Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

Page 929Permalink

दिवोदास को विपत्ति से बचाया. (१३)
अनु त्वाहिघ्ने अध देव देवा मदन्विश्वे कवितमं कवीनाम्.
करो यत्र वरिवो बाधिताय दिवे जनाय तन्वे गृणानः.. (१४)
हे इंद्र! सभी स्तोता इस समय मेघ का भेदन करने के लिए तुझ परम मेधावी की स्तुति
कर रहे हैं. तुम स्तुतियां सुनकर उसी समय दरिद्र तथा पीड़ित यजमान एवं उसकी संतान को
धन देते हो. (१४)
अनु द्यावापृथिवी तत्त ओजोऽमर्त्या जिहत इन्द्र देवाः.
कृष्वा कृत्नो अकृतं यत्ते अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यज्ञैः.. (१५)
हे इंद्र! धरती, आकाश एवं मरणरहित समस्त देव तुम्हारे बल को स्वीकार करते हैं. हे
बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम अपना अनकिया काम करो. इसके बाद तुम यज्ञों में अधिक नवीन
स्तोत्र को जन्म दो. (१५)
सूक्त—१९ देवता—इंद्र
महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः.
अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.. (१)
जैसे राजा मनुष्यों की कामना पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं की इच्छा पूरी करने
वाले इंद्र आवें. दोनों लोकों में पराक्रम दिखाने वाले एवं शत्रुसेनाओं द्वारा अपराजित इंद्र
हमारे सामने वीरता के कार्यों के लिए बढ़ते हैं. विस्तृत शरीर एवं गुणों वाले इंद्र को यजमान
भली प्रकार जानते हैं. (१)
इन्द्रमेव धिषणा सातये धाद्बृहन्तमृष्वमजरं युवानम्.
अषाळ्हेन शवसा शूशुवांसं सद्यश्चिद्यो वावृधे असामि.. (२)
हमारी स्तुति दान के निमित्त महान्, गमनशील, युवा एवं शत्रुओं द्वारा अपराजित बल से
उन्नत इंद्र को प्राप्त होती है. इंद्र उत्पन्न होते ही अधिक मात्रा में बढ़ गए थे. (२)
पृथू करस्ना बहुला गभस्ती अस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि.
यूथेव पश्वः पशूपा दमूना अस्माँ इन्द्राभ्या ववृत्स्वाजौ.. (३)
हे शांत मन वाले इंद्र! तुम अन्न देने के लिए अपने विस्तीर्ण, कार्यकुशल एवं अधिक देने
वाले हाथों को हमारे सामने करो. जिस प्रकार ग्वाला पशुओं के समूह को हांकता है, उसी
प्रकार तुम युद्ध में हमारा संचालन करो. (३)
तं व इन्द्रं चतिनमस्य शाकैरहि नूनं वाजयन्तो हुवेम.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 930Permalink

यथा चित्पूर्वे जरितार आसुरनेद्या अनवद्या अरिष्टाः.. (४)
अन्न के अभिलाषी हम स्तोता इस यज्ञ में मरुतों सहित शत्रुनाशक एवं प्रसिद्ध इंद्र को
बुलाते हैं. हे इंद्र! प्राचीन स्तोता जिस प्रकार निंदा, पाप एवं हिंसारहित उत्पन्न हुए थे, उसी
प्रकार हम भी हों. (४)
धृतव्रतो धनदाः सोमवृद्धः स हि वामस्य वसुनः पुरुक्षुः.
सं जग्मिरे पथ्या३ रायो अस्मिन्त्समुद्रे न सिन्धवो यादमानाः.. (५)
इंद्र यज्ञकर्मधारक, धन देने वाले, सोमरस द्वारा उन्नत, अभिलषित धन के स्वामी एवं
अधिक अन्न वाले हैं. स्तोताओं का हित करने वाले धन उसी प्रकार इंद्र के समीप जाते हैं,
जिस प्रकार बहती हुई नदियां सागर में मिलती हैं. (५)
शविष्ठं न आ भर शूर शव ओजिष्ठमोजो अभिभूत उग्रम्.
विश्वा द्युम्ना वृष्ण्या मानुषाणामस्मभ्यं दा हरिवो मादयध्यै.. (६)
हे शूर इंद्र! हमें सर्वश्रेष्ठ बल दो. हे शत्रु पराजयकारी इंद्र! हमें असह्य एवं उत्तम ओज
दो. हे हरि नामक अश्वों के स्वामी! हमें प्रसन्न करने के लिए मानवकामनाओं के पूरक सभी
धन दो. (६)
यस्ते मदः पृतनाषाळमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवांसम्.
येन तोकस्य तनयस्य सातौ मंसीमहि जिगीवांसस्त्वोताः.. (७)
हे इंद्र! तुम्हारा जो उत्साह शत्रु-सेनाओं को नष्ट करने वाला एवं अपराजित है, उस बढ़े
हुए उत्साह को हमें दो. हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर उसी उत्साह के कारण पुत्र एवं पौत्र के
लाभ के लिए तुम्हारी स्तुति करेंगे. (७)
आ नो भर वृषणं शुष्ममिन्द्र धनस्पृतं शूशुवांसं सुदक्षम्.
येन वंसाम पृतनासु शत्रून्तवोतिभिरुत जामीँरजामीन्.. (८)
हे इंद्र! हमें अभिलाषापूरक, धनपालक, उन्नत एवं परमदक्ष सैन्यशक्ति प्रदान करो.
तुम्हारी रक्षाओं के कारण हम उस सैन्यशक्ति द्वारा बंधुओं एवं शत्रुओं का नाश करें. (८)
आ ते शुष्मो वृषभ एतु पश्चादोत्तरादधरादा पुरस्तात्.
आ विश्वतो अभि समेत्वर्वाङिन्द्र द्युम्नं संवद्वेह्यस्मै.. (९)
हे इंद्र! तुम्हारा कामवर्षी बल पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं पूर्व दिशा से हमारे सामने आवे,
वह बल सभी ओर से हमारे समीप आवे. तुम हमें सभी सुखों से युक्त धन दो. (९)
नृवत्त इन्द्र नृतमाभिरूती वंसीमहि वामं श्रोमतेभिः.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 931Permalink

ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्धा रत्नं महि स्थूरं बृहन्तम्.. (१०)
हे इंद्र! हम तुम्हारी उत्तम रक्षाओं द्वारा सेवकों एवं यशों से युक्त धन का उपभोग करें. हे
राजन्! तुम दिव्य एवं पार्थिव धन के स्वामी हो. इसलिए हमें महान्, विपुल एवं गुणयुक्त धन
दो. (१०)
मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यं शासमिन्द्रम्.
विश्वासहमवसे नूतनायोग्रं सहोदामिह तं हुवेम.. (११)
हम नवीन रक्षा प्राप्त करने के लिए इस यज्ञ में मरुतों सहित, कामवर्षी उन्नत, शत्रुओं
द्वारा अपमानरहित, तेजस्वी, शासक, सबको पराजित करने वाले उग्र एवं बलप्रद इंद्र को
बुलाते हैं. (११)
जनं वज्रिन्महि चिन्मन्यमानमेभ्यो नृभ्यो रन्धया येष्वस्मि.
अधा हि त्वा पृथिव्यां शूरसातौ हवामहे तनये गोष्वप्सु.. (१२)
हे वज्रधारी इंद्र! हम जिन लोगों में रहते हैं, उनकी अपेक्षा स्वयं को बड़ा समझने वाले
व्यक्ति को तुम वश में करो. हम इस समय युद्ध में पुत्रों, गायों, एवं जल को पाने के लिए तुम्हें
बुलाते हैं. (१२)
वयं त एभिः पुरुहूत सख्यैः शत्रोः शत्रोरुत्तर इत्स्याम.
घ्नन्तो वृत्राण्युभयानि शूर राया मदेम बृहता त्वोताः.. (१३)
हे बहुतों द्वारा बुलाए हुए इंद्र! हम मित्रता के परिचायक इन स्तुति वचनों द्वारा तुम्हारी
सहायता से अपने सभी शत्रुओं को मारते हुए उनसे श्रेष्ठ बनें. हे शूर इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा
रक्षित होकर महान् धन से प्रसन्न हों. (१३)
सूक्त—२० देवता—इंद्र
द्यौर्न य इन्द्राभि भूमार्यस्तस्थौ रयिः शवसा पृत्सु जनान्.
तं नः सहस्रभरमुर्वरासां दद्धि सूनो सहसो वृत्रतुरम्.. (१)
हे बलपुत्र इंद्र! हमें ऐसा पुत्र दो जो संग्राम में शत्रुओं पर उसी प्रकार आक्रमण कर
सके, जिस प्रकार सूर्य प्राणियों को आक्रांत करते हैं. वह हजारों धनों का स्वामी, उपजाऊ
धरती का अधिकारी एवं शत्रुओं का नाशक हो. (१)
दिवो न तुभ्यमन्विन्द्र सत्रासुर्यं देवोभिर्धायि विश्वम्.
अहिं यद्वृत्रमपो वव्रिवांसं हन्नृजीषिन्विष्णुना सचानः.. (२)
हे इंद्र! यह बात सत्य है कि स्तुतिकर्त्ताओं ने तुम में सूर्य के समान बल धारण किया है.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 932Permalink

हे ऋजीषी इंद्र! तुमने विष्णु के साथ मिलकर जल को रोकने वाले वृत्र का नाश किया. (२)
तूर्वन्नोजियान्तवसस्तवियान्कृतब्रह्मेन्द्रो वृद्धमहाः.
राजाभवन्मधुनः सोम्यस्य विश्वासां यत्पुरां दर्तृमावत्.. (३)
हिंसकों के हिंसक, परम ओजस्वी, अतिशय बलशाली एवं स्तोताओं को अन्न देने वाले
इंद्र ने सभी पुरियों को विदीर्ण करने वाला वज्र प्राप्त किया, तभी वे मधुर सोम के राजा बने.
(३)
शतैरपद्रन्पणय इन्द्रात्र दशोणये कवयेऽर्कसातौ.
वधैः शुष्णस्याशुषस्य मायाः पित्वो नारिरेचीत्किं चन प्र.. (४)
हे इंद्र! बहुत अन्न देने वाले एवं मेधावी कुत्स से युद्ध करने वाले सौ सेनाओं के साथ
पणि तुम्हारी सहायता के कारण भाग गए. इंद्र ने समस्त शक्तियों वाले शुष्ण असुर के कपटों
को समाप्त करके उसका सभी अन्न छीन लिया. (४)
महो द्रुहो अप विश्वायु धयि वज्रस्य यत्पतने पादि शुष्णः.
उरु ष सरथं सारथये करिन्द्रः कुत्साय सूर्यस्य सातौ.. (५)
शुष्ण असुर जब वज्र लगने से धरती पर गिरा, तब उसकी सब शक्ति नष्ट हो गई. इंद्र ने
सूर्य को प्राप्त करने के निमित्त अपने सारथि कुत्स द्वारा रथ आगे बढ़वाया. (५)
प्र श्येनो न मदिरमंशुमस्मै शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन्.
प्रावन्नमीं साप्यं ससन्तं पृणग्राया समिषा सं स्वस्ति.. (६)
गरुड़ इंद्र के लिए नशीला सोम लाए. इंद्र ने भी उपद्रवी नमुचि का शिर मथ डाला एवं
सय के पुत्र निमि नामक ऋषि की सोते समय प्राण रक्षा की. साथ ही उसे धन, अन्न एवं
कल्याणों से युक्त किया. (६)
वि पिप्रोरहिमायस्य दृळ्हाः पुरो वज्रिञ्छवसा न दर्दः.
सुदामन्तद्रेक्णो अप्रमृष्यमृजिश्वने दात्रं दाशुषे दाः.. (७)
हे वज्रधारी इंद्र! तुमने अधिक माया वाले पिप्रु असुर के दृढ़ नगरों को अपने बल द्वारा
तोड़ा था. हे शोभन दान वाले इंद्र! तुमने हव्य देने वाले ऋजिश्व्रा नामक राजा को बाधारहित
धन दिया था. (७)
स वेतसुं दशमायं दशोणिं तूतूजिमिन्द्रः स्वभिष्टिसुम्नः.
आ तुग्रं शश्वदिभं द्योतनाय मातुर्र्न सीमुप सृजा इयध्यै.. (८)
मनचाहा सुख देने वाले इंद्र ने अति धनी वेतसु, दशोणि, तूतूजि, तुग्र एवं इभ नामक
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 933Permalink

असुरों को द्योतन राजा के समीप जाने को इस प्रकार विवश कर दिया था, जिस प्रकार पुत्र
माता के पास जाने को विवश होता है. (८)
स ईं स्पृधो वनते अप्रतीतो बिभ्रद्वज्रं वृत्रहणं गभस्तौ.
तिष्ठद्धरी अध्यस्तेव गर्ते वचोयुजा वहत इन्द्रमृष्वम्.. (९)
शत्रुओं द्वारा अपराजित इंद्र अपने हाथ में शत्रुमारक वज्र को धारण करके शत्रुओं का
हनन करते हैं. शूर जिस प्रकार रथ में बैठता है, उसी प्रकार इंद्र अपने घोड़ों पर बैठते हैं.
केवल वचन द्वारा चलने वाले वे घोड़े इंद्र को ढोवें. (९)
सनेम तेऽवसा नव्य इन्द्र प्र पूरवः स्तवन्त एना यज्ञैः.
सप्त यत्पुरः शर्म शारदीर्द्दून्दोसीः पुरुकुत्साय शिक्षन्.. (१०)
हे इंद्र! तुम्हारी रक्षा के कारण हम नवीन धन का उपभोग करते हैं. स्तोता लोग इन
स्तोत्रों वाले यज्ञों में तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुमने यज्ञकर्म में बाधा डालने वाली शत्रु प्रजाओं
को मारकर पुरुकुत्स राजा को धन दिया. तुमने शरत असुर के सात नगरों को वज्र द्वारा तोड़ा
था. (१०)
त्वं वृध इन्द्र पूर्व्यो भूर्वरिवस्यन्नुशने काव्याय.
परा नववास्त्वमनुदेयं महे पित्रो ददाथ स्वं नपातम्.. (११)
हे इंद्र! प्राचीनकाल में तुमने कविपुत्र उशना को धन देने की इच्छा से स्तोताओं को
बढ़ाया था एवं नववास्त्व नामक असुर को मारकर शत्रुओं द्वारा पकड़े हुए पुत्र को उशना के
पास पहुंचाया (११)
त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीर्ऋणोरपः सीरा न स्रवन्तीः.
प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति.. (१२)
हे इंद्र! तुम शत्रुओं को कंपाने वाले हो. तुमने ध्वनि नामक असुर द्वारा रोकी हुई नदियों
को प्रवाहित बनाया. हे शूर इंद्र! जब तुम समुद्र लांघकर पार जाते हो, तब तुम यदु और तुर्वसु
को सागर पार कराते हो. (१२)
तव ह त्यदिन्द्र विश्वमाजौ सस्तो धुनीचुमुरी या ह सिष्वप्.
दीदयदित्तुभ्यं सोमेभिः सुन्वन्दभीतिरिध्मभृतिः पक्थ्य१ कैः.. (१३)
हे इंद्र! संग्राम में तुम्हारे ही कार्य प्रसिद्ध हैं. संग्राम में तुमने धुनि एवं चुमुरि नामक
असुरों को सुलाया था. समिधाएं एकत्र करने वाले तथा हव्यान्न पकाने वाले दभीति राजा ने
सोमरस निचोड़कर तुम्हें तेजस्वी बनाया था. (१३)
सूक्त—२१ देवता—इंद्र
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 934Permalink

