तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
विरोधाच्च विद्याकर्मणोः समु- | इसके सिवा विद्या और कर्मका
च्चयानुपपत्तिः । प्रविलीनकर्त्रा- | विरोध होनेके कारण भी उनका
दिकारकविशेषतत्त्वविषया हि | समुच्चय नहीं हो सकता । जिसमें
विद्या तद्विपरीतकारकसाध्येन | कर्ता-करण आदि कारकविशेषोंका
कर्मणा विरुध्यते । न ह्येकं वस्तु | पूर्णतया लय होता है उस तत्त्वको
परमार्थतः कर्त्रादिविशेषवत्तच्छू- | ( ब्रह्मको ) विषय करनेवाली विद्या
न्यं चेत्युभयथा द्रष्टुं शक्यते । | अपनेसे विपरीत साधनसाध्य कर्मसे
अवश्यं ह्यन्यतरन्मिथ्या स्यात् । | विरुद्ध है । एक ही वस्तु परमार्थतः
अन्यतरस्य च मिथ्यात्वप्रसङ्गे | कर्ता आदि विशेषसे युक्त और उस-
युक्तं यत्स्वाभाविकाज्ञानविषयस्य | से रहित—दोनों ही प्रकारसे नहीं
द्वैतस्य मिथ्यात्वम् । “यत्र हि | देखी जा सकती । उनमेंसे एक
द्वैतमिव भवति” ( बृ० उ० २ । | पक्ष अवश्य मिथ्या होना चाहिये ।
४ । १४ ) “मृत्योः स मृत्यु- | इस प्रकार किसी एकके मिथ्यात्वका
माप्नोति” ( क० उ० २ । १ । | प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर जो स्वभाव-
१०, बृ० उ० ४ । ४ । १९ ) | से ही अज्ञानका विषय है उस
“अथ यत्रान्यत्पश्यति......... | द्वैतका ही मिथ्या होना उचित है,
तदल्पम्” (छा० उ० ७।२४।१) | जैसा कि “जहाँ द्वैतके समान होता
“अन्योऽसावन्योऽहमस्मि” ( बृ० | है” “वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता
उ० १ । ४ । १० ) “उदरमन्तरं | है” “जहाँ अन्य देखता है वह अल्प
कुरुते अथ तस्य भयं भवति” | है” “यह अन्य है मैं अन्य हूँ” “जो
(तै० उ० २ । ७ । १) इत्यादि- | थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे
श्रुतिशतेभ्यः । | भय प्राप्त होता है” इत्यादि सैकड़ों
| श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ।
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अनु० ११] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
सत्यत्वं चैकत्वस्य “एकधै- | तथा “एक रूपसे ही देखना
वानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४ । | चाहिये” “एक ही अद्वितीय” “यह
४ । २०) “एकमेवाद्वितीयम्” | सब ब्रह्म ही है”, “यह सब आत्मा
(छा० उ० ६ । २ । १) “ब्रह्मै- | ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे एकत्वकी
वेद सर्वम्” (मु० उ० २ । २ । | सत्यता सिद्ध होती है। सम्प्रदान
११) “आत्मैवेद सर्वम्” | आदि कारकभेदके दिखायी न देने-
(छा० उ० ७ । २५ । २) | पर कर्म होना सम्भव भी नहीं है।
इत्यादिश्रुतिभ्यः । न च संप्रदा- | ज्ञानके प्रसंगमें भेददृष्टिके अपवाद
नादिकारकभेदादर्शने कर्मोप- | तो सहस्रों सुननेमें आते हैं। अतः
पद्यते । अन्यत्वदर्शनापवादश्च | विद्या और कर्मका विरोध है; इस-
विद्याविषये सहस्रशः श्रूयते । | लिये भी उनका समुच्चय होना
अतो विरोधो विद्याकर्मणोः । | असम्भव है। ऐसी दशामें पूर्वमें
अतश्च समुच्चयानुपपत्तिः । तत्र | तुमने जो कहा था कि ‘परस्पर
यदुक्तं संहताभ्यां विद्याकर्मभ्यां | मिले हुए विद्या और कर्म दोनोंसे
मोक्ष इति, अनुपपन्नं तत् । | मोक्ष होता है’ वह सिद्ध नहीं होता।
विहितत्वात्कर्मणां श्रुतिवि- | पूर्व०-कर्म भी श्रुतिविहित हैं,
| अतः ऐसा माननेपर श्रुतिसे विरोध
रोध इति चेत् । यद्युपमृद्य कर्त्रा- | उपस्थित होता है। यदि सर्पादि-
| भ्रान्तिजनित ज्ञानका बाध करनेवाले
दिकारकविशेषमात्मैकत्वविज्ञानं | रज्जु आदि विषयक ज्ञानके समान
| कर्ता आदि कारकविशेषका बाध
विधीयते सर्पादिभ्रान्तिविज्ञानो- | करके ही आत्मैकत्वके ज्ञानका
| विधान किया जाता है तो कोई
पमर्दकरज्ज्वादिविषयविज्ञानव- | विषय न रहनेके कारण कर्मका
त्प्राप्तः कर्मविधिश्रुतीनां निर्विष- | विधान करनेवाली श्रुतियोंका उन
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