तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[वाम स्तम्भ - संस्कृत]
'प्राणो वा अन्नं शरीरमन्ना-
दमू' इत्यारभ्याका-
शान्तस्य कार्यस्यै-
वान्नान्नादत्वमुक्तम् ।
उक्तं नाम किं तेन ?
तेनैतत्सिद्धं भवति—कार्य-
विषय एव भोज्यभोक्तृत्वकृतः
संसारो न त्वात्मनीति । आत्मनि
तु भ्रान्त्योपचर्यते ।
नन्वात्मापि परमात्मनः कार्यं
ततो युक्तस्तस्य संसार इति ।
न; असंसारिण एव प्रवेश-
श्रुतेः । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि-
शत्” ( तै० उ० २ । ६ । १ )
इत्याकाशादिकारणस्य ह्यसंसा-
रिण एव परमात्मनः कार्येष्वनु-
प्रवेशः श्रूयते । तस्मात्कार्यानु-
प्रविष्टो जीव आत्मा पर एव
असंसारी । सृष्ट्वानुप्राविशदिति
समानकर्तृकत्वोपपत्तेश्च । सर्ग-
[हाशिये में टिप्पणी: आत्मनोऽसंसारित्वस्थापनम्]
[दक्षिण स्तम्भ - हिन्दी]
'प्राण ही अन्न है और शरीर
अन्नाद है' यहाँसे लेकर आकाशपर्यन्त
कार्यवर्गका ही अन्न और अन्नादत्व
प्रतिपादन किया गया है ।
पूर्व०—कहा गया है—सो इससे
क्या हुआ ?
सिद्धान्ती—इससे यह सिद्ध
होता है कि भोज्य और भोक्ताके
कारण होनेवाला संसार कार्यवर्गसे
ही सम्बन्धित है, वह आत्मामें नहीं
है; आत्मामें तो भ्रान्तिवश उसका
उपचार किया जाता है ।
पूर्व०—परन्तु आत्मा भी तो
परमात्माका कार्य है । इसलिये उसे
संसारकी प्राप्ति होना उचित ही है ।
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि प्रवेश-
श्रुति असंसारीका ही प्रवेश प्रति-
पादन करती है । “उसे रचकर वह
पीछेसे उसीमें प्रविष्ट हो गया” इस
श्रुतिद्वारा आकाशादिके कारणरूप
असंसारी परमात्माका ही कार्योंमें
अनुप्रवेश सुना गया है । अतः
कार्यमें अनुप्रविष्ट जीवात्मा असंसारी
परमात्मा ही है । 'रचकर पीछेसे
प्रविष्ट हो गया' इस वाक्यसे एक
ही कर्ता होना सिद्ध होता है । यदि
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९
प्रवेशक्रिययोश्चैकश्चेत्कर्ता ततः | सृष्टि और प्रवेशक्रियाका एक ही
क्त्वाप्रत्ययो युक्तः । | कर्त्ता होगा तभी ‘क्त्वा’ प्रत्यय होना
| युक्त होगा ।
प्रविष्टस्य तु भावान्तरापत्ति- | पूर्व०–प्रवेश कर लेनेपर उसे
रिति चेत् ? | दूसरे भावकी प्राप्ति हो जाती है–
| ऐसा माने तो ?
न; प्रवेशस्यान्यार्थत्वेन | सिद्धान्ती–नहीं, क्योंकि प्रवेश-
| का प्रयोजन दूसरा ही है–ऐसा
प्रत्याख्यातत्वात् । “अनेन जीवे- | कहकर हम इसका पहले ही
| निराकरण कर चुके हैं ।* यदि
नात्मना” (छा० उ० ६ । ३ | कहो कि “अनेन जीवेन आत्मना”
२) इति विशेषश्रुतेर्धर्मान्तरेणा- | इत्यादि विशेष श्रुति होनेके कारण
| उसका धर्मान्तररूपसे ही प्रवेश
नुप्रवेश इति चेत् ? न; “तत्त्वमसि” | होता है–तो ऐसा कहना ठीक नहीं;
| क्योंकि “वह तू है” इस श्रुतिद्वारा
इति पुनस्तद्भावोक्तेः । भावा- | पुनः उसकी तद्रूपताका वर्णन किया
| गया है। और यदि कहो कि भावान्तर-
न्तरापन्नस्यैव तदपोहार्था संप- | को प्राप्त हुए ब्रह्मके उस भावका
| निषेध करनेके लिये ही वह केवल
दिति चेत् ? न; “तत्सत्यं स | दृष्टिमात्र कही गयी है तो ऐसी बात
| भी नहीं है; क्योंकि “वह सत्य है,
आत्मा तत्त्वमसि” (छा० उ० | वह आत्मा है, वह तू है” इत्यादि
| श्रुतिसे उसका परमात्माके साथ
६ । ८–१६) इति सामानाधि- | सामानाधिकरण्य सिद्ध होता है ।
करण्यात् । |
दृष्टं जीवस्य संसारित्वमिति | पूर्व०–जीवका संसारित्व तो
चेत् ? | स्पष्ट देखा है ।
- देखिये ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक ६ का भाष्य ।
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