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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
जो वेदोंमें ऋषभ ( श्रेष्ठ अथवा प्रधान ) और सर्वरूप है तथा
वेदरूप अमृतसे प्रधानरूपसे आविर्भूत हुआ है वह [ ओंकाररूप ] इन्द्र
( सम्पूर्ण कामनाओंका ईश ) मुझे मेधासे प्रसन्न अथवा बलयुक्त करे ।
हे देव ! मैं अमृतत्व ( अमृतत्वके हेतुभूत ब्रह्मज्ञान ) का धारण करने-
वाला होऊँ । मेरा शरीर विचक्षण (योग्य) हो । मेरी जिह्वा अत्यन्त मधुमती
( मधुर भाषण करनेवाली ) हो । मैं कानोंसे खूब श्रवण करूँ । [ हे
ओंकार ! ] तू ब्रह्मका कोष है और लौकिक बुद्धिसे ढँका हुआ है
[ अर्थात् लौकिक बुद्धिके कारण तेरा ज्ञान नहीं होता ] । तू मेरी
श्रवण की हुई विद्याकी रक्षा कर । मेरे लिये वस्त्र, गौ और अन्न-पानको
सर्वदा शीघ्र ही ले आनेवाली और इनका विस्तार करनेवाली श्रीको
[ भेड़-बकरी आदि ] ऊनवाले तथा अन्य पशुओंके सहित बुद्धि प्राप्त
करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे पास
आवें-स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग मेरे प्रति निष्कपट हों—स्वाहा । ब्रह्मचारी-
लोग प्रमा ( यथार्थ ज्ञान ) को धारण करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग
दम ( इन्द्रियदमन ) करें—स्वाहा । ब्रह्मचारीलोग शम ( मनोनियम )
करें—स्वाहा । [ इन मन्त्रोंके पीछे जो 'स्वाहा' शब्द है वह इस
बातको सूचित करता है कि ये हवनके लिये हैं ] ॥ १-२ ॥
यश्छन्दसां वेदानाम्पृषभ | जो [ ओंकार ] प्रधान होनेके
कारण छन्द- वेदोंमें श्रेष्ठके समान
ओङ्कारतो बुद्धि- इवर्षभः प्राधान्यात् । श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण वाणीमें व्याप्त
बलं प्रार्थ्यते विश्वरूपः सर्वरूपः होनेके कारण विश्वरूप यानी सर्वमय
है; जैसा कि “जिस प्रकार शङ्कुओं
सर्ववाग्व्याप्तेः । “तद्यथा श- ( पत्तोंकी नसों ) से [ सम्पूर्ण पत्ते
व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकारसे
ङ्कना" (छा० उ० २।२३।३) सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है-ओंकार ही
यह सब कुछ है ]" इस एक अन्य
इत्यादि श्रुत्यन्तरात् । अत एव- श्रुतिसे सिद्ध होता है । इसीलिये

अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५


[वाम स्तम्भ / संस्कृत भाष्य]

र्षभत्वमोङ्कारस्य । ओङ्कारो
ह्यत्रोपास्य इति ऋषभादि-
शब्दैः स्तुतिर्न्याय्यैवोङ्कारस्य ।
छन्दोभ्यो वेदेभ्यो वेदा ह्यमृतं
तस्मादमृतादधिसंबभूव । लोक-
देववेदव्याहृतिभ्यः सारिष्ठं
जिघृक्षोः प्रजापतेस्तपस्यत
ओङ्कारः सारिष्ठत्वेन प्रत्यभा-
दित्यर्थः । न हि नित्यस्योङ्कार-
स्याञ्जसैवोत्पत्तिरेव कल्प्यते ।
स एवंभूत ओङ्कार इन्द्रः सर्व-
कामेशः परमेश्वरो मा मां मेधया
प्रज्ञया स्पृणोतु प्रीणयतु बलयतु
वा । प्रज्ञाबलं हि प्रार्थ्यते ।
अमृतस्य अमृतत्वहेतुभूतस्य
ब्रह्मज्ञानस्य तदधिकारात्, हे
देव धारणी धारयिता भूयासं
भवेयम् । किं च शरीरं मे मम
विचर्षणं विचक्षणं योग्यमित्ये-
तत् । भूयादिति प्रथमपुरुष-
विपरिणामः । जिह्वा मे मधु-


[दक्षिण स्तम्भ / हिन्दी भाष्यार्थ]

ओंकारकी श्रेष्ठता है । यहाँ ओंकार
ही उपासनीय है, इसलिये 'ऋषभ'
आदि शब्दोंसे ओंकारकी स्तुति की
जानी उचित ही है । छन्द अर्थात्
वेदोंसे—वेद ही अमृत हैं, उस
अमृतसे जो प्रधानरूपसे हुआ है ।
तात्पर्य यह है कि लोक, देव, वेद
और व्याहृतियोंसे सर्वोत्कृष्ट सार ग्रहण
करनेकी इच्छासे तप करते हुए प्रजा-
पतिको ओंकार ही सर्वोत्तम साररूपसे
भासित हुआ था; क्योंकि नित्य
ओंकारकी साक्षात् उत्पत्तिकी कल्पना
नहीं की जा सकती । वह इस
प्रकारका ओंकाररूप इन्द्र—सम्पूर्ण
कामनाओंका स्वामी परमेश्वर मुझे
मेधाद्वारा प्रसन्न अथवा सबल करे;
इस प्रकार यहाँ बुद्धिबलके लिये
प्रार्थना की जाती है ।
हे देव ! मैं अमृत—अमृतत्वके
हेतुभूत ब्रह्मज्ञानका धारण करने-
वाला होऊँ; क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञान-
का ही प्रसङ्ग है । तथा मेरा शरीर
विचर्षण—विचक्षण अर्थात् योग्य
हो । [ मूलमें ‘भूयासम्’ (होऊँ) यह
उत्तम पुरुषका प्रयोग है इसे ]
‘भूयात्’ (हो) इस प्रकार प्रथम पुरुष-
में परिणत कर लेना चाहिये । मेरी