तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
[संस्कृत-मूल]
नायं दोषः; कथम् ? दर्श-
नादर्शनापेक्षत्वाद्ब्रह्मण आप्त्य-
नाप्त्योः । परमार्थतो ब्रह्मरूप-
स्यापि सतोऽस्य जीवस्य भूत-
मात्राकृतबाह्यपरिच्छिन्नान्नमया-
द्यात्मदर्शिनस्तदासक्तचेतसः प्र-
कृतसंख्यापूरणस्यात्मनोऽव्यव-
हितस्यापि बाह्यसंख्येयविषया-
सक्तचित्ततया स्वरूपाभावदर्शन-
वत्परमार्थब्रह्मस्वरूपाभावदर्शन-
लक्षणयाविद्ययान्नमयादीन्बाह्या-
ननात्मन आत्मत्वेन प्रतिपन्न-
त्वादन्नमयाद्यनात्मभ्यो नान्यो-
ऽहमस्मीत्यभिमन्यते । एवमविद्य-
यात्मभूतमपि ब्रह्मानाप्तं स्यात् ।
[हिन्दी-अनुवाद]
समाधान—यह कोई दोषकी
बात नहीं है; किस प्रकार नहीं
है ? क्योंकि ब्रह्मकी प्राप्ति और
अप्राप्ति तो उसके साक्षात्कार और
असाक्षात्कारकी अपेक्षासे हैं । जिस
प्रकार [ दशम पुरुषके लिये ]
प्रकृत ( दशम ) संख्याकी पूर्ति
करनेवाला अपना-आप* सर्वथा
अव्यवहित होनेपर भी संख्या करने
योग्य बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त
रहनेके कारण वह अपने स्वरूपका
अभाव देखता है उसी प्रकार पञ्च-
भूत तन्मात्राओंसे उत्पन्न हुए बाह्य
परिच्छिन्न अन्नमय कोशादिमें आत्म-
भाव देखनेवाला यह जीव परमार्थतः
ब्रह्मस्वरूप होनेपर भी उनमें आसक्त
हो जाता है और अपने परमार्थ
ब्रह्मस्वरूपका अभाव देखनास्वरूप
अविद्यासे अन्नमय कोश आदि बाह्य
अनात्माओंको आत्मस्वरूपसे देखने-
के कारण 'मैं अन्नमय आदि
अनात्माओंसे भिन्न नहीं हूँ' ऐसा
अभिमान करने लगता है । इसी प्रकार
अपना आत्मा होनेपर भी अविद्यावश
ब्रह्म अप्राप्त ही है ।
[पाद-टिप्पणी]
* इस विषयमें यह दृष्टान्त प्रसिद्ध है कि एक बार दश मनुष्य यात्रा
कर रहे थे । रास्तेमें एक नदी पड़ी । जब उसे पार कर वे उसके दूसरे तटपर
पहुँचे तो यह जाननेके लिये कि हममेंसे कोई बह तो नहीं गया अपनेको गिनने
लगे । उनमेंसे जो भी गिनना आरम्भ करता वह अपनेको छोड़कर शेष नौको
ही गिनता । इस प्रकार एककी कमी रहनेके कारण वे यह समझकर कि हममेंसे
एक आदमी नदीमें बह गया है खिन्न हो रहे थे । इतनेहीमें एक बुद्धिमान्