श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context६८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ४ अक्टूबर, १८८४
श्रीरामकृष्ण – हाँ, जप से ईश्वर मिलते हैं। एकान्त में उनका नाम जपते रहने से उनकी कृपा होती है, इसके पश्चात् है दर्शन।
“जैसे पानी में काठ डुबाया हुआ है – लोहे की जंजीर से बाँधा हुआ है, उसी जंजीर को पकड़कर जाओ तो वह लकड़ी अवश्य छू सकोगे।
“पूजा की अपेक्षा जप बड़ा है, जप की अपेक्षा ध्यान बड़ा है, ध्यान से बढ़कर है भाव और भाव से बढ़कर महाभाव या प्रेम। प्रेम चैतन्यदेव को हुआ था। प्रेम यदि हुआ तो ईश्वर को बाँधने की मानो रस्सी मिल गयी। (हाजरा आकर बैठे।)
(हाजरा से) “उन पर जब प्यार होता है, तब उसे रागभक्ति कहते हैं। वैधी-भक्ति जितनी शीघ्र आती है जाती भी उतनी ही शीघ्र हैं; राग-भक्ति स्वयम्भू लिंग-सी है। उसकी जड़ नहीं मिलती। स्वयम्भू लिंग की जड़ काशी तक है। राग-भक्ति अवतार और उनके सांगोपांग अंशों को होती है।”
हाजरा – अहा!
श्रीरामकृष्ण – तुम जब एक दिन जप कर रहे थे, तब मैं जंगल से होकर आ रहा था। मैंने कहा – माँ, इसकी बुद्धि तो बड़ी हीन है, यह यहाँ आकर भी माला जप रहा है। जो कोई यहाँ आयेगा, उसे तत्काल ही चैतन्य होगा। उसे माला जपना, यह सब इतना न करना होगा। तुम कलकत्ता जाओ, देखोगे, वहाँ हजारों आदमी माला जपते हैं – वेश्याएँ तक।
श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं –
“तुम नारायण को किराये की गाड़ी पर ले आना।
“इनसे (मुखर्जी से) भी नारायण की बात कह रखता हूँ। उसके आने पर उसे कुछ खिलाऊँगा! उसको खिलाने के बहुत से अर्थ हैं।”
(९)
कीर्तनानन्द में श्रीरामकृष्ण
आज शनिवार है। श्रीयुत केशव सेन के बड़े भाई नवीन सेन के कोलूटोलावाले मकान में श्रीरामकृष्ण गये हुए हैं। ४ अक्टूबर, १८८४।
गत बृहस्पतिवार के दिन केशव की माँ श्रीरामकृष्ण को न्योता देकर, आने के लिए हर तरह से कह गयी थीं।
बाहर के ऊपरवाले कमरे में जाकर श्रीरामकृष्ण बैठे। नन्दलाल आदि केशव के भतीजे, केशव की माँ और उनके बन्धु-बान्धव श्रीरामकृष्ण की बड़ी आवभगत कर रहे हैं। ऊपरवाले कमरे में ही संकीर्तन होने लगा। कोलूटोले में सेन परिवार की बहुत सी स्त्रियाँ भी आयी हुई हैं।