श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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About this granth
Sri Ramakrishna Vachanamrita (श्री रामकृष्ण वचनामृत) is the Hindi version of the Sri Sri Ramakrishna Kathamrita, the record of Sri Ramakrishna Paramahamsa's conversations kept by his householder disciple Mahendranath Gupta, who wrote as 'M'. Gupta noted the talks at Dakshineswar and Calcutta between 1882 and 1886 in his diary, with dates, which gives the work the feel of an eyewitness account.
This first part is the translation by the Hindi poet Suryakant Tripathi 'Nirala'. It is arranged in numbered sections, each tied to a date such as 11 March, 16 October or 28 October 1882, and covers Ramakrishna's teaching on God-realisation, devotion and knowledge, spiritual life for householders, maya and the harmony of religions, told through his everyday parables. A foreword and introduction open the volume.
The copy comes from the library of Gurukul Kangri University, Haridwar, and has about 711 pages.
२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद ९५ ६७५
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२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद ९५ ६७५
"ज्ञान किसे कहते हैं? इसी स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना और मन को उसी में लगाये रहना – इस शुद्ध आत्मा को जानना – यही ज्ञान है।
कर्म कब तक? प्रथम माया के संसार का त्याग, फिर ब्रह्मज्ञान
"कर्म कब तक है? – जब तक देहाभिमान रहता है अर्थात् देह ही मैं हूँ, यह बुद्धि रहती है। यह बात गीता में लिखी है।
"देह पर आत्मा-बुद्धि का आरोप करना ही अज्ञान है।
(शिवपुर के ब्राह्मभक्त से) "आप क्या ब्राह्म हैं?"
ब्राह्म – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – मैं निराकार साधक का मुँह और उसकी आँखें देखकर उसे समझ लेता हूँ। आप जरा डूबिये; ऊपर उतराते रहियेगा तो रत्न आपको नहीं मिल सकता। मैं साकार और निराकार सब मानता हूँ।
बड़ाबाजार के मारवाड़ी भक्तों ने आकर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उन लोगों की प्रशंसा कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – अहा! ये सब कैसे भक्त हैं! सब के सब श्रीठाकुरजी के दर्शन करते हैं, स्तुतियाँ पढ़ते हैं और प्रसाद पाते हैं। इस बार इन लोगों ने जिसे पुरोहित रखा है, वह भागवत का पण्डित है।
मारवाड़ी भक्त – 'मैं तुम्हारा दास हूँ', यह जो कहता है वह 'मैं' कौन है?
श्रीरामकृष्ण – लिंग-शरीर या जीवात्मा है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, इन चारों के मेल से लिंग-शरीर होता है।
मारवाड़ी – जीवात्मा कौन हैं?
श्रीरामकृष्ण – अष्ट-पाशों से बँधा हुआ आत्मा; और चित्त उसे कहते हैं जो (किसी चीज की याद आने पर) 'अहा' कर उठता है।
मारवाड़ी भक्त – महाराज, मरने पर क्या होता है?
श्रीरामकृष्ण – गीता के मत से मरते समय जीव जो कुछ सोचता है, वही हो जाता है। भरत ने हरिण सोचा था, इसलिए वह वही हो भी गया था। यही कारण है कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए साधना की आवश्यकता है। दिन-रात उनकी चिन्ता करते रहने पर मरते समय भी उन्हीं की चिन्ता होगी।
मारवाड़ी भक्त – अच्छा, महाराज, विषय से वैराग्य क्यों नहीं होता?
