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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

२०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

२०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
न, स्वाभाविकत्वात् । द्रव्य- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वह तो स्वाभाविक है । द्रव्यका तात्त्विक
वस्तुन्स्तात्त्विक- | स्य हि तत्त्वमविक्रि- | स्वरूप तो विकार न होना ही है;
विशेषरूपयो- | या परानपेक्षत्वात् । | क्योंकि उसे दूसरेकी अपेक्षा नहीं होती । दूसरेकी अपेक्षावाला होनेके
र्निर्वचनम् | विक्रिया न तत्त्वं | कारण विकार तत्त्व नहीं है । जो
परापेक्षत्वात् । न हि कारकापेक्षं | कर्ता, कर्म, करण आदि कारकोंकी अपेक्षावाला होता है वह वस्तुका
वस्तुनस्तत्त्वम् । सतो विशेषः | तत्त्व नहीं होता । विद्यमान वस्तुका विशेष रूप कारकोंकी अपेक्षावाला
कारकापेक्षः, विशेषश्च विक्रिया । | होता है, और विशेष ही विकार होता है । जाग्रत् और स्वप्नका जो
जाग्रत्स्वप्नयोश्च ग्रहणं विशेषः । | ग्रहण है वह भी विशेष ही है । जिसका जो रूप अन्यकी अपेक्षासे
यद्धि यस्य नान्यापेक्षं स्वरूपं | रहित होता है वही उसका तत्त्व होता है और जो अन्यकी अपेक्षा-
तत्तस्य तत्त्वम्, यदन्यापेक्षं न | वाला होता है वह तत्त्व नहीं होता; क्योंकि उस अन्यका अभाव होनेपर
तत्तत्त्वम्; अन्याभावेऽभावात् । | उसका भी अभाव हो जाता है ।
तस्मात्स्वाभाविकत्वाज्जाग्रत्स्वप्न- | अतः [सुषुप्तावस्था] स्वाभाविक होनेके कारण उस समय जाग्रत् और स्वप्न-
वन्न सुषुप्ते विशेषः । | के समान विशेषकी सत्ता नहीं है ।
येषां पुनरीश्वरोऽन्य आत्मनः | किन्तु जिनके मतमें ईश्वर आत्मा-
भेददृष्टे- | कार्यं चान्यत्तेषां | से भिन्न है और उसका कार्यरूप यह जगत् भी भिन्न है उनके भयकी
र्भयहेतुत्वम् | भयानिवृत्तिर्भयस्या- | निवृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि भय दूसरेके ही कारण हुआ करता
न्यनिमित्तत्वात् । सतश्चान्यस्यात्म- | है । अन्य पदार्थ यदि सत् होगा तब तो उसके स्वरूपका अभाव
हानानुपपत्तिः । न चासत आ- | नहीं हो सकता और यदि असत्

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३

त्मलाभः । सापेक्षस्यान्यस्य भय- | होगा तो उसके स्वरूपकी सिद्धि ही नहीं हो सकती । यदि कहो
हेतुत्वमिति चेन्न, तस्यापि तुल्य- | कि दूसरा ( ईश्वर ) तो [ हमारे धर्माधर्म आदिकी ] अपेक्षासे ही
त्वात् । यद्धर्माद्यनुसहायीभूतं | भयका कारण है, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि वह [ सापेक्ष ईश्वर ] भी वैसा ही है । जो कोई
नित्यमनित्यं वा निमित्तमपेक्ष्या- | [ ईश्वरादि ] दूसरा पदार्थ नित्य या अनित्य अधर्मादिरूप सहायक निमित्त-
न्यद्भयकारणं स्यात्तस्यापि तथा- | की अपेक्षासे भयका कारण होता है, यथार्थ होनेके कारण उसके स्वरूपका भी अभाव न होनेसे
भूतस्यात्महानाभावाद्भयानिवृत्तिः | उसके भयकी निवृत्ति नहीं हो सकती; और यदि उसके स्वरूपका अभाव
आत्महाने वा सदसतोरितरेत- | माना जाय तो सत् और असत्‌को इतरेतरत्व [ अर्थात् सत्‌को असत्त्व और असत्‌को सत्त्व ] की प्राप्ति
रापत्तौ सर्वत्रानाश्वास एव । | होनेसे कहीं विश्वास ही नहीं किया जा सकता ।
\hspace{1cm} एकत्वपक्षे पुनः सनिमित्तस्य | \hspace{0.5cm} परन्तु एकत्व-पक्ष स्वीकार करने-पर तो सारा संसार अपने कारणके
ज्ञानाज्ञानयो- \hspace{0.5cm} संसारस्य अविद्या- | सहित अविद्याकल्पित होनेके कारण कोई दोष ही नहीं आता । तिमिर
र्नात्मधर्मत्वम् \hspace{0.5cm} कल्पितत्वाददोषः । | रोगके कारण देखे गये द्वितीय चन्द्रमाके स्वरूपकी न तो प्राप्ति ही
तैमिरिकदृष्टस्य हि द्वितीयचन्द्र- | होती है और न नाश ही । यदि कहो कि ज्ञान और अज्ञान तो
स्य नात्मलाभो नाशो वास्ति । | आत्माके ही धर्म हैं [ इसलिये उनके कारण आत्माका विकार होता होगा ]
विद्याविद्ययोस्तद्धर्मत्वमिति चेन्न | तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि
प्रत्यक्षत्वात् । विवेकाविवेकौ | वे तो प्रत्यक्ष ( आत्माके दृश्य ) हैं ।

२०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
रूपादिवत्प्रत्यक्षावुपलभ्येते अन्तः-| रूप आदि विषयोंके समान अन्तः-
करणस्थौ । न हि रूपस्य | करणमें स्थित विवेक और अविवेक प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं । प्रत्यक्ष
प्रत्यक्षस्य सतो द्रष्टृधर्मत्वम् । | उपलब्ध होनेवाला रूप द्रष्टाका धर्म
अविद्या च स्वानुभवेन रूप्यते | नहीं हो सकता । 'मैं मूढ हूँ, मेरी बुद्धि मलिन है' इस प्रकार अविद्या
मूढोऽहमविविक्तं मम विज्ञान- | भी अपने अनुभवके द्वारा निरूपण
मिति । | की जाती है ।
तथा विद्याविवेकोऽनुभूयते । | इसी प्रकार विद्याका पार्थक्य भी अनुभव किया जाता है । बुद्धिमान्
उपदिशन्ति चान्येभ्य आत्मनो | लोग दूसरोंको अपने ज्ञानका उपदेश किया करते हैं । तथा दूसरे लोग
विद्याम्।तथा चान्येऽवधारयन्ति। | भी उसका निश्चय करते हैं । अतः
तस्मान्नामरूपपक्षस्यैव विद्याविद्ये | विद्या और अविद्या नाम-रूप पक्षके ही हैं, तथा नाम और रूप आत्माके
नामरूपे च नात्मधर्मौ । “नाम- | धर्म नहीं हैं, जैसा कि “जो नाम
रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा | और रूपका निर्वाह करनेवाला है तथा जिसके भीतर वे ( नाम
तद्ब्रह्म” ( छा० उ० ८ । १४ । | और रूप ) रहते हैं, वह ब्रह्म है”
१) इति श्रुत्यन्तरात् । ते च | इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वे नाम-रूप भी सूर्यमें दिन और
पुनर्नामरूपे सवितर्यहोरात्रे इव | रात्रिके समान कल्पित ही हैं,
कल्पिते न परमार्थतो विद्यमाने । | वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं ।
अभेदे “एतमानन्दमयमा- | पूर्व ०–किन्तु [ ईश्वर और जीवका ] अभेद माननेपर तो “वह इस
त्मानमुपसंक्रामति” ( तै० उ० | आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है”
२ । ८ । ५ ) इति कर्मकर्तृत्व-| इस श्रुतिमें जो [ पुरुषका ] कर्तृत्व और [ आनन्दमय आत्माका ] कर्मत्व बताया
नुपपत्तिरिति चेत् ? | है वह उपपन्न नहीं होता ?
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
न; विज्ञानमात्रत्वात्संक्रमण- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि पुरुष-
[संक्रमणशब्द-तात्पर्यम्] स्य । न जलूकादि- | का संक्रमण तो केवल विज्ञानमात्र
वत्संक्रमणमिहोप- | है । यहाँ जोंक आदिके संक्रमणके
समान पुरुषके संक्रमणका उपदेश
दिश्यते, किं तर्हि ? विज्ञानमात्रं | नहीं किया जाता । तो कैसा ?
इस संक्रमण-श्रुतिका अर्थ तो केवल
संक्रमणश्रुतेरर्थः । | विज्ञानमात्र है ।*
ननु मुख्यमेव संक्रमणं श्रूयत | पूर्व ०—'उपसंक्रामति' इस पदसे
यहाँ मुख्य संक्रमण ( समीप जाना )
उपसंक्रामतीति चेत् ? | ही अभिप्रेत हो तो ?
न; अन्नमयेऽदर्शनात् । न | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि अन्नमयमें
मुख्य संक्रमण देखा नहीं जाता—
ह्यन्नमयमुपसंक्रामतो बाह्यादस्मा- | अन्नमयको उपसंक्रमण करनेवालेका
ल्लोकाज्जलूकावत्संक्रमणं दृश्यते- | जोंकके समान इस बाह्य जगत्से
अथवा किसी और प्रकारसे संक्रमण
ऽन्यथा वा । | नहीं देखा जाता ।
मनोमयस्य बहिर्निर्गतस्य | पूर्व ०—बाहर [निकलकर विषयोंमें]
गये हुए मनोमय अथवा विज्ञानमय
विज्ञानमयस्य वा पुनः प्रत्या- | कोशोंका तो वहाँसे पुनः लौटनेपर
अपनी ओर होना संक्रमण हो ही
वृत्त्यात्मसंक्रमणमिति चेत् ? | सकता है ?
न; स्वात्मनि क्रियाविरोधा- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इससे
अपनेमें ही अपनी क्रिया होना—
दन्योऽन्नमयमन्यमुपसंक्रामतीति | यह विरोध उपस्थित होता है ।
अन्नमयसे भिन्न पुरुष अपनेसे भिन्न
प्रकृत्य मनोमयो विज्ञानमयो वा | अन्नमयको प्राप्त होता है—इस प्रकार

  • अर्थात् यहाँ 'संक्रमण', शब्दका अर्थ 'जाना' या 'पहुँचना' नहीं बल्कि 'जानना' है ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri