तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
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१०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
भिस्त्रिभिर्विशेषणैर्विशेष्यमाणं ब्रह्म | तीन विशेषणोंसे विशेषित होनेवाला
विशेष्यान्तरेभ्यो निर्धार्यते । एवं | ब्रह्म अन्य विशेष्योंसे पृथक्रूपसे निश्चय
हि तज्ज्ञानं भवति यदन्येभ्यो | किया जाता है । जिसका अन्य पदार्थों-
निर्धारितम् । यथा लोके नीलं | से पृथग्रूपसे निश्चय किया गया है
महत्सुगन्ध्युत्पलमिति । | उसका इसी प्रकार ज्ञान हुआ करता
| है; जैसे लोकमें 'नील' विशाल और
ननु विशेष्यं विशेषणान्तरं | सुगन्धित कमल [—ऐसा कहकर ऐसे
(पार्श्व-टिप्पणी: निर्विशेषस्य) व्यभिचरद्विशेष्यते । | कमलका अन्य कमलोंसे पृथक्रूपसे
(पार्श्व-टिप्पणी: विशेषणवत्त्वे) यथा नीलं रक्तं | निश्चय किया जाता है ] ।
(पार्श्व-टिप्पणी: आक्षेपः) चोत्पलमिति । यदा ह्यनेकानि | शङ्का—अन्य विशेषणोंका व्यावर्तन
द्रव्याण्येकजातीयान्यनेकविशेषण- | करनेपर ही कोई विशेष विशेषित
योगीनि च तदा विशेषणस्यार्थ- | हुआ करता है; जैसे—नीला अथवा
वत्त्वम् । न ह्येकस्मिन्नेव वस्तुनि | लाल कमल । जिस समय अनेक द्रव्य
विशेषणान्तरायोगात् । यथासा- | एक ही जातिके और अनेक विशेषणों-
वेक आदित्य इति, तथैकमेव च | की योग्यतावाले होते हैं तभी
ब्रह्म न ब्रह्मान्तराणि येभ्यो | विशेषणोंकी सार्थकता होती है। एक
विशेष्येत नीलोत्पलवत् । | ही वस्तुमें, किसी अन्य विशेषणका
न; लक्षणार्थत्वाद्विशेषणा- | सम्बन्ध न हो सकनेके कारण,
| विशेषणकी सार्थकता नहीं होती ।
| जिस प्रकार यह सूर्य एक है उसी प्रकार
(पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मविशेषणानां) नाम् । नायं दोषः; | ब्रह्म भी एक ही है; उसके सिवा अन्य
(पार्श्व-टिप्पणी: तल्लक्षणार्थत्वम्) कस्मात् ? यस्माल्ल- | ब्रह्म हैं ही नहीं, जिनसे कि नील
| कमलके समान उसकी विशेषता
क्षणार्थप्रधानानि विशेषणानि न | बतलायी जाय ।
| समाधान—ऐसा कहना ठीक
| नहीं है; क्योंकि ये विशेषण लक्षणके
| लिये हैं । [ अब इस सूत्ररूप वाक्य-
| की ही व्याख्या करते हैं—] यह
| दोष नहीं हो सकता; क्यों नहीं हो
| सकता ? क्योंकि ये विशेषण लक्षणार्थ-
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
विशेषणप्रधानान्येव । कः पुनर्ल- | प्रधान हैं, केवल विशेषणप्रधान ही
क्षणलक्ष्ययोर्विशेषणविशेष्ययोर्वा | नहीं हैं । किन्तु लक्षण-लक्ष्य तथा
| विशेषण-विशेष्यमें विशेषता (अन्तर)
विशेष इति ? उच्यते; समान- | क्या है ? सो बतलाते हैं—विशेषण
| तो अपने विशेष्यका उसके सजातीय
जातीयेभ्य एव निवर्तकानि | पदार्थोंसे ही व्यावर्तन करनेवाले
| होते हैं, किन्तु लक्षण उसे सभीसे
विशेषणानि विशेष्यस्य । लक्षणं | व्यावृत्त कर देता है; जिस प्रकार
तु सर्वत एव यथावकाशप्रदात्रा- | अवकाश देनेवाला 'आकाश' होता
| है—इस वाक्यमें है। *यह हम पहले
काशमिति । लक्षणार्थं च वाक्य- | ही कह चुके हैं कि यह वाक्य
मित्यवोचाम । | [आत्माका] लक्षण करनेके लिये है ।
सत्यादिशब्दा न परस्परं | सत्यादि शब्द परार्थ (दूसरेके
[सत्यमित्यस्य व्याख्यानम्] संबध्यन्ते परार्थ- | लिये) होनेके कारण परस्पर
त्वात् । विशेष्यार्था | सम्बन्धित नहीं हैं । वे तो विशेष्य-
हि ते । अत एकैको विशेषण- | के ही लिये हैं । अतः उनमेंसे
शब्दः परस्परं निरपेक्षो ब्रह्म- | प्रत्येक विशेषणशब्द परस्पर एक-
| दूसरेकी अपेक्षा न रखकर ही 'सत्यं
शब्देन संबध्यते सत्यं ब्रह्म | ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म, अनन्तं ब्रह्म' इस
ज्ञानं ब्रह्मानन्तं ब्रह्मेति । | प्रकार 'ब्रह्म' शब्दसे सम्बन्धित है ।
सत्यमिति यद्रूपेण यन्निश्चितं | सत्यम्—जो पदार्थ जिस रूपसे
| निश्चय किया गया है उससे व्यभि-
तद्रूपं न व्यभिचरति तत्सत्यम् । | चरित न होनेके कारण वह सत्य
| कहलाता है । जो पदार्थ जिस रूपसे
यद्रूपेण निश्चितं यत्तद्रूपं व्यभि- | निश्चित किया गया है उस रूपसे
- इस वाक्यमें 'अवकाश देनेवाला' यह पद उसके सजातीय अन्य
महाभूतोंसे तथा विजातीय आत्मा आदिसे भी व्यावृत्त कर देता है ।