श्रीरामकृष्ण – इसे ही माया कहते हैं। माया से सत् असत् और असत् सत् जान पड़ता है।
"सत् अर्थात् जो नित्य है – परब्रह्म हैं। असत् संसार है – अनित्य है।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
६७६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४
"पढ़ने से क्या होता है? साधना और तपस्या चाहिए। उन्हें पुकारो।
" 'भंग-भंग चिल्लाने से क्या होगा? कुछ पीना चाहिए।
"यह संसार काँटे के पेड़ की तरह है। हाथ लगाओं तो खून निकल आता है। अगर काँटे के पेड़ के सम्बन्ध में बैठे ही बैठे यह कल्पना करते रहें कि पेड़ जल गया, तो क्या इससे वह कभी जला जाता है? ज्ञानाग्नि लाओ, वही आग लगाओ, तब पेड़ कहीं जल सकता है।
"साधना की अवस्था में कुछ परिश्रम करना पड़ता है। फिर तो सीधा मार्ग है। मोड़ पार करके अनुकूल वायु में पाल लगाकर नाव छोड़ दो।
"जब तक माया के घेरे के भीतर हो, जब तक माया के मेघ हैं, तब तक ज्ञान-सूर्य की किरणें नहीं फैल सकतीं। माया का घेरा पार कर जब बाहर आकर खड़े हो जाओगे तब ज्ञान-सूर्य अविद्या का नाश कर देगा। घर के भीतर ले आने पर आतशी शीशे से कोई काम नहीं हो सकता। घर के घेरे से बाहर खड़े होने पर जब धूप उस पर गिरती है तब उसकी ज्वाला से कागज जल जाता है।
"और बादलों के रहने पर भी आतशी शीशे से कागज नहीं जलता। बादलों के हट जाने पर ही वह काम कर सकेगा।
"कामिनी और कांचन के घेरे से जरा हटकर खड़े होने पर, अलग रहकर कुछ साधना करने पर मन का अन्धकार दूर होता है - अविद्या और अहंकार के बादल हट जाते हैं - ज्ञान-लाभ होता है।
"कामिनी और कांचन ही बादल हैं।"
(७)
श्रीरामकृष्ण का कांचन-त्याग
श्रीरामकृष्ण – (मारवाड़ी से) – त्यागियों के नियम बड़े कठिन हैं। कामिनी और कांचन का संसर्ग लेशमात्र भी न रहना चाहिए। रुपया अपने हाथ से तो छूना ही न चाहिए; परन्तु दूसरे के पास रखने की भी कोई व्यवस्था न रहनी चाहिए।
"लक्ष्मीनारायण मारवाड़ी था, वेदान्तवादी भी था, प्रायः यहाँ आया करता था। मेरा बिस्तरा मैला देखकर उसने कहा, मैं आपके नाम दस हजार रुपया लिख दूँगा, उसके ब्याज से आपकी सेवा होती रहेगी।
"उसने यह बात कही नहीं कि मैं जैसे लाठी की चोट खाकर बेहोश हो गया।
"होश आने पर उससे कहा, तुम्हें अगर ऐसी बातें करनी हों, तो यहाँ फिर कभी न आना। मुझमें रुपया छूने की शक्ति ही नहीं है, और न मैं रुपया पास ही रख सकता हूँ।
"उसकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म थी। उसने कहा, 'तो अब भी आपके लिए त्याज्य और
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ग्राह्य है! तो आपको अभी ज्ञान नहीं हुआ।'
“मैंने कहा, नहीं भाई, इतना ज्ञान मुझे नहीं हुआ। (सब हँसते हैं।)
“लक्ष्मीनारायण ने तब वह धन हृदय के हाथ में देना चाहा। मैंने कहा – 'तो मुझे कहना होगा, इसे दे, उसे दे'; अगर उसने न दिया तो क्रोध का आना अनिवार्य होगा। रुपयों का पास रहना ही बुरा है। ये सब बातें न होंगी।
“आईने के पास अगर कोई वस्तु रखी हुई हो, तो क्या उसका प्रतिबिम्ब न पड़ेगा?”
मारवाड़ी भक्त – महाराज, क्या गंगा में शरीर-त्याग होने पर मुक्ति होती है?
श्रीरामकृष्ण – ज्ञान होने ही से मुक्ति होती है। चाहे जहाँ रहो – चाहे महा कलुषित स्थान में प्राण निकलें, और चाहे गंगातट ही हो; ज्ञानी की मुक्ति अवश्य होगी।
“परन्तु हाँ, अज्ञानी के लिए गंगातट ठीक है।”
मारवाड़ी भक्त – महाराज, काशी में मुक्ति कैसे होती हैं?
श्रीरामकृष्ण – काशी में मृत्यु होने पर शिव के दर्शन होते हैं। शिव प्रकट होकर कहते हैं – 'मेरा यह साकार रूप मायिक है, मैं भक्तों के लिए वह रूप धारण करता हूँ – यह देख, मैं अखण्ड सच्चिदानन्द में लीन होता हूँ।' यह कहकर वह रूप अन्तर्धान हो जाता है।
“पुराण के मत से चाण्डाल को भी अगर भक्ति हो, तो उसकी भी मुक्ति होगी। इस मत के अनुसार नाम लेने से ही काम होता है। योग, तन्त्र, मन्त्र, इनकी कोई आवश्यकता नहीं है।
“वेद का मत अलग है। ब्राह्मण हुए बिना मुक्ति नहीं होती। और मन्त्रों का यथार्थ उच्चारण अगर नहीं होता तो पूजा का ग्रहण ही नहीं होता। याग, यज्ञ, मन्त्र, तन्त्र, इन सब का अनुष्ठान यथाविधि करना चाहिए।
“कलिकाल में वेदोक्त कर्मों के करने का समय कहाँ है? इसीलिए कलि में नारदीय भक्ति चाहिए।
“कर्मयोग बड़ा कठिन है। निष्काम कर्म अगर न कर सके तो वह बन्धन का ही कारण होता है। इस पर आजकल प्राण अन्नगत हो रहे हैं। अतएव विधिवत् सब कर्मों के करने का समय नहीं रहा। दशमूल-पाचन अगर रोगी को खिलाया जाता है तो इधर उसके प्राण ही नहीं रहते, अतएव चाहिए फीवर-मिक्सचर।
“नारदीय भक्ति है – उनके नाम और गुणों का कीर्तन करना।
“कलिकाल के लिए कर्मयोग ठीक नहीं, भक्तियोग ही ठीक है।
“संसार में कर्मों का भोग जितने दिनों के लिए है, उतने दिन तक भोग करो, परन्तु भक्ति और अनुराग चाहिए। उनके नाम और गुणों का कीर्तन करने पर कर्मों का क्षय हो
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जाता है।
"सदा ही कर्म नहीं करते रहना पड़ता। उन पर जितनी ही शुद्धा भक्ति और प्रीति होगी, कर्म उतने ही घटते जायेंगे। उन्हें प्राप्त करने पर कर्मों का त्याग हो जाता है। गृहस्थ की बहू को जब गर्भ होता है तो उसकी सास उसका काम घटा देती है। लड़का होने पर उसे काम नहीं करना पड़ता।"
शुभ संस्कार तथा ईश्वर के लिए व्याकुलता
दक्षिनेश्वर मौजे से कुछ लड़के आये। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। वे लोग आसन ग्रहण करके श्रीरामकृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं। दिन के चार बजे होंगे।
एक लड़का — महाराज, ज्ञान किसे कहते हैं?
श्रीरामकृष्ण — ईश्वर सत् हैं और सब असत्, इसके जानने का नाम ज्ञान है।
"जो सत् हैं उनका एक और नाम ब्रह्म है, एक दूसरा नाम है काल। इसीलिए लोग कहा करते हैं — अरे भाई, काल में कितने आये और कितने चले गये।
"काली वे हैं जो काल के साथ रमण करती हैं। आद्याशक्ति वे ही हैं। काल और काली, ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं।
"संसार अनित्य है, वे नित्य हैं। संसार इन्द्रजाल है, बाजीगर ही सत्य है, उसका खेल अनित्य है।"
लड़का — संसार अगर माया है, इन्द्रजाल है, तो यह दूर क्यों नहीं होता?
श्रीरामकृष्ण — संस्कार-दोषों के कारण यह माया नहीं जाती। कितने ही जन्मों तक इस माया के संसार रहने के कारण यह सच जान पड़ती है।
"संस्कार में कितनी शक्ति है, सुनो। एक राजा का लड़का पिछले जन्म में धोबी के घर पैदा हुआ था। राजा का लड़का होकर जब वह खेल रहा था, तब अपने साथियों से उसने कहा, ये सब खेल रहने दो, मैं पेट के बल लेटता हूँ, तुम लोग मेरी पीठ पर कपड़े पटको!
