तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 211, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
न; विज्ञानमात्रत्वात्संक्रमण- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि पुरुष-
[संक्रमणशब्द-तात्पर्यम्] स्य । न जलूकादि- | का संक्रमण तो केवल विज्ञानमात्र
वत्संक्रमणमिहोप- | है । यहाँ जोंक आदिके संक्रमणके
समान पुरुषके संक्रमणका उपदेश
दिश्यते, किं तर्हि ? विज्ञानमात्रं | नहीं किया जाता । तो कैसा ?
इस संक्रमण-श्रुतिका अर्थ तो केवल
संक्रमणश्रुतेरर्थः । | विज्ञानमात्र है ।*
ननु मुख्यमेव संक्रमणं श्रूयत | पूर्व ०—'उपसंक्रामति' इस पदसे
यहाँ मुख्य संक्रमण ( समीप जाना )
उपसंक्रामतीति चेत् ? | ही अभिप्रेत हो तो ?
न; अन्नमयेऽदर्शनात् । न | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि अन्नमयमें
मुख्य संक्रमण देखा नहीं जाता—
ह्यन्नमयमुपसंक्रामतो बाह्यादस्मा- | अन्नमयको उपसंक्रमण करनेवालेका
ल्लोकाज्जलूकावत्संक्रमणं दृश्यते- | जोंकके समान इस बाह्य जगत्से
अथवा किसी और प्रकारसे संक्रमण
ऽन्यथा वा । | नहीं देखा जाता ।
मनोमयस्य बहिर्निर्गतस्य | पूर्व ०—बाहर [निकलकर विषयोंमें]
गये हुए मनोमय अथवा विज्ञानमय
विज्ञानमयस्य वा पुनः प्रत्या- | कोशोंका तो वहाँसे पुनः लौटनेपर
अपनी ओर होना संक्रमण हो ही
वृत्त्यात्मसंक्रमणमिति चेत् ? | सकता है ?
न; स्वात्मनि क्रियाविरोधा- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इससे
अपनेमें ही अपनी क्रिया होना—
दन्योऽन्नमयमन्यमुपसंक्रामतीति | यह विरोध उपस्थित होता है ।
अन्नमयसे भिन्न पुरुष अपनेसे भिन्न
प्रकृत्य मनोमयो विज्ञानमयो वा | अन्नमयको प्राप्त होता है—इस प्रकार
- अर्थात् यहाँ 'संक्रमण', शब्दका अर्थ 'जाना' या 'पहुँचना' नहीं बल्कि 'जानना' है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri