सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

२४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
अन्नमयादिक्रमेणानन्दमयमा- अन्नमय आदिके क्रमसे आनन्द-
त्मानमुपसंक्रम्यैतत्साम गाय- मय आत्माके प्रति संक्रमण कर वह
न्नास्ते। यह सामगान करता रहता है।
सत्यं ज्ञानमित्यस्या ऋचोऽर्थो 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस
सोऽश्नुते व्याख्यातो विस्त- ऋचाके अर्थकी, इसकी विवरणभूता
सर्वान्कामानिति रेण तद्विवरणभूत- ब्रह्मानन्दवल्लीके द्वारा विस्तारपूर्वक
मीमांस्यते यानन्दवल्लया । व्याख्या कर दी गयी थी। किन्तु
उसके फलका निरूपण करनेवाले
“सोऽश्नुते सर्वान्कामान्सह “वह सर्वज्ञ ब्रह्मस्वरूपसे एक साथ
ब्रह्मणा विपश्चिता” (तै० उ० सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त कर लेता है”
इस वचनके अर्थका विस्तारपूर्वक
२।१।१) इति तस्यफलवचन- वर्णन नहीं किया गया था। वे
भोग क्या हैं? उनका किन
स्यार्थविस्तारो नोक्तः। के ते विषयोंसे सम्बन्ध है? और किस
किंविषया वा सर्वे कामाः कथं प्रकार वह उन्हें ब्रह्मरूपसे एक
साथ ही प्राप्त कर लेता है?—यह
वा ब्रह्मणा सह समश्नुत इत्येत- सब बतलाना है, अतः अब इसीका
द्वक्तव्यमितीदमिदानीमारभ्यते— विचार आरम्भ किया जाता है—
तत्र पितापुत्राख्यायिकायां तहाँ पूर्वोक्त विद्याकी शेषभूत
पितापुत्रसम्बन्धिनी आख्यायिकामें
पूर्वविद्याशेषभूतायां तपो ब्रह्म- तप ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिका साधन
विद्यासाधनमुक्तम्। प्राणादेरा- बतलाया गया है; तथा आकाशपर्यन्त
प्राणादि कार्यवर्गका अन्न और
काशान्तस्य च कार्यस्यान्नान्ना- अन्नादरूपसे विनियोग एवं ब्रह्म-
सम्बन्धिनी उपासनाओंका प्रतिपादन
दत्वेन विनियोगश्चोक्तः, ब्रह्म- किया गया है। इसी प्रकार
विषयोपासनानि च। ये च सर्वे आकाशादि कार्यभेदसे सम्बन्धित
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
कामाः प्रतिनियतानेकसाधन- | एवं प्रत्येकके लिये नियत अनेक
साध्या आकाशादिकार्यभेद- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले जो सम्पूर्ण
| भोग हैं वे भी दिखला दिये गये हैं।
विषया एते दर्शिताः। एकत्वे | परन्तु यदि आत्माका एकत्व स्वीकार
| किया जाय तब तो काम और
पुनः कामकामित्वानुपपत्तिः। | कामित्वका होना ही असम्भव होगा;
| क्योंकि सम्पूर्ण भेदजात आत्मस्वरूप
भेदजातस्य सर्वस्यात्मभूतत्वात्। | ही है। ऐसी अवस्थामें इस प्रकार
| जाननेवाला उपासक ब्रह्मरूपसे
तत्र कथं युगपद्ब्रह्मस्वरूपेण | किस प्रकार एक ही साथ सम्पूर्ण
| भोगोंको प्राप्त कर लेता है? सो
सर्वान्कामानेवंवित्तसमश्नुत इत्यु- | बतलाया जाता है—उसका सर्वात्म-
| भाव सम्भव होनेके कारण ऐसा हो
च्यते—सर्वात्मत्वोपपत्तेः। | सकता है।*
कथं सर्वात्मत्वोपपत्तिरित्याह- | उसका सर्वात्मत्व किस प्रकार
| सम्भव है ? सो बतलाते हैं—पुरुष
पुरुषादित्यस्यात्मैकत्वविज्ञानेना- | और आदित्यमें स्थित आत्माके
| एकत्वज्ञानसे उनके उत्कर्ष और
पोह्योत्कर्षापकर्षावन्नमयाद्यात्मनो- | अपकर्षका निराकरण कर आत्माके
| अज्ञानसे कल्पना किये हुए अन्नमयसे
ऽविद्याकल्पितान्क्रमेण संक्रम्या- | लेकर आनन्दमयपर्यन्त सम्पूर्ण
| कोशोंके प्रति संक्रमण कर जो सबका
नन्दमयान्तान्सत्यं ज्ञानमनन्तं | फलरूप है उस अदृश्यादि धर्म-
ब्रह्मादृश्यादिधर्मकं स्वाभाविक- | वाले स्वाभाविक आनन्दरूप

  • तात्पर्य यह है कि जो ब्रह्मकी अभेदोपासना करते-करते उससे
    तादात्म्य अनुभव करने लगता है वह सबका अन्तरात्मा ही हो जाता है; इसलिये
    सबके अन्तरात्मस्वरूपसे वह सम्पूर्ण भोगोंको भोगता है।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri