श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद ९५ ६८१
यहाँ ढोंग इत्यादि नहीं है।
“मैंने भावावेश में कहा – माँ, जो लोग यहाँ अन्तर की प्रेरणा से आते हैं, वे सिद्ध हों।”
सींती के महेन्द्र वैद्य बरामदे में आकर बैठे। वे श्रीयुत रामलाल, हाजरा आदि के साथ बातचीत कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने आसन से उन्हें पुकार रहे हैं – ‘महेन्द्र, महेन्द्र!’
मास्टर जल्दी से वैद्यराज को बुला लाये।
श्रीरामकृष्ण – (कविराज से) – बैठो – जरा सुनो तो सही।
वैद्यराज कुछ लज्जित से हो गये। बैठकर श्रीरामकृष्ण के उपदेश सुनने लगे।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – कितने ही प्रकार से उनकी सेवा की जा सकती है।
“प्रेमी भक्त उन्हें लेकर कितनी ही तरह से सम्भोग करता है।
“कभी तो वह सोचता है, ईश्वर पद्म हैं और वह भौंरा, और कभी ईश्वर सच्चिदानन्द सागर हैं और वह मीन।
“प्रेमी भक्त कभी सोचता है कि वह ईश्वर की नर्तकी है। यह सोचकर वह उनके सामने नृत्य करता है – गाने सुनाता है। कभी सखीभाव या दासीभाव में रहता है। कभी उन पर उसकां वात्सल्यभाव होता है – जैसा यशोदा का था। कभी पतिभाव – मधुरभाव होता है – जैसा गोपियों का था।
“बलराम का भी तो सखीभाव रहता था और कभी वे सोचते थे, मैं कृष्ण का छाता या लाठी बना हुआ हूँ। सब तरह से वे कृष्ण की सेवा करते थे।
“चैतन्यदेव की तीन अवस्थाएँ थीं। जब अन्तर्दशा होती थी, तब वे समाधिलीन हो जाते थे। उस समय बाहर का ज्ञान बिलकुल न रह जाता था। जब अर्धबाह्य दशा होती थी, तब नृत्य तो कर सकते थे, पर बोल नहीं सकते थे। बाह्यदशा में संकीर्तन करते थे।
(भक्तों से) “तुम लोग ये सब बातें सुन रहे हो, धारणा करने की चेष्टा करो। विषयी जब साधु के पास आते हैं, तब विषय की चर्चा और विषय की चिन्ता को बिलकुल छिपा कर आते हैं। जब चले जाते हैं, तब उन्हें निकालते हैं। कबूतर मटर खाता है, तो जान पड़ता हैं, निगल कर हजम कर गया, परन्तु नहीं, गले के भीतर रखता जाता है। गले में मटर भरे रहते हैं।
“सब काम छोड़कर तुम्हें चाहिए कि सन्ध्या समय उनका नाम लो।
“अँधेरे में ईश्वर की याद आती है। यह भाव आता है कि अभी तो सब दीख पड़ रहा था, किसने ऐसा किया। मुसलमानों को देखो, सब काम छोड़कर ठीक समय पर जरूर नमाज पढ़ेंगे।”
मुखर्जी – अच्छा महाराज, जप करना अच्छा है?