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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

Here is the line-by-line Devanagari text transcription from the image:

९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
जलसे पृथिवी, पृथिवीसे ओषधियाँ, ओषधियोंसे अन्न और अन्नसे पुरुष
उत्पन्न हुआ। वह यह पुरुष अन्न एवं रसमय ही है। उसका यह [शिर]
ही शिर है, यह [दक्षिण बाहु] ही दक्षिण पक्ष है, यह [वाम बाहु]
वाम पक्ष है, यह [शरीरका मध्यभाग] आत्मा है और यह [नीचेका
भाग] पुच्छ प्रतिष्ठा है। उसके विषयमें ही यह श्लोक है॥ १ ॥

ब्रह्मविद्ब्रह्मेति वक्ष्यमाणलक्षणं 'ब्रह्मवित्'- ब्रह्म, जिसका लक्षण
आगे कहा जायगा और जो
ब्रह्मविदो बृहत्तमत्वाद्व्रह्म त-
सबसे बड़ा होनेके कारण 'ब्रह्म'
ब्रह्मप्राप्तिनिरूपणम् द्वेत्ति विजानातीति कहलाता है, उसे जो जानता है
ब्रह्मविदाप्नोति परं निरतिशयं उसका नाम 'ब्रह्मवित्' है; वह
ब्रह्मवित् उस परम-निरतिशय ब्रह्म-
तदेव ब्रह्म परम् । न ह्यन्यस्य को ही 'आप्नोति'-प्राप्त कर लेता
विज्ञानादन्यस्य प्राप्तिः । स्पष्टं है; क्योंकि अन्यके विज्ञानसे किसी
अन्यकी प्राप्ति नहीं हुआ करती।
च श्रुत्यन्तरं ब्रह्मप्राप्तिमेव ब्रह्म- "वह, जो कि निश्चय ही उस परब्रह्म-
विदो दर्शयति "स यो ह वै को जानता है, ब्रह्म ही हो जाता
है" यह एक दूसरी श्रुति ब्रह्मवेत्ता-
तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" को स्पष्टतया ब्रह्मकी ही प्राप्ति होना
(मु० उ० ३ । २ । ९) इत्यादि । प्रदर्शित करती है।

ननु सर्वगतं सर्वस्यात्मभूतं शङ्का-ब्रह्म सर्वगत और सबका
आत्मा है-ऐसा आगे कहेंगे; इसलिये
ब्रह्म वक्ष्यति । अतो नाप्यम् । वह प्राप्तव्य नहीं हो सकता। प्राप्ति
प्राप्तिश्चान्यस्यान्येन परिच्छिन्नस्य तो अन्य परिच्छिन्न पदार्थकी किसी
अन्य परिच्छिन्न पदार्थद्वारा ही होती
च परिच्छिन्नेन दृष्टा । अपरि- देखी गयी है। किन्तु ब्रह्म तो
च्छिन्नं सर्वात्मकं च ब्रह्मेत्यतः अपरिच्छिन्न और सर्वात्मक है;
इसलिये परिच्छिन्न और अनात्म-
परिच्छिन्नवदनात्मवच्च तस्याप्ति- पदार्थके समान उसकी प्राप्ति होनी
रनुपपन्ना। असम्भव है।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९


[संस्कृत-मूल]

नायं दोषः; कथम् ? दर्श-
नादर्शनापेक्षत्वाद्ब्रह्मण आप्त्य-
नाप्त्योः । परमार्थतो ब्रह्मरूप-
स्यापि सतोऽस्य जीवस्य भूत-
मात्राकृतबाह्यपरिच्छिन्नान्नमया-
द्यात्मदर्शिनस्तदासक्तचेतसः प्र-
कृतसंख्यापूरणस्यात्मनोऽव्यव-
हितस्यापि बाह्यसंख्येयविषया-
सक्तचित्ततया स्वरूपाभावदर्शन-
वत्परमार्थब्रह्मस्वरूपाभावदर्शन-
लक्षणयाविद्ययान्नमयादीन्बाह्या-
ननात्मन आत्मत्वेन प्रतिपन्न-
त्वादन्नमयाद्यनात्मभ्यो नान्यो-
ऽहमस्मीत्यभिमन्यते । एवमविद्य-
यात्मभूतमपि ब्रह्मानाप्तं स्यात् ।


[हिन्दी-अनुवाद]

समाधान—यह कोई दोषकी
बात नहीं है; किस प्रकार नहीं
है ? क्योंकि ब्रह्मकी प्राप्ति और
अप्राप्ति तो उसके साक्षात्कार और
असाक्षात्कारकी अपेक्षासे हैं । जिस
प्रकार [ दशम पुरुषके लिये ]
प्रकृत ( दशम ) संख्याकी पूर्ति
करनेवाला अपना-आप* सर्वथा
अव्यवहित होनेपर भी संख्या करने
योग्य बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त
रहनेके कारण वह अपने स्वरूपका
अभाव देखता है उसी प्रकार पञ्च-
भूत तन्मात्राओंसे उत्पन्न हुए बाह्य
परिच्छिन्न अन्नमय कोशादिमें आत्म-
भाव देखनेवाला यह जीव परमार्थतः
ब्रह्मस्वरूप होनेपर भी उनमें आसक्त
हो जाता है और अपने परमार्थ
ब्रह्मस्वरूपका अभाव देखनास्वरूप
अविद्यासे अन्नमय कोश आदि बाह्य
अनात्माओंको आत्मस्वरूपसे देखने-
के कारण 'मैं अन्नमय आदि
अनात्माओंसे भिन्न नहीं हूँ' ऐसा
अभिमान करने लगता है । इसी प्रकार
अपना आत्मा होनेपर भी अविद्यावश
ब्रह्म अप्राप्त ही है ।


[पाद-टिप्पणी]

* इस विषयमें यह दृष्टान्त प्रसिद्ध है कि एक बार दश मनुष्य यात्रा
कर रहे थे । रास्तेमें एक नदी पड़ी । जब उसे पार कर वे उसके दूसरे तटपर
पहुँचे तो यह जाननेके लिये कि हममेंसे कोई बह तो नहीं गया अपनेको गिनने
लगे । उनमेंसे जो भी गिनना आरम्भ करता वह अपनेको छोड़कर शेष नौको
ही गिनता । इस प्रकार एककी कमी रहनेके कारण वे यह समझकर कि हममेंसे
एक आदमी नदीमें बह गया है खिन्न हो रहे थे । इतनेहीमें एक बुद्धिमान्