-
स्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा भृगु-
वत्तपो महदास्थाय य एवं
वेद तस्येदं फलं यथोक्तमोक्ष
इति ॥ ६ ॥


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी अनुवाद]

विद्वान्को अविद्याके कारण होनेवाले
भय आदि दोषका गन्ध भी नहीं
होता ।
मैं अपने श्रेष्ठ ईश्वररूपसे विश्व
यानी सम्पूर्ण भुवनका पराभव
( उपसंहार ) करता हूँ । जो
ब्रह्मादि भूतों (प्राणियों) के द्वारा
संभजनीय (भोगे जाने योग्य) है
अथवा जिसमें भूत (प्राणी) होते
हैं उसका नाम भुवन है। 'सुवर्न
ज्योतिः'—'सुवः' आदित्यका नाम
है और 'न' उपमाके लिये है; अर्थात्
हमारी ज्योति—हमारा प्रकाश
आदित्यके समान प्रकाशमान है।
इस प्रकार इन दो वल्लियोंमें कही
हुई उपनिषत् परमात्माका ज्ञान है।
इस उपर्युक्त उपनिषत्को जो भृगु-
के समान शान्त, दान्त, उपरत,
तितिक्षु और समाहित होकर महान्
तपस्या करके इस प्रकार जानता है
उसे यह उपर्युक्त मोक्षरूप फल
प्राप्त होता है ॥ ६ ॥


इति भृगुवल्ल्यां दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्कर-
भगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये भृगुवल्ली समाप्ता ॥
समाप्तेयं कृष्णयजुर्वेदीया तैत्तिरीयोपनिषत् ॥


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ॐ
शान्तिपाठ
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् ।
सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् ।
आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
तै० उ० ३२—
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मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका

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श्रीहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
मन्त्रप्रतीकानि वल्ली अनु० मं० पृ०
अथाध्यात्मम् १ ३ ४ २७
अन्तेवास्युत्तररूपम् १ ३ ३ २७
अन्नं न निन्द्यात् ३ ७ १ २२६
अन्नं न परिचक्षीत ३ ८ १ २२८
अन्नं बहु कुर्वीत ३ ९ १ २२९
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् ३ २ १ २१८
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते २ २ १ १२४
असद्वा इदमग्र आसीत् २ ७ १ १७३
असन्नेव स भवति २ ६ १ १५०
अहं वृक्षस्य रेरिवा १ १० १ ६५
अहमन्नमहमन्नम् ३ १० ६ २४५
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ३ ६ १ २२३
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च १ ९ १ ६१
ओमिति ब्रह्म १ ८ १ ५७
ॐ शं नो मित्रः १ १ १ २१
कुर्वाणाचीरमात्मनः १ ४ २ ३३
तन्नम इत्युपासीत ३ १० ४ २३०
देवपितृकार्याभ्याम् १ ११ २ ७०
न कञ्चन वसतौ ३ १० १ २३०
नो इतराणि १ ११ ३ ७०
पृथिव्यन्तरिक्षम् १ ७ १ ५४
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति २ ३ १ १३०
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् ३ ३ १ २२०
ब्रह्मविदाप्नोति परम् २ १ १ ९७
भीषास्माद्वातः पवते २ ८ १ १८२
भूर्भुवः सुवरिति १ ५ १ ४१
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( २५१ )
भृगुर्वै वारुणिः ३ १ १ २१४
मनो ब्रह्मेति व्यजानात् ३ ४ १ २२१
मह इति ब्रह्म १ ५ ३ ४२
मह इत्यादित्यः १ ५ २ ४१
य एवं वेद ३ १० २ २३०
यतो वाचो निवर्तन्ते २ ९ १ २०८
यतो वाचो निवर्तन्ते २ ४ १ १३८
यश इति पशुषु ३ १० ३ २३०
यशो जनेऽसानि स्वाहा १ ४ ३ ३८
यच्छन्दसामृषभो विश्वरूपः १ ४ १ ३३
ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः १ ११ ४ ७०
वायुः संधानम् १ ३ २ २७
विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् ३ ५ १ २२२
विज्ञानं यज्ञं तनुते २ ५ १ १४१
वेदमनूच्याचार्यो १ ११ १ ७०
शं नो मित्रः १ १२ १ ९३
शीक्षां व्याख्यास्यामः १ २ १ २५
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य २ ८ ३ १८२
” ” २ ८ ४ १८३
स एको मनुष्यगन्धर्वाणाम् २ ८ २ १८२
स य एवंवित् ३ १० ५ २४१
स य एषोऽन्तर्हृदये १ ६ १ ४८
स यश्चायं पुरुषे २ ८ ५ १९१
सह नौ यशः १ ३ १ २७
सुवरित्यादित्ये १ ६ २ ४८

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मिलनेका पता-
गीताप्रेस, गोरखपुर