तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते ।
भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह
इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा
एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद ।
स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥
'भूः, भुवः और सुवः' ये तीन व्याहृतियाँ हैं । उनमेंसे 'महः'
इस चौथी व्याहृतिको माहाचमस्य ( महाचमसका पुत्र ) जानता है ।
वह महः ही ब्रह्म है । वही आत्मा है । अन्य देवता उसके अङ्ग ( अवयव )
हैं । 'भूः' यह व्याहृति यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्षलोक है
और 'सुवः' यह स्वर्गलोक है ॥ १ ॥ तथा 'महः' आदित्य है । आदित्यसे
ही समस्त लोक वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही अग्नि है, 'भुवः
वायु है, 'सुवः' आदित्य है तथा 'महः' चन्द्रमा है । चन्द्रमासे ही
सम्पूर्ण ज्योतियाँ वृद्धिको प्राप्त होती हैं । 'भूः' यही ऋक् है, 'भुवः'
साम है, 'सुवः' यजुः है ॥ २ ॥ तथा 'महः' ब्रह्म है । ब्रह्मसे ही
समस्त वेद वृद्धिको प्राप्त होते हैं । 'भूः' यही प्राण है, 'भुवः'
अपान है, 'सुवः' व्यान है तथा 'महः' अन्न है । अन्नसे ही समस्त
प्राण वृद्धिको प्राप्त होते हैं । इस प्रकार ये चार व्याहृतियाँ हैं । इनमेंसे
प्रत्येक चार-चार प्रकारकी है । जो इन्हें जानता है वह ब्रह्मको
जानता है । सम्पूर्ण देवगण उसे बलि ( उपहार ) समर्पण करते हैं ॥३॥
भूर्भुवःसुवरिति;इतीत्युक्तोप- | 'भूर्भुवः सुवरिति' इसमें 'इति'
| शब्द पूर्वकथित [ व्याहृतियों ] को
प्रदर्शनार्थः । एता- | ही प्रदर्शित करनेके लिये है;
[हाशिए में: व्याहृतिचतुष्टयम्]
स्तिस्र इति च प्रद- | 'एतास्तिस्रः' ये शब्द भी पूर्व-
| प्रदर्शित [ व्याहृतियों ] के ही
र्शितानां परामर्शार्थः । परामृष्टाः | परामर्शके लिये हैं । 'वै' इस
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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
स्मार्यन्ते वा इत्यनेन । तिस्र एताः | अव्ययसे परामृष्ट व्याहृतियोंका
| स्मरण कराया जाता है। अर्थात्
प्रसिद्धा व्याहृतयः स्मार्यन्ते | [इन शब्दोंसे] ये तीन प्रसिद्ध
| व्याहृतियाँ स्मरण दिलायी जाती
तावत् । तासामियं चतुर्थी | हैं। उनमें 'महः' यह चौथी
व्याहृतिर्मह इति । तामेतां चतुर्थी | व्याहृति है । उस इस चौथी
| व्याहृतिको महाचमसका पुत्र माहा-
महाचमसस्यापत्यं माहाचमस्यः | चमस्य जानता है । किन्तु 'उ ह
| स्म' ये तीन निपात अतीत घटना-
प्रवेदयते । उ ह स्म इत्येतेषां वृत्ता- | का अनुकथन करनेके लिये होनेके
| कारण इसका अर्थ 'जानता था'
नुकथनार्थत्वाद्विदितवान्ददर्श- | 'देखा था' इस प्रकार होगा ।
त्यर्थः । माहाचमस्यग्रहणमार्षा- | [व्याहृतिके द्रष्टा] ऋषिका अनु-
| स्मरण करनेके लिये 'माहाचमस्य'
नुस्मरणार्थम् । ऋषिसंस्मरणमप्यु- | यह नाम लिया गया है । इस प्रकार
| यहाँ उपदेश होनेके कारण यह
पासनाङ्कमिति गम्यत इहो- | जाना जाता है कि ऋषिका अनु-
पदेशात् । | स्मरण भी उपासनाका एक अङ्ग है।
येयं माहाचमस्येन दृष्टा व्या- | जिस 'महः' नामक व्याहृतिको
| माहाचमस्यने देखा था वह ब्रह्म है ।
[व्याहृतिषु महसः] हृतिर्मह इति तद्ब्रह्म । | ब्रह्म भी महान् है और व्याहृति भी
[प्राधान्यम्] महद्धि ब्रह्म महश्च | महः है। और वह क्या है? वही
| आत्मा है । 'व्याप्ति' अर्थवाले
व्याहृतिः। किं पुनस्तत् ? स आत्मा। | 'आप्' धातुसे 'आत्मा' शब्द
आप्नोतेर्व्याप्तिकर्मणः आत्मा । | निष्पन्न होता है । क्योंकि लोक,
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