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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 702 of 711

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Page 702

२ अक्टूबर, १८८४ | परिच्छेद ९५ | ६७९

(Tagore) के लड़के उस बगीचे में घूमने के लिए गये हुए थे, तब उसने अपने घर का दरवाजा बन्द कर लिया था, इसलिए कि कहीं उनसे बातचीत न करनी पड़े।

“पञ्चवटी के नीचे गोपाल को भावावेश हो गया था। उसी अवस्था में मेरे पैरों पर हाथ रखकर उसने कहा, ‘अब मुझे जाने दीजिये। अब इस संसार में मुझ से रहा नहीं जाता – आपको अभी बहुत देर हैं – मुझे जाने दीजिये।’ मैंने भी भावावस्था में कहा – ‘तुम्हें फिर आना होगा।’ उसने कहा – ‘अच्छा, फिर आऊँगा।’

“कुछ दिन बाद गोविन्द आकर मिला। मैंने पूछा, गोपाल कहाँ है? उसने कहा, गोपाल चला गया (उसका निधन हो गया)।

“दूसरे लड़के देखो, किस चिन्ता में घूम रहे हैं! – किस तरह धन हो – गाड़ी हो – मकान हो – वस्त्राभूषण हो – फिर विवाह हो – इसी के लिए घूम रहे हैं। विवाह करना है, तो लड़की कैसी है, इसकी पहले खोज करते हैं और सुन्दर है या नहीं, इसकी जाँच करने के लिए स्वयं जाते हैं।

“एक आदमी मेरी बड़ी निन्दा करता है। बस यही कहता है कि ये लड़कों को प्यार करते हैं। जिनके अच्छे संस्कार हैं, जो शुद्धात्मा हैं, ईश्वर के लिए व्याकुल होते हैं, रुपया, शरीर-सुख इन सब वस्तुओं की ओर जिनका मन नहीं है, मैं उन्हीं को प्यार करता हूँ।

“जिन्होंने विवाह कर लिया है, उनकी अगर ईश्वर पर भक्ति हो, तो वे संसार में लिप्त न हो जायेंगे। हीरानन्द ने विवाह किया है तो इससे क्या हुआ? वह संसार में अधिक लिप्त न होगा।”

हीरानन्द सिन्ध का रहनेवाला, बी. ए. पास एक ब्राह्मसमाजी है।

मणिलाल, शिवपुर के ब्राह्मभक्त, मारवाड़ी भक्त, श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके बिदा हुए।

(८)

कर्मत्याग कब?

शाम हो गयी। दक्षिण के बरामदे में और पश्चिमवाले गोल बरामदे में दीपक जलाये जा चुके हैं। श्रीरामकृष्ण के कमरे का प्रदीप जला दिया गया, कमरे में धूप दी गयी।

श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए माता का नाम ले रहे हैं। कमरे में मास्टर, श्रीयुत प्रिय मुखर्जी और उनके आत्मीय हरि बैठे हैं। कुछ देर तक ध्यान और चिन्तन कर लेने पर श्रीरामकृष्ण भक्तों से वार्तालाप करने लगे। अब श्रीठाकुरमन्दिर में आरती ही की देर है।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – जो दिन-रात उनकी चिन्ता कर रहा है उसके लिए सन्ध्या की क्या जरूरत है?