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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 701 of 711

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Page 701
६७८श्रीरामकृष्णवचनामृत२ अक्टूबर, १८८४

जाता है।

"सदा ही कर्म नहीं करते रहना पड़ता। उन पर जितनी ही शुद्धा भक्ति और प्रीति होगी, कर्म उतने ही घटते जायेंगे। उन्हें प्राप्त करने पर कर्मों का त्याग हो जाता है। गृहस्थ की बहू को जब गर्भ होता है तो उसकी सास उसका काम घटा देती है। लड़का होने पर उसे काम नहीं करना पड़ता।"

शुभ संस्कार तथा ईश्वर के लिए व्याकुलता

दक्षिनेश्वर मौजे से कुछ लड़के आये। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। वे लोग आसन ग्रहण करके श्रीरामकृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं। दिन के चार बजे होंगे।

एक लड़का — महाराज, ज्ञान किसे कहते हैं?

श्रीरामकृष्ण — ईश्वर सत् हैं और सब असत्, इसके जानने का नाम ज्ञान है।

"जो सत् हैं उनका एक और नाम ब्रह्म है, एक दूसरा नाम है काल। इसीलिए लोग कहा करते हैं — अरे भाई, काल में कितने आये और कितने चले गये।

"काली वे हैं जो काल के साथ रमण करती हैं। आद्याशक्ति वे ही हैं। काल और काली, ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं।

"संसार अनित्य है, वे नित्य हैं। संसार इन्द्रजाल है, बाजीगर ही सत्य है, उसका खेल अनित्य है।"

लड़का — संसार अगर माया है, इन्द्रजाल है, तो यह दूर क्यों नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण — संस्कार-दोषों के कारण यह माया नहीं जाती। कितने ही जन्मों तक इस माया के संसार रहने के कारण यह सच जान पड़ती है।

"संस्कार में कितनी शक्ति है, सुनो। एक राजा का लड़का पिछले जन्म में धोबी के घर पैदा हुआ था। राजा का लड़का होकर जब वह खेल रहा था, तब अपने साथियों से उसने कहा, ये सब खेल रहने दो, मैं पेट के बल लेटता हूँ, तुम लोग मेरी पीठ पर कपड़े पटको!

"यहाँ बहुत से लड़के आते हैं, परन्तु कोई कोई ईश्वर के लिए व्याकुल हैं। वे अवश्य ही संस्कार लेकर आये हैं।

"वे सब लड़के विवाह की बात पर रो देते हैं। स्वयं विवाह की बात तो सोचते ही नहीं। निरंजन बचपन से ही कहता है मैं विवाह न करूँगा।

"बहुत दिन हो गये (बीस वर्ष से अधिक) यहाँ वराहनगर से दो लड़के आते थे, एक का नाम था गोविन्द पाल, दूसरे का गोपाल सेन। उनका मन बचपन से ही ईश्वर पर था। विवाह की बात होने पर डर से सिकुड़ जाते थे। गोपाल को भावसमाधि होती थी। विषयी-मनुष्यों को देखकर वह दब जाता था जैसे बिल्ली को देखकर चूहे। जब ठाकुरों