"यहाँ बहुत से लड़के आते हैं, परन्तु कोई कोई ईश्वर के लिए व्याकुल हैं। वे अवश्य ही संस्कार लेकर आये हैं।
"वे सब लड़के विवाह की बात पर रो देते हैं। स्वयं विवाह की बात तो सोचते ही नहीं। निरंजन बचपन से ही कहता है मैं विवाह न करूँगा।
"बहुत दिन हो गये (बीस वर्ष से अधिक) यहाँ वराहनगर से दो लड़के आते थे, एक का नाम था गोविन्द पाल, दूसरे का गोपाल सेन। उनका मन बचपन से ही ईश्वर पर था। विवाह की बात होने पर डर से सिकुड़ जाते थे। गोपाल को भावसमाधि होती थी। विषयी-मनुष्यों को देखकर वह दब जाता था जैसे बिल्ली को देखकर चूहे। जब ठाकुरों
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(Tagore) के लड़के उस बगीचे में घूमने के लिए गये हुए थे, तब उसने अपने घर का दरवाजा बन्द कर लिया था, इसलिए कि कहीं उनसे बातचीत न करनी पड़े।
“पञ्चवटी के नीचे गोपाल को भावावेश हो गया था। उसी अवस्था में मेरे पैरों पर हाथ रखकर उसने कहा, ‘अब मुझे जाने दीजिये। अब इस संसार में मुझ से रहा नहीं जाता – आपको अभी बहुत देर हैं – मुझे जाने दीजिये।’ मैंने भी भावावस्था में कहा – ‘तुम्हें फिर आना होगा।’ उसने कहा – ‘अच्छा, फिर आऊँगा।’
“कुछ दिन बाद गोविन्द आकर मिला। मैंने पूछा, गोपाल कहाँ है? उसने कहा, गोपाल चला गया (उसका निधन हो गया)।
“दूसरे लड़के देखो, किस चिन्ता में घूम रहे हैं! – किस तरह धन हो – गाड़ी हो – मकान हो – वस्त्राभूषण हो – फिर विवाह हो – इसी के लिए घूम रहे हैं। विवाह करना है, तो लड़की कैसी है, इसकी पहले खोज करते हैं और सुन्दर है या नहीं, इसकी जाँच करने के लिए स्वयं जाते हैं।
“एक आदमी मेरी बड़ी निन्दा करता है। बस यही कहता है कि ये लड़कों को प्यार करते हैं। जिनके अच्छे संस्कार हैं, जो शुद्धात्मा हैं, ईश्वर के लिए व्याकुल होते हैं, रुपया, शरीर-सुख इन सब वस्तुओं की ओर जिनका मन नहीं है, मैं उन्हीं को प्यार करता हूँ।
“जिन्होंने विवाह कर लिया है, उनकी अगर ईश्वर पर भक्ति हो, तो वे संसार में लिप्त न हो जायेंगे। हीरानन्द ने विवाह किया है तो इससे क्या हुआ? वह संसार में अधिक लिप्त न होगा।”
हीरानन्द सिन्ध का रहनेवाला, बी. ए. पास एक ब्राह्मसमाजी है।
मणिलाल, शिवपुर के ब्राह्मभक्त, मारवाड़ी भक्त, श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके बिदा हुए।
(८)
कर्मत्याग कब?
शाम हो गयी। दक्षिण के बरामदे में और पश्चिमवाले गोल बरामदे में दीपक जलाये जा चुके हैं। श्रीरामकृष्ण के कमरे का प्रदीप जला दिया गया, कमरे में धूप दी गयी।
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए माता का नाम ले रहे हैं। कमरे में मास्टर, श्रीयुत प्रिय मुखर्जी और उनके आत्मीय हरि बैठे हैं। कुछ देर तक ध्यान और चिन्तन कर लेने पर श्रीरामकृष्ण भक्तों से वार्तालाप करने लगे। अब श्रीठाकुरमन्दिर में आरती ही की देर है।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – जो दिन-रात उनकी चिन्ता कर रहा है उसके लिए सन्ध्या की क्या जरूरत है?
६८० श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४
“सन्ध्या गायत्री में लीन हो जाती है और गायत्री ओंकार में।
“एक बार ॐ कहने के साथ ही जब समाधि हो जाय तब समझना चाहिए कि अब साधु साधन-भजन में पक्का हो गया।
“हृषीकेश में एक साधु सुबह उठकर, जहाँ एक बहुत बड़ा झरना है, वहाँ जाकर खड़ा होता है। दिन भर वही झरना देखता है और ईश्वर से कहता है, ‘वाह, खूब बनाया है तुमने! कितने आश्चर्य की बात है!’ उसके लिए जप-तप कुछ नहीं है। रात होने पर वह अपनी कुटी पर लौट जाता है।
“निराकार या साकार इन सब बातों के सोचने की ऐसी क्या आवश्यकता है! निर्जन में व्याकुल हो रो-रोकर उनसे कहने से ही काम बन जायगा। कहो – ‘हे ईश्वर, तुम कैसे हो, यह मुझे समझा दो, मुझे दर्शन दो।’
“वे अन्दर भी हैं और बाहर भी।
“अन्दर भी वे ही हैं। इसीलिए वेद कहते हैं – तत्त्वमसी। और बाहर भी वे ही हैं। माया से अनेक रूप दिखायी पड़ते हैं। परन्तु वस्तुतः हैं वे ही।
“इसीलिए सब नामों और रूपों का वर्णन करने के पहले कहा जाता है – ॐ तत् सत्।
“दर्शन करने पर एक तरह का ज्ञान होता है और शास्त्रों से एक दूसरी तरह का। शास्त्रों में उसका आभास मात्र मिलता है, इसलिए कई शास्त्रों के पढ़ने की कोई जरूरत नहीं। इससे निर्जन में उन्हें पुकारना अच्छा है।
“गीता सब न पढ़ने से भी काम चलता है। दस बार गीता गीता कहने से जो कुछ होता है, वही गीता का सार है। अर्थात् त्यागी। हे जीव, सब त्याग करके ईश्वर की आराधना करो। यही गीता का सार है।”
श्रीरामकृष्ण को भक्तों के साथ काली की आरती देखते देखते भावावेश हो रहा है। अब देवी-प्रतिमा के सामने भूमिष्ठ होकर प्रणाम नहीं कर सकते। भावावेश अब भी है। भावावस्था में वार्तालाप कर रहे हैं।
मुखर्जी के आत्मीय हरि की उम्र अठारह-बीस साल की होगी। उनका विवाह हो गया है। इस समय मुखर्जी के ही घर पर रहते हैं। कोई काम करनेवाले हैं। श्रीरामकृष्ण पर बड़ी भक्ति है।
श्रीरामकृष्ण – (भावावेश में हरि से) – तुम अपनी माँ से पूछकर मन्त्र लेना। (श्रीयुत प्रिय से) मैं इनसे (हरि से) कह भी न सका, मन्त्र तो मैं देता ही नहीं हूँ।
“तुम जैसा ध्यान-जप करते हो; वैसा ही करते रहो।”
प्रिय – जो आज्ञा।
श्रीरामकृष्ण – और मैं इस अवस्था में कह रहा हूँ; बात पर विश्वास करना। देखो,
२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद ९५ ६८१
२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद ९५ ६८१
यहाँ ढोंग इत्यादि नहीं है।
“मैंने भावावेश में कहा – माँ, जो लोग यहाँ अन्तर की प्रेरणा से आते हैं, वे सिद्ध हों।”
सींती के महेन्द्र वैद्य बरामदे में आकर बैठे। वे श्रीयुत रामलाल, हाजरा आदि के साथ बातचीत कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने आसन से उन्हें पुकार रहे हैं – ‘महेन्द्र, महेन्द्र!’
मास्टर जल्दी से वैद्यराज को बुला लाये।
श्रीरामकृष्ण – (कविराज से) – बैठो – जरा सुनो तो सही।
वैद्यराज कुछ लज्जित से हो गये। बैठकर श्रीरामकृष्ण के उपदेश सुनने लगे।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – कितने ही प्रकार से उनकी सेवा की जा सकती है।
“प्रेमी भक्त उन्हें लेकर कितनी ही तरह से सम्भोग करता है।
“कभी तो वह सोचता है, ईश्वर पद्म हैं और वह भौंरा, और कभी ईश्वर सच्चिदानन्द सागर हैं और वह मीन।
“प्रेमी भक्त कभी सोचता है कि वह ईश्वर की नर्तकी है। यह सोचकर वह उनके सामने नृत्य करता है – गाने सुनाता है। कभी सखीभाव या दासीभाव में रहता है। कभी उन पर उसकां वात्सल्यभाव होता है – जैसा यशोदा का था। कभी पतिभाव – मधुरभाव होता है – जैसा गोपियों का था।
“बलराम का भी तो सखीभाव रहता था और कभी वे सोचते थे, मैं कृष्ण का छाता या लाठी बना हुआ हूँ। सब तरह से वे कृष्ण की सेवा करते थे।
“चैतन्यदेव की तीन अवस्थाएँ थीं। जब अन्तर्दशा होती थी, तब वे समाधिलीन हो जाते थे। उस समय बाहर का ज्ञान बिलकुल न रह जाता था। जब अर्धबाह्य दशा होती थी, तब नृत्य तो कर सकते थे, पर बोल नहीं सकते थे। बाह्यदशा में संकीर्तन करते थे।
(भक्तों से) “तुम लोग ये सब बातें सुन रहे हो, धारणा करने की चेष्टा करो। विषयी जब साधु के पास आते हैं, तब विषय की चर्चा और विषय की चिन्ता को बिलकुल छिपा कर आते हैं। जब चले जाते हैं, तब उन्हें निकालते हैं। कबूतर मटर खाता है, तो जान पड़ता हैं, निगल कर हजम कर गया, परन्तु नहीं, गले के भीतर रखता जाता है। गले में मटर भरे रहते हैं।
“सब काम छोड़कर तुम्हें चाहिए कि सन्ध्या समय उनका नाम लो।
“अँधेरे में ईश्वर की याद आती है। यह भाव आता है कि अभी तो सब दीख पड़ रहा था, किसने ऐसा किया। मुसलमानों को देखो, सब काम छोड़कर ठीक समय पर जरूर नमाज पढ़ेंगे।”
मुखर्जी – अच्छा महाराज, जप करना अच्छा है?
६८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ४ अक्टूबर, १८८४
श्रीरामकृष्ण – हाँ, जप से ईश्वर मिलते हैं। एकान्त में उनका नाम जपते रहने से उनकी कृपा होती है, इसके पश्चात् है दर्शन।
“जैसे पानी में काठ डुबाया हुआ है – लोहे की जंजीर से बाँधा हुआ है, उसी जंजीर को पकड़कर जाओ तो वह लकड़ी अवश्य छू सकोगे।
“पूजा की अपेक्षा जप बड़ा है, जप की अपेक्षा ध्यान बड़ा है, ध्यान से बढ़कर है भाव और भाव से बढ़कर महाभाव या प्रेम। प्रेम चैतन्यदेव को हुआ था। प्रेम यदि हुआ तो ईश्वर को बाँधने की मानो रस्सी मिल गयी। (हाजरा आकर बैठे।)
(हाजरा से) “उन पर जब प्यार होता है, तब उसे रागभक्ति कहते हैं। वैधी-भक्ति जितनी शीघ्र आती है जाती भी उतनी ही शीघ्र हैं; राग-भक्ति स्वयम्भू लिंग-सी है। उसकी जड़ नहीं मिलती। स्वयम्भू लिंग की जड़ काशी तक है। राग-भक्ति अवतार और उनके सांगोपांग अंशों को होती है।”
हाजरा – अहा!
श्रीरामकृष्ण – तुम जब एक दिन जप कर रहे थे, तब मैं जंगल से होकर आ रहा था। मैंने कहा – माँ, इसकी बुद्धि तो बड़ी हीन है, यह यहाँ आकर भी माला जप रहा है। जो कोई यहाँ आयेगा, उसे तत्काल ही चैतन्य होगा। उसे माला जपना, यह सब इतना न करना होगा। तुम कलकत्ता जाओ, देखोगे, वहाँ हजारों आदमी माला जपते हैं – वेश्याएँ तक।
श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं –
“तुम नारायण को किराये की गाड़ी पर ले आना।
“इनसे (मुखर्जी से) भी नारायण की बात कह रखता हूँ। उसके आने पर उसे कुछ खिलाऊँगा! उसको खिलाने के बहुत से अर्थ हैं।”
(९)
कीर्तनानन्द में श्रीरामकृष्ण
आज शनिवार है। श्रीयुत केशव सेन के बड़े भाई नवीन सेन के कोलूटोलावाले मकान में श्रीरामकृष्ण गये हुए हैं। ४ अक्टूबर, १८८४।
गत बृहस्पतिवार के दिन केशव की माँ श्रीरामकृष्ण को न्योता देकर, आने के लिए हर तरह से कह गयी थीं।
बाहर के ऊपरवाले कमरे में जाकर श्रीरामकृष्ण बैठे। नन्दलाल आदि केशव के भतीजे, केशव की माँ और उनके बन्धु-बान्धव श्रीरामकृष्ण की बड़ी आवभगत कर रहे हैं। ऊपरवाले कमरे में ही संकीर्तन होने लगा। कोलूटोले में सेन परिवार की बहुत सी स्त्रियाँ भी आयी हुई हैं।
४ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद १५ ६८३
४ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद १५ ६८३
श्रीरामकृष्ण के साथ बाबूराम, किशोरी तथा और भी दो-एक भक्त आये हैं। मास्टर भी आये हैं। वे नीचे बैठे हुए श्रीरामकृष्ण का संकीर्तन सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण ब्राह्मभक्तों से कह रहे हैं - “संसार अनित्य है। मृत्यु पर सदा ही ध्यान रखना चाहिए।” श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं -
“मन! सोच कर देख, कोई किसी का नहीं है। इस संसार में वृथा ही तू चक्कर मारता फिरता है। माया-जाल में फँसकर दक्षिणाकाली को कभी भूल न जाना। इस संसार में दो ही दिन के लिए लोक ‘मालिक-मालिक’ करते हैं। जब कभी कालरूप मालिक आ जाते हैं, तब पहले के उस मालिक को लोग श्मशान में डाल देते हैं। जिसके लिए तुम सोचकर मर रहे हो, क्या वह तुम्हारे संग भी जाता है? तुम्हारी वही प्रेयसी तुम्हारे मर जाने पर अमंगल की आशंका करके गोबर से घर को लीपती-पोतती है!”
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - “डूबो; ऊपर उतराते रहने से क्या होगा? कुछ दिन एकान्त में, सब कुछ छोड़कर, उन पर सोलहों आने मन लगाकर, उन्हें पुकारो।” श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं - “ऐ मन, रूप के समुद्र में तू डूब जा। तलातल और पाताल में खोज करने पर तुझे प्रेमरूपी रत्न मिलेगा।”
श्रीरामकृष्ण ब्राह्मभक्तों से “तुम मेरे सर्वस्व हो” यह गाना गाने के लिए कह रहे हैं।
ब्राह्मभक्तों का गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने श्रीकृष्ण पर एक गाना गाया। यह गाना सुनकर केशव ने इसी के जोड़ का एक दूसरा गीत रचा था।
अब श्रीरामकृष्ण गौरांग-कीर्तन करने लगे। भक्तों के साथ बड़ी देर तक नृत्य-गीत होता रहा।
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तन्नो हंसः प्रचोदयात्
रामकृष्ण मठ
श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द साहित्य
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