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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 699 of 711

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Page 699

६७६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४

"पढ़ने से क्या होता है? साधना और तपस्या चाहिए। उन्हें पुकारो।

" 'भंग-भंग चिल्लाने से क्या होगा? कुछ पीना चाहिए।

"यह संसार काँटे के पेड़ की तरह है। हाथ लगाओं तो खून निकल आता है। अगर काँटे के पेड़ के सम्बन्ध में बैठे ही बैठे यह कल्पना करते रहें कि पेड़ जल गया, तो क्या इससे वह कभी जला जाता है? ज्ञानाग्नि लाओ, वही आग लगाओ, तब पेड़ कहीं जल सकता है।

"साधना की अवस्था में कुछ परिश्रम करना पड़ता है। फिर तो सीधा मार्ग है। मोड़ पार करके अनुकूल वायु में पाल लगाकर नाव छोड़ दो।

"जब तक माया के घेरे के भीतर हो, जब तक माया के मेघ हैं, तब तक ज्ञान-सूर्य की किरणें नहीं फैल सकतीं। माया का घेरा पार कर जब बाहर आकर खड़े हो जाओगे तब ज्ञान-सूर्य अविद्या का नाश कर देगा। घर के भीतर ले आने पर आतशी शीशे से कोई काम नहीं हो सकता। घर के घेरे से बाहर खड़े होने पर जब धूप उस पर गिरती है तब उसकी ज्वाला से कागज जल जाता है।

"और बादलों के रहने पर भी आतशी शीशे से कागज नहीं जलता। बादलों के हट जाने पर ही वह काम कर सकेगा।

"कामिनी और कांचन के घेरे से जरा हटकर खड़े होने पर, अलग रहकर कुछ साधना करने पर मन का अन्धकार दूर होता है - अविद्या और अहंकार के बादल हट जाते हैं - ज्ञान-लाभ होता है।

"कामिनी और कांचन ही बादल हैं।"

(७)

श्रीरामकृष्ण का कांचन-त्याग

श्रीरामकृष्ण – (मारवाड़ी से) – त्यागियों के नियम बड़े कठिन हैं। कामिनी और कांचन का संसर्ग लेशमात्र भी न रहना चाहिए। रुपया अपने हाथ से तो छूना ही न चाहिए; परन्तु दूसरे के पास रखने की भी कोई व्यवस्था न रहनी चाहिए।

"लक्ष्मीनारायण मारवाड़ी था, वेदान्तवादी भी था, प्रायः यहाँ आया करता था। मेरा बिस्तरा मैला देखकर उसने कहा, मैं आपके नाम दस हजार रुपया लिख दूँगा, उसके ब्याज से आपकी सेवा होती रहेगी।

"उसने यह बात कही नहीं कि मैं जैसे लाठी की चोट खाकर बेहोश हो गया।

"होश आने पर उससे कहा, तुम्हें अगर ऐसी बातें करनी हों, तो यहाँ फिर कभी न आना। मुझमें रुपया छूने की शक्ति ही नहीं है, और न मैं रुपया पास ही रख सकता हूँ।

"उसकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म थी। उसने कहा, 'तो अब भी आपके लिए त्याज्य और