तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
पृष्ठ 109, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 109विशेषणप्रधानान्येव । कः पुनर्ल- | प्रधान हैं, केवल विशेषणप्रधान ही
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
विशेषणप्रधानान्येव । कः पुनर्ल- | प्रधान हैं, केवल विशेषणप्रधान ही
क्षणलक्ष्ययोर्विशेषणविशेष्ययोर्वा | नहीं हैं । किन्तु लक्षण-लक्ष्य तथा
| विशेषण-विशेष्यमें विशेषता (अन्तर)
विशेष इति ? उच्यते; समान- | क्या है ? सो बतलाते हैं—विशेषण
| तो अपने विशेष्यका उसके सजातीय
जातीयेभ्य एव निवर्तकानि | पदार्थोंसे ही व्यावर्तन करनेवाले
| होते हैं, किन्तु लक्षण उसे सभीसे
विशेषणानि विशेष्यस्य । लक्षणं | व्यावृत्त कर देता है; जिस प्रकार
तु सर्वत एव यथावकाशप्रदात्रा- | अवकाश देनेवाला 'आकाश' होता
| है—इस वाक्यमें है। *यह हम पहले
काशमिति । लक्षणार्थं च वाक्य- | ही कह चुके हैं कि यह वाक्य
मित्यवोचाम । | [आत्माका] लक्षण करनेके लिये है ।
सत्यादिशब्दा न परस्परं | सत्यादि शब्द परार्थ (दूसरेके
[सत्यमित्यस्य व्याख्यानम्] संबध्यन्ते परार्थ- | लिये) होनेके कारण परस्पर
त्वात् । विशेष्यार्था | सम्बन्धित नहीं हैं । वे तो विशेष्य-
हि ते । अत एकैको विशेषण- | के ही लिये हैं । अतः उनमेंसे
शब्दः परस्परं निरपेक्षो ब्रह्म- | प्रत्येक विशेषणशब्द परस्पर एक-
| दूसरेकी अपेक्षा न रखकर ही 'सत्यं
शब्देन संबध्यते सत्यं ब्रह्म | ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म, अनन्तं ब्रह्म' इस
ज्ञानं ब्रह्मानन्तं ब्रह्मेति । | प्रकार 'ब्रह्म' शब्दसे सम्बन्धित है ।
सत्यमिति यद्रूपेण यन्निश्चितं | सत्यम्—जो पदार्थ जिस रूपसे
| निश्चय किया गया है उससे व्यभि-
तद्रूपं न व्यभिचरति तत्सत्यम् । | चरित न होनेके कारण वह सत्य
| कहलाता है । जो पदार्थ जिस रूपसे
यद्रूपेण निश्चितं यत्तद्रूपं व्यभि- | निश्चित किया गया है उस रूपसे
- इस वाक्यमें 'अवकाश देनेवाला' यह पद उसके सजातीय अन्य
महाभूतोंसे तथा विजातीय आत्मा आदिसे भी व्यावृत्त कर देता है ।