इमा उ त्वा पुरुतमस्य कारोर्हव्यं वीर हव्या हवन्ते.
धियो रथेष्ठामजरं नवीयो रयिर्विभूतिरीयतो वचस्या.. (१)
हे शूर इंद्र! अधिक यज्ञकर्म की अभिलाषा करने वाले भरद्वाज नामक स्तोता की
प्रशंसनीय स्तुतियां तुझ बुलाने योग्य को बुलाती हैं. हे रथ में बैठे हुए, जरारहित एवं अतिशय
नवीन इंद्र! श्रेष्ठ विभूतियां हव्यान्न के रूप में तुम्हें प्राप्त होती हैं. (१)
तमु स्तुष इन्द्र यो विदानो गिर्वाहसं गीर्भिर्यज्ञवृद्धम्.
यस्म दिवमति मह्ना पृथिव्याः पुरुमायस्य रिरिचे महित्वम्.. (२)
हम उन इंद्र की स्तुति करते हैं जो सब कुछ जानते हैं, स्तुतियों द्वारा पाने योग्य हैं एवं
यज्ञों द्वारा उन्नत हुए हैं. परम बुद्धिमान् इंद्र की महत्ता धरती और आकाश से भी अधिक है.
(२)
स इत्तमोऽवयुनं ततन्वत्सूर्येण वयुनवच्चकार.
कदा ते मर्ता अमृतस्य धामेयक्षन्तो न मिनन्ति स्वधावः.. (३)
इंद्र ने ही ज्ञाननाशक एवं वृत्र द्वारा विस्तृत अंधकार को सूर्य के द्वारा प्रकाशवान् बनाया
है. हे बलशाली एवं मरणरहित इंद्र! तुम्हारे स्वर्ग के उद्देश्य से यज्ञ करने के इच्छुक लोग
किसी की हिंसा नहीं करते. (३)
यस्ता चकार स कुह स्विदिन्द्रः कमा जनं चरति कासु विक्षु.
कस्ते यज्ञो मनसे शं वराय को अर्क इन्द्र कतमः स होता.. (४)
जिस इंद्र ने प्रसिद्ध कर्म किए हैं वे कहां हैं, किन लोगों के बीच घूमते हैं एवं किस दिशा
में स्थित हैं? इंद्र! कौन सा यज्ञ तुम्हारे मन को सुख देता है? कौन सा मंत्र तुम्हारा वरण करता
है? तुम्हें वरण करने वाला होता कौन सा है? (४)
इदा हि ते वेविषतः पुराजाः प्रत्नास आसुः पुरुकुत्सखायः.
ये मध्यमास उत नूतनास उतावमस्य पुरुहूत बोधि.. (५)
हे अनेक कर्म करने वाले इंद्र! पूर्व काल में उत्पन्न होने वाले अंगिरा आदि प्राचीन
ऋषियों ने वर्तमान काल के समान कार्य करके तुम्हारी मित्रता प्राप्त की थी. मध्यकालीन एवं
नवीन ऋषियों ने भी तुम्हारी स्तुति की है. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम मुझ अर्वाचीन
भरद्वाज की स्तुतियों को जानो. (५)
तं पृच्छन्तोऽवरासः पराणि प्रत्ना त इन्द्र श्रुत्यानु येमुः.
अर्चामसि वीर ब्रह्मवाहो यादेव विद्म तात्त्वा महान्तम्.. (६)
हे शूर, मंत्रों द्वारा प्राप्त करने योग्य एवं उक्त गुणों से युक्त इंद्र! नवीन ऋषि तुम्हारी
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 935Permalink

स्तुति करते हुए तुम्हारे प्राचीन एवं उत्कृष्ट कार्यों को मंत्र वचनों के द्वारा बांधने का प्रयत्न
करते हैं. हम जो बातें जानते हैं, उन्हीं के द्वारा तुझ महान् की पूजा करते हैं. (६)
अभि त्वा पाजो रक्षसो वि तस्थे महि जज्ञानमभि तत्सु तिष्ठ.
तव प्रत्नेन युज्येन सख्या वज्रेण धृष्णो अप ता नुदस्व.. (७)
हे इंद्र! राक्षसों की सेना तुम्हारे सामने खड़ी होती है. तुम भी उस महान् एवं उन्नत सेना
के सामने डट जाओ. हे शत्रु पराभवकारी इंद्र! तुम प्राचीन, साथ रखने योग्य एवं नित्य-
सहायक वज्र द्वारा उन्हें दूर भगाओ. (७)
स तु श्रुधीन्द्र नूतनस्य ब्रह्मण्यतो वीर कारुधायः.
त्वं ह्या३ पिः प्रदिवि पितॄणां शश्वद्बभूथ सुहव एष्टौ.. (८)
हे स्तोताओं के रक्षक एवं वीर इंद्र! आधुनिक एवं स्तुति करने के इच्छुक हम लोगों के
वचनों को तुम सुनो. तुम्हीं यज्ञ में सुंदर आह्वान सुनकर अंगिरागोत्रीय ऋषियों के चिरकाल
बंधु बने थें. (८)
प्रोतये वरुणं मित्रमिन्द्रं मरुतः कृष्वावसे नो अद्य.
प्र पूषणं विष्णुमग्निं पुरन्धिं सवितारमोषधीः पर्वतांश्च.. (९)
हे भरद्वाज! हमारी रक्षा के लिए तुम इस समय वरुण, मित्र, मरुद्गण, पूषा, विष्णु,
सर्वप्रमुख-अग्नि, सविता, ओषधियों एवं पर्वतों को स्तुति द्वारा प्रसन्न करो. (९)
इम उ त्वा पुरुशाक प्रयज्यो जरितारो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
श्रुधी हवमा हुवतो हुवानो न त्वावाँ अन्यो अमृत त्वदस्ति.. (१०)
हे परम शक्तिशाली एवं अतिशय यज्ञपात्र इंद्र! ये स्तोता लोग स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी पूजा
करते हैं. हे मरणरहित इंद्र! स्तुति का विषय बनकर तुम मुझ स्तोता की पुकार सुनो. तुम्हारे
समान दूसरा कोई नहीं है. (१०)
नू म आ वाचमुप याहि विद्वान् विश्वेभिः सूनो सहसो यजत्रैः.
ये अग्निजिह्वा ऋतसाप आसुर्यं मनुं चक्रुरुपरं दसाय... (११)
हे बलपुत्र एवं विद्वान् इंद्र! तुम सभी देवों के साथ शीघ्र मेरे स्तुति वचनों के सामने
आओ. अग्नि उन देवों की जीभ है, जो यज्ञ का स्पर्श करते हैं एवं जिन्होंने शत्रुनाश के हेतु
मनु को असुरों की अपेक्षा शक्तिशाली बनाया. (११)
स नो बोधि पुरएता सुगेषूत दुर्गेषु पथिकृद्विदानः.
ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिर्न इन्द्राभि वक्षि वाजम्.. (१२)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२२ देवता—इंद्र

Page 936Permalink

हे मार्ग-निर्माता एवं विद्वान् इंद्र! तुम सुगम और दुर्गम दोनों प्रकार के मार्गों में हमारे
आगे चलो. हे इंद्र! अपने श्रमरहित, महान् एवं वहनकुशल अश्वों द्वारा हमारे लिए अन्न लाओ.
(१२)
सूक्त—२२ देवता—इंद्र
य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिन्द्रं तं गीर्भिरभ्यर्च आभिः.
यः पत्यते वृषभो वृष्णयावान्त्सत्यः सत्वा पुरुमायः सहस्वान्.. (१)
जो एकमात्र इंद्र प्रजाओं द्वारा विपत्तियों में बुलाने योग्य हैं, जो स्तोताओं की पुकार
सुनकर दौड़े आते हैं, जो कामवर्षी, शक्तिशाली, सत्यभाषी, शत्रुनाशक, विशाल बुद्धि वाले
एवं शत्रुपराभवकारी हैं, उन्हें हम इन स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. (१)
तमु नः पूर्वे पितरो नवग्वाः सप्त विप्रासो अभि वाजयन्तः
नक्षद्दाभं ततुरिं पर्वतेष्ठामद्रोधवाचं मतिभिः शविष्ठम्.. (२)
नौ महीने वाला यज्ञ करने वाले, बुद्धिमान्, हमारे सप्त अंगिरा आदि पूर्व पुरुषों ने
आक्रमणकारी शत्रुओं का दमन करने वाले, गतिसंपन्न, अतिक्रमणहीन आदेश वाले तथा
पर्वतों पर स्थित इंद्र को अन्न का स्वामी बनाकर स्तुतियां कीं. (२)
तमीमह इन्द्रमस्य रायः पुरुवीरस्य नृवतः पुरुक्षोः.
यो अस्कृधोयुरजरः स्वर्वाॅन्तमा भर हरिवो मादयध्यै... (३)
हम इंद्र से बहुत पुत्र-पौत्रों सहित, अनेक सेवकों सहित, विविध पशुओं से युक्त, सदा
रहने वाला, नाशरहित एवं सुख देने वाला धन मांगते हैं. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र!
तुम हमारे सुख के लिए हमें वह धन दो. (३)
तन्नो वि वोचो यदि ते पुरा चिज्जरितार आनशुः सुम्नमिन्द्र.
कस्ते भागः किं वयो दुध्र खिद्धः पुरुहूत पुरूवसोऽसुरघ्नः.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारे पुराने स्तोताओं ने जिस सुख को प्राप्त किया था, उसे हमें भी बताओ. हे
दुर्धर शत्रुओं को दुःख देने वाले बहुतों द्वारा बुलाए हुए, असुरनाशक एवं अधिक संपत्ति वाले
इंद्र! तुम्हारे लिए कौन सा भाग एवं हव्य निश्चित किया गया है? (४)
तं पृच्छन्ती वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्रं वेपी वक्वरी यस्य नू गीः.
तुविग्राभं तुविकूर्मिं रभोदां गातुमिषे नक्षते तुम्रमच्छ.. (५)
यज्ञकर्म करने वाले एवं गुणवर्णनयुक्त वाणी वाले यजमान वज्रधारी, रथ पर बैठने वाले,
अनेक यज्ञों को स्वीकार करने वाले एवं अनेक यज्ञों के करने हेतु शक्ति देने वाले इंद्र की पूजा
ebook converter DEMO Watermarks*

अया ह त्यं मायया वावृधानं मनोजुवा स्वतवः पर्वतेन.

Page 937Permalink

करते हैं. वह यजमान सुख प्राप्त करके शत्रु को ललकारता है. (५)
अया ह त्यं मायया वावृधानं मनोजुवा स्वतवः पर्वतेन.
अच्युता चिद्दिळिता स्वोजो रुजो वि दृळ्हा धृषता विरप्शिन्.. (६)
हे स्वयं शक्तिशाली इंद्र! तुमने मन में समान गतिशील व अनेक धारों वाले वज्र द्वारा
माया के सहारे बढ़ने वाले वृत्र को नष्ट किया. हे शोभन-तेज वाले एवं महान् इंद्र! तुमने उसी
तेजस्वी वज्र द्वारा विनाशरहित, दृढ़ एवं अशिथिल शत्रुनगरियों को तोड़ा. (६)
तं वो धिया नव्यस्या शविष्ठं प्रत्नं प्रत्नवत्परितंसयध्यै.
स नो वक्षदनिमानः सुवहेन्द्रो विश्वान्यति दुर्गहाणि.. (७)
हम प्राचीन ऋषियों के समान अति नवीन स्तुतियों द्वारा अतिशय शक्तिशाली एवं
प्राचीन इंद्र का यश बढ़ाते हैं. सीमारहित एवं शोभन वाहन वाले इंद्र हमें सभी पापों से
सुरक्षित रखें. (७)
आ जनाय द्रुह्वणे पार्थिवानि दिव्यानि दीपयोऽन्तरिक्षा.
तपा वृषन्विश्वतः शोचिषा तान्व्रह्मद्विषे शोचय क्षामपश्च.. (८)
हे इंद्र! तुम सज्जन पुरुषों के विरोधी लोगों के लिए धरती, स्वर्ग और अंतरिक्ष के स्थानों
को अतिशय दुःखदायी बना दो. हे कामवर्षी इंद्र! तुम अपने तेज से सर्वत्र व्याप्त राक्षसों को
जलाओ एवं उन ब्रह्मद्वेषियों को जलाने के लिए धरती और आकाश को तपाओ. (८)
भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसन्दृक्.
धिष्व वज्रं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजूर्य दयसे वि माया:.. (९)
हे दीप्तदर्शन इंद्र! तुम धरती एवं स्वर्ग में रहने वाले लोगों के स्वामी हो. हे जरा रहित
इंद्र! अपने दाहिने हाथ में वज्र धारण करो एवं राक्षसों की सभी मायाओं को समाप्त करो.
(९)
आ संयतमिन्द्र णः स्वस्तिं शत्रुतूर्याय बृहतीममृध्राम्.
यया दासान्यार्याणि वृत्रा करो वज्रिन्त्सुतुका नहुषाणि.. (१०)
हे इंद्र! हमें शत्रुओं पर विजय पाने के हेतु विशाल, अहिंसित, एकीभूत एवं
कल्याणकारिणी संपत्ति दो. हे वज्रधारी इंद्र! उस कल्याण द्वारा तुमने यज्ञकर्मरहित मनुष्यों
को यज्ञशील बनाया एवं शत्रु लोगों को भली प्रकार हिंसित किया. (१०)
स नो नियुद्भिः पुरुहूत वेधो विश्ववाराभिरा गहि प्रयज्यो.
न या अदेवो वरते न देव आभिर्याहि तूयमा मद्र्यद्रिक्.. (११)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२३ देवता—इंद्र

Page 938Permalink

हे बहुतों द्वारा बुलाए गए, यज्ञकर्म के विधाता एवं अतिशय यज्ञपात्र इंद्र! तुम सबके
द्वारा पसंद किए गए घोड़ों की सहायता से हमारे समीप आओ. देवों एवं दानवों द्वारा न रोके
जाने वाले घोड़ों के द्वारा तुम हमारे सामने आओ. (११)
सूक्त—२३ देवता—इंद्र
सुत इत्त्वं निमिश्ल इन्द्र सोमे स्तोमे ब्रह्माणि शस्यमान उक्थे.
यद्वा युक्ताभ्यां मघवन्हरिभ्यां बिभ्रद्वज्रं बाह्वोरिन्द्र यासि.. (१)
हे इंद्र! जब सोमरस निचुड़ जाता है, महान् स्तोत्र बोलना आरंभ हो जाता है एवं वैदिक
स्तुतियां होने लगती हैं, तब तुम अपने रथ में घोड़े जोड़ते हो. हे धनस्वामी इंद्र! तुम दोनों
हाथों में वज्र उठाकर रथ में जुड़े हुए दो घोड़ों की सहायता से आते हो. (१)
यद्वा दिवि पार्ये सुष्विमिन्द्र वृत्रहत्येऽवसि शूरसातौ.
यद्वा दक्षस्य बिभ्युषो अबिभ्यदरन्धयः शर्धत इन्द्र दस्यून्.. (२)
हे इंद्र! तुम स्वर्ग से उस युद्ध में उपस्थित होकर हव्यदाता यजमान की रक्षा करते हो,
जिस में वीर सम्मिलित होते हैं. तुम भयरहित होकर यज्ञकार्य में कुशल एवं भयभीत यजमान
को बाधा पहुंचाने वाले दस्युजनों को वश में करते हो. (२)
पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं प्रणेनीरुग्रो जरितारमूती.
कर्ता वीराय सुष्वय उ लोकं दाता वसु स्तुवते कीरये चित्.. (३)
इंद्र निचोड़े हुए सोम को पीने वाले हैं. इंद्र यज्ञकर्म में कुशल एवं भली प्रकार सोम
निचोड़ने वाले एवं स्तुतिकर्त्ता यजमान को निवासस्थान एवं धन देते हैं. (३)
गन्तेयान्ति सवना हरिभ्यां बभ्रिर्वज्रं पपिः सोम ददिर्गाः.
कर्ता वीरं नर्यं सर्ववीरं श्रोता हवं गृणतः स्तोमवाहाः.. (४)
वज्र धारण करने वाले, सोमरस पीने वाले, गाएं देने वाले, मानव हितकारी एवं अनेक
पुत्रों से युक्त पुत्र देने वाले, स्तोता की स्तुतियां सुनने वाले एवं स्तोत्रों द्वारा सेवनीय इंद्र इन
तीनों सवनों में अपने घोड़ों की सहायता से जाते हैं. (४)
अस्मै वयं यद्वावान तद्विविष्म इन्द्राय यो नः प्रदिवो अपस्कः.
सुते सोमे स्तुमसि शंसदुक्थेन्द्राय ब्रह्म वर्धनं यथासत्.. (५)
हमारे कल्याण के लिए पोषण आदि कर्म करने वाले प्राचीन इंद्र जिन स्तोत्रों को चाहते
हैं, उन्हें हम बोलते हैं. सोमरस निचुड़ जाने पर हम उन्हें बुलाते हैं. वेदमंत्रों का उच्चारण करते
हुए हम इंद्र को इस प्रकार हव्य देते हैं, जिससे उनकी उन्नति हो सके. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 939Permalink

ब्रह्माणि हि चकृषे वर्धनानि तावत्त इन्द्र मतिभिर्विद्विषम्:.
सुते सोमे सुतपाः शन्तमानि रान्द्रया क्रियास्म वक्षणानि यज्ञैः.. (६)
हे इंद्र! जिस प्रकार के स्तोत्रों को तुमने स्वयं बढ़ाया है, हम उसी प्रकार के स्तोत्रों की
बुद्धिपूर्वक रचना करते हैं. हे सोमपानकर्त्ता इंद्र! जब सोमरस निचूड़ जाता है, तब हम तुम्हारे
निमित्त अतिशय सुख देने वाले, सुदंर हव्य से युक्त एवं भावपूर्ण स्तोत्र बोलते हैं. (६)
स नो बोधि पुरोळाशं रराणः पिबा तु सोमं गोऋजीकमिन्द्र.
एदं बर्हिर्यजमानस्य सीदोरुं कृधि त्वायत उ लोकम्.. (७)
हे इंद्र! तुम प्रसन्न होकर हमारा पुरोडाश स्वीकार करो. गाय के दूध-दही से मिले
सोमरस को पिओ, यजमान द्वारा बिछाए हुए कुशों पर बैठो एवं अपने भक्त यजमान का घर
विस्तीर्ण करो. (७)
स मन्दस्वा ह्यनु जोषमुग्र प्र त्वा यज्ञास इमे अश्नुवन्तु.
प्रेमे हवासः पुरुहूतमस्मे आ त्वेयं धीरवस इन्द्र यम्याः.. (८)
हे उग्र इंद्र! तुम अपनी इच्छा के अनुकूल प्रसन्न बनो. ये सोम तुम्हें प्राप्त हों, हमारी
स्तुतियां बहुतों द्वारा बुलाए हुए इंद्र को प्राप्त हों. हे इंद्र! तुम्हें यह स्तुति हमारी रक्षा के निमित्त
विवश करे. (८)
तं वः सखायः सं यथा सुतेषु सोमेभिर्गी पृणता भोजमिन्द्रम्.
कुवित्त्तस्मा असति नो भराय न सुष्विमिन्द्रोऽवसे मृधाति.. (९)
हे स्तोताओ! तुम सोमरस निचूड़ जाने पर दाता इंद्र की अभिलाषाएं सोमरस द्वारा पूर्ण
करो. इंद्र के लिए अधिक मात्रा में सोमरस मिले, जिससे वे हमारा पोषण कर सकें. इंद्र
सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की तृप्ति में बाधा नहीं डालते हैं. (९)
एवेदिन्द्रः सुते अस्तावि सोमे भरद्वाजेषु क्षयदिन्मघोनः.
असद्यथा जरित्र उत सूरिरिन्द्रो रायो विश्ववारस्य दाता.. (१०)
भरद्वाज ऋषि ने सोमरस निचूड़ जाने पर हव्यरूप धन वाले यजमान के स्वामी इंद्र की
स्तुति इस प्रकार की है, जिससे इंद्र स्तुतिकर्त्ता को सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाले एवं सूर्य प्रिय
धन के दाता बनें. (१०)
सूक्त—२४ देवता—इंद्र
वृषा मद इन्द्रे श्लोक उक्था सचा सोमेषु सुतपा ऋजीषी.
अर्चत्र्यो मघवा नृभ्य उक्थैर्धुक्षो राजा गिरामक्षितोतिः.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 940Permalink

सोमरस-युक्त यज्ञ में इंद्र की सोमपान से उत्पन्न प्रसन्नता यजमान की अभिलाषा पूरी
करने वाली हो. वैदिक मंत्रों वाली स्तुति भी यजमान की इच्छा पूरी करे. सोम पीने वाले,
सोमलता का रसहीन अंश स्वीकारने वाले एवं धनवान् इंद्र मानवों की स्तुतियों द्वारा पूजा
करने योग्य हैं. स्वर्ग में रहने वाले एवं स्तुतियों के स्वामी इंद्र पूर्णतया रक्षा करते हैं. (१)
ततुर्रिवीरो नर्यो विचेताः श्रोता हवं गृणत उव्यूतिः.
वसुः शंसो नरां कारुधाया वाजी स्तुतो विदथे दाति वाजम्.. (२)
शत्रुओं के हिंसक, वीर, मानवहितकारी, विशेष-ज्ञानी हमारी स्तुति सुनने वाले,
स्तुतिकर्त्ताओं के विशेष रक्षक, निवासस्थान देने वाले, स्तोताओं के प्रशंसनीय, स्तुतियों को
समझने वाले एवं अन्न के स्वामी इंद्र यज्ञ में बुलाए जाने पर अन्न देते हैं. (२)
अक्षो न चक्रयोः शूर बृहन्प्र ते मह्ना रिरिचे रोदस्योः.
वृक्षस्य नु ते पुरुहूत वया व्यू३ तयो रुरुहुरिन्द्र पूर्वीः.. (३)
हे शूर इंद्र! तुम्हारी महिमा तुम्हारे रथ के पहियों के अक्ष के समान धरती-आकाश से
बढ़ जाती है. हे बहुतों द्वारा बुलाए हुए इंद्र! तुम्हारी बहुत सी रक्षाएं वृक्ष की शाखाओं के
समान बढ़ती हैं. (३)
शचीवतस्ते पुरुशाक शाका गवामिव स्रुतयः सञ्चरणीः.
वत्सानां न तन्तयस्त इन्द्र दामन्वन्तो अदामानः सुदामन्.. (४)
हे अनेक यज्ञकर्मकर्त्ता एवं बुद्धिमान् इंद्र! तुम्हारी शक्तियां गायों के समान मार्गों पर
चलती हैं. हे शोभन-दान वाले इंद्र! तुम्हारी शक्तियां बछड़ों की रस्सियों के समान स्वयं
बंधनहीन रहकर शत्रुओं को बांधती हैं. (४)
अन्यदद्य कर्वरमन्यदु श्वोऽसच्च सन्मुहुराचक्रिरिन्द्रः.
मित्रो नो अत्रा वरुणश्च पूषार्यो वशस्य पर्यैतास्ति.. (५)
इंद्र आज जो काम करते हैं, कल उसकी अपेक्षा विलक्षण कार्य करते हैं, वे बार-बार
सत् एवं असत् कार्य करते हैं. इस यज्ञ में इंद्र के अतिरिक्त मित्र, वरुण, पूषा एवं सविता
हमारी अभिलाषा पूरी करें. (५)
वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरिन्द्रानयन्त यज्ञैः.
तं त्वाभिः सुष्टुतिभिर्वाजयन्त आजिं न जग्मुर्गिर्वाहो अश्वा.. (६)
हे इंद्र! स्तोता हव्य और स्तुतियों द्वारा तुमसे इस प्रकार अपनी मनचाही वस्तुएं प्राप्त
करते हैं, जिस प्रकार पर्वत के ऊपरी भाग से जल मिलता है. हे स्तुतियों द्वारा वंदना करने
योग्य इंद्र! स्तुति करने वाले एवं अन्न के इच्छुक भरद्वाजगोत्रीय ऋषि स्तुतियां लेकर तुम्हारे
समीप इस प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार घोड़े जल्दी से युद्ध में उपस्थित होