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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 706 of 711

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Page 706

४ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद १५ ६८३

श्रीरामकृष्ण के साथ बाबूराम, किशोरी तथा और भी दो-एक भक्त आये हैं। मास्टर भी आये हैं। वे नीचे बैठे हुए श्रीरामकृष्ण का संकीर्तन सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण ब्राह्मभक्तों से कह रहे हैं - “संसार अनित्य है। मृत्यु पर सदा ही ध्यान रखना चाहिए।” श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं -

“मन! सोच कर देख, कोई किसी का नहीं है। इस संसार में वृथा ही तू चक्कर मारता फिरता है। माया-जाल में फँसकर दक्षिणाकाली को कभी भूल न जाना। इस संसार में दो ही दिन के लिए लोक ‘मालिक-मालिक’ करते हैं। जब कभी कालरूप मालिक आ जाते हैं, तब पहले के उस मालिक को लोग श्मशान में डाल देते हैं। जिसके लिए तुम सोचकर मर रहे हो, क्या वह तुम्हारे संग भी जाता है? तुम्हारी वही प्रेयसी तुम्हारे मर जाने पर अमंगल की आशंका करके गोबर से घर को लीपती-पोतती है!”

श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - “डूबो; ऊपर उतराते रहने से क्या होगा? कुछ दिन एकान्त में, सब कुछ छोड़कर, उन पर सोलहों आने मन लगाकर, उन्हें पुकारो।” श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं - “ऐ मन, रूप के समुद्र में तू डूब जा। तलातल और पाताल में खोज करने पर तुझे प्रेमरूपी रत्न मिलेगा।”

श्रीरामकृष्ण ब्राह्मभक्तों से “तुम मेरे सर्वस्व हो” यह गाना गाने के लिए कह रहे हैं।

ब्राह्मभक्तों का गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने श्रीकृष्ण पर एक गाना गाया। यह गाना सुनकर केशव ने इसी के जोड़ का एक दूसरा गीत रचा था।

अब श्रीरामकृष्ण गौरांग-कीर्तन करने लगे। भक्तों के साथ बड़ी देर तक नृत्य-गीत होता रहा।