तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
सृज्यमानजगद्रचनादिविषयामा- कि आत्माने रचे जानेवाले जगत्की
लोचनामकरोदात्मेत्यर्थः । रचना आदिके विषयमें आलोचना की ।
स एवमालोच्य तपस्तप्त्वा इस प्रकार आलोचना अर्थात् तप
प्राणिकर्मादिनिमित्तानुरूपमिदं करके उसने प्राणियोंके कर्मादि
निमित्तोंके अनुरूप इस सम्पूर्ण
सर्वं जगद्देशतः कालतो नाम्ना जगत्को रचा, जो देश, काल,
रूपेण च यथानुभवं सर्वैः नाम और रूपसे यथानुभव सारी
प्राणिभिः सर्वावस्थैरनुभूयमानम- अवस्थाओंमें स्थित सभी प्राणियोंद्वारा
अनुभव किया जाता है । यह जो
सृजत सृष्टवान् । यदिदं किं च कुछ है अर्थात् सामान्यरूपसे यह
यत्किं चेदमविशिष्टम् । तदिदं जो कुछ जगत् है इसे रचकर उसने
जगत्सृष्ट्वा किमकरोदित्युच्यते- क्या किया, सो बतलाते हैं—वह उस
रचे हुए जगत्में ही अनुप्रविष्ट
तदेव सृष्टं जगदनुप्राविशदिति । हो गया ।
तत्रैतच्चिन्त्यं कथमनुप्राविश- अब यहाँ यह विचारना है कि
उसने किस प्रकार अनुप्रवेश किया ?
तस्य जगदनु- दिति । किं यः जो स्रष्टा था, क्या उसने स्वस्वरूपसे
प्रवेशः स्रष्टा स तेनैवात्म- ही अनुप्रवेश किया अथवा किसी
और रूपसे ? इनमें कौन-सा पक्ष
नानुपाविशदुतान्येनेति, किं ता- समीचीन है ? श्रुतिमें [ 'सृष्ट्वा' इस
क्रियामें ] 'क्त्वा' प्रत्यय होनेसे तो
वद्युक्तम् ? क्त्वाप्रत्ययश्रवणाद्यः यही ठीक जान पड़ता है कि जो स्रष्टा
स्रष्टा स एवानुप्राविशदिति । था उसीने पीछे प्रवेश भी किया । *
- 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकालिक क्रियामें हुआ करता है । हिन्दीमें इसी
अर्थमें 'कर' या 'के' प्रत्यय होता है; जैसे—'रामने श्यामको बुलाकर [ या
बुलाके ] धमकाया ।' इसमें यह नियम होता है कि पूर्वकालिक क्रिया और
मुख्य क्रियाका कर्ता एक ही होता है; जैसे कि उपर्युक्त वाक्यमें पूर्वकालिक
क्रिया 'बुलाकर' तथा मुख्य क्रिया 'धमकाया' इन दोनोंका कर्ता 'राम' ही है ।
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३
ननु न युक्तं मृद्वच्चेतत्कारणं पूर्व०-यदि ब्रह्म मृत्तिकाके
ब्रह्म तदात्मकत्वात्कार्यस्य । का- समान जगत्का कारण है तो
उसका कार्य तद्रूप होनेके कारण
रणमेव हि कार्यात्मना परिणत- उसमें उसका प्रवेश करना सम्भव
नहीं है। क्योंकि कारण ही कार्यरूप-
मित्यतोऽप्रविष्ट इव कार्योत्पत्ते- से परिणत हुआ करता है, अतः
किसी अन्य पदार्थके समान पहले
रूर्ध्वं पृथक्कारणस्य पुनः प्रवेशो- बिना प्रवेश किये कार्यकी उत्पत्तिके
ऽनुपपन्नः । न हि घटपरिणाम- अनन्तर उसमें कारणका पुनः प्रवेश
करना सर्वथा असम्भव है। घटरूप-
व्यतिरेकेण मृदो घटे प्रवेशो- में परिणत होनेके सिवा मृत्तिकाका
घटमें और कोई प्रवेश नहीं हुआ
ऽस्ति । यथा घटे चूर्णात्मना करता। हाँ, जिस प्रकार घटमें चूर्ण
मृदोऽनुप्रवेश एवमन्येनात्मना (बालू) रूपसे मृत्तिकाका अनु-
प्रवेश होता है उसी प्रकार किसी
नामरूपकार्येऽनुप्रवेश आत्मन इति अन्य रूपसे आत्माका नाम-रूप कार्यमें
चेच्छ्रुत्यन्तराच्च "अनेन जीवेना- भी अनुप्रवेश हो सकता है; जैसा
कि "इस जीवरूपसे अनुप्रवेश करके"
त्मनानुप्रविश्य" ( छा० उ० ६ । इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है
३ । २ ) इति । —यदि ऐसा मानें तो ?
नैवं युक्तमेकत्वाद्व्रह्मणः । मृ- सिद्धान्ती-ऐसा मानना उचित
नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो एक ही
दात्मनस्त्वनेकत्वात्सावयवत्वाच्च है। मृत्तिकारूप कारण तो अनेक
और सावयव होनेके कारण उसका
युक्तो घटे मृदश्चूर्णात्मनानु- घटमें चूर्णरूपसे अनुप्रवेश करना भी
सम्भव है; क्योंकि मृत्तिकाके चूर्णका
प्रवेशः । मृदश्चूर्णस्याप्रविष्टदेश- उस देशमें प्रवेश नहीं है; किन्तु
वत्त्वाच्च । न त्वात्मन एकत्वे आत्मा तो एक है, अतः उसके
इसी प्रकार 'अनुप्राविशत्' और 'सृष्ट्वा' इन दोनों क्रियाओंका कर्ता भी ब्रह्म
ही होना चाहिये ।