तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३
ननु न युक्तं मृद्वच्चेतत्कारणं पूर्व०-यदि ब्रह्म मृत्तिकाके
ब्रह्म तदात्मकत्वात्कार्यस्य । का- समान जगत्का कारण है तो
उसका कार्य तद्रूप होनेके कारण
रणमेव हि कार्यात्मना परिणत- उसमें उसका प्रवेश करना सम्भव
नहीं है। क्योंकि कारण ही कार्यरूप-
मित्यतोऽप्रविष्ट इव कार्योत्पत्ते- से परिणत हुआ करता है, अतः
किसी अन्य पदार्थके समान पहले
रूर्ध्वं पृथक्कारणस्य पुनः प्रवेशो- बिना प्रवेश किये कार्यकी उत्पत्तिके
ऽनुपपन्नः । न हि घटपरिणाम- अनन्तर उसमें कारणका पुनः प्रवेश
करना सर्वथा असम्भव है। घटरूप-
व्यतिरेकेण मृदो घटे प्रवेशो- में परिणत होनेके सिवा मृत्तिकाका
घटमें और कोई प्रवेश नहीं हुआ
ऽस्ति । यथा घटे चूर्णात्मना करता। हाँ, जिस प्रकार घटमें चूर्ण
मृदोऽनुप्रवेश एवमन्येनात्मना (बालू) रूपसे मृत्तिकाका अनु-
प्रवेश होता है उसी प्रकार किसी
नामरूपकार्येऽनुप्रवेश आत्मन इति अन्य रूपसे आत्माका नाम-रूप कार्यमें
चेच्छ्रुत्यन्तराच्च "अनेन जीवेना- भी अनुप्रवेश हो सकता है; जैसा
कि "इस जीवरूपसे अनुप्रवेश करके"
त्मनानुप्रविश्य" ( छा० उ० ६ । इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है
३ । २ ) इति । —यदि ऐसा मानें तो ?
नैवं युक्तमेकत्वाद्व्रह्मणः । मृ- सिद्धान्ती-ऐसा मानना उचित
नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो एक ही
दात्मनस्त्वनेकत्वात्सावयवत्वाच्च है। मृत्तिकारूप कारण तो अनेक
और सावयव होनेके कारण उसका
युक्तो घटे मृदश्चूर्णात्मनानु- घटमें चूर्णरूपसे अनुप्रवेश करना भी
सम्भव है; क्योंकि मृत्तिकाके चूर्णका
प्रवेशः । मृदश्चूर्णस्याप्रविष्टदेश- उस देशमें प्रवेश नहीं है; किन्तु
वत्त्वाच्च । न त्वात्मन एकत्वे आत्मा तो एक है, अतः उसके
इसी प्रकार 'अनुप्राविशत्' और 'सृष्ट्वा' इन दोनों क्रियाओंका कर्ता भी ब्रह्म
ही होना चाहिये ।