तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
३८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
यशो जनेऽसानि स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि
स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश
स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा ।
यथापः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम् । एवं मां
ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि
प्र मा पाहि प्र मा पद्यस्व ॥ ३ ॥
मैं जनतामें यशस्वी होऊँ—स्वाहा । मैं अत्यन्त प्रशंसनीय और
धनवान् होऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! मैं उस ब्रह्मकोशभूत तुझमें प्रवेश कर
जाऊँ—स्वाहा । हे भगवन् ! वह तू मुझमें प्रवेश कर--स्वाहा । हे भगवन् !
उस सहस्रशाखायुक्त [ अर्थात् अनकों भेदवाले ] तुझमें मैं अपने पापा-
चरणोंका शोधन करता हूँ—स्वाहा । जिस प्रकार जल निम्न प्रदेशकी
ओर जाता है तथा महीने अहर्जर—संवत्सरमें अन्तर्हित हो जाते हैं,
उसी प्रकार हे धातः ! ब्रह्मचारीलोग सब ओरसे मेरे पास आवें--
स्वाहा । तू [ शरणागतोंका ] आश्रयस्थान है अतः मेरे प्रति भासमान
हो, तू मुझे प्राप्त हो ॥ ३ ॥
यशो यशस्वी जने जनसमूहे- | मैं जनतामें यशस्वी होऊँ तथा
ऽसानि भवानि। श्रेयान्प्रशस्यतरो | श्रेयान्-प्रशस्यतर और वस्यसः-
वस्यसो वसीयसो वसुतराद्वसुमत्त- | वसीयसः अर्थात् वसुमान्से भी
राद्वासानीत्यन्वयः । किं च तं | वसुमान् यानी अत्यन्त धनी पुरुषों-
से भी विशेष धनवान् होऊँ । तथा
ब्रह्मणः कोशभूतं त्वा त्वां हे भग | हे भग-भगवन्-पूजनीय ! ब्रह्मके
कोशभूत उस तुझमें मैं प्रवेश करूँ;
भगवन्पूज्यावन्प्रविशानि प्रविश्य | तात्पर्य यह है कि तुझमें प्रवेश करके
चानन्यस्त्वदात्मैव भवानीत्यर्थः। | तुझसे अनन्य हो मैं तेरा ही रूप
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अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
स त्वमपि मा मां भग भगवन् | हो जाऊँ; तथा तू भी, हे भग-
प्रविश । आवयोरेकत्वमेवास्तु । | भगवन् ! मुझमें प्रवेश कर । अर्थात्
| हम दोनोंकी एकता ही हो जाय । हे
तस्मिंस्त्वयि सहस्रशाखे बहु- | भगवन् ! उस सहस्रशाख-अनेकों
शाखाभेदे हे भगवन्, निमृजे | शाखाभेदवाले तुझमें मैं अपने पाप-
शोधयाम्यहं पापकृत्याम् । | कर्मोंका शोधन करता हूँ ।
यथा लोक आपः प्रवता | लोकमें जिस प्रकार जल प्रवण-
प्रवणवता निम्नवता देशेन यन्ति | वान्-निम्नतायुक्त देशकी ओर जाते
गच्छन्ति । यथा च मासा | हैं और महीने जिस प्रकार अहर्जरमें
अहर्जरं संवत्सरोऽहर्जरः । | अन्तर्हित होते हैं। अहर्जर संवत्सर-
अहोभिः परिवर्तमानो लोकान्जर- | को कहते हैं; क्योंकि वह अहः
यतीत्यहानि वास्मिञ्जीर्यन्त्यन्त- | दिनोंके रूपमें परिवर्तित होता हुआ
र्भवन्तीत्यहर्जरः । तं च यथा | लोकोंको जीर्ण करता है अथवा
मासा यन्त्येवं मां ब्रह्मचारिणो | उसमें अहः-दिन जीर्ण यानी
हे धातः सर्वस्य विधातः मामा- | अन्तर्भूत होते हैं इसलिये वह
यन्त्वागच्छन्तु सर्वतः सर्व- | अहर्जर है । उस संवत्सरमें जिस
दिग्भ्यः । | प्रकार महीने जाते हैं उसी प्रकार
| हे धातः ! मेरे पास सब ओरसे-
| सम्पूर्ण दिशाओंसे ब्रह्मचारीलोग
| आवें ।
प्रतिवेशः-श्रमापनयनस्थान- | 'प्रतिवेश' श्रमनिवृत्तिके स्थान
मासन्नगृहमित्यर्थः । एवं त्वं | अर्थात् समीपवर्ती गृहको कहते हैं ।
प्रतिवेश इव प्रतिवेशस्त्वच्छी- | इस प्रकार तू प्रतिवेशके समान प्रति-
लिनां सर्वपापदुःखापनयनस्था- | वेश यानी अपना अनुशीलन करने-
नमसि, अतो मा मां प्रति प्रभाहि | वालोंका दुःखनिवृत्तिका स्थान है ।
| अतः तू मेरे प्रति अपनेको प्रकाशित
प्रकाशयात्मानं प्रपद्यस्व च । | कर और मुझे प्राप्त हो; अर्थात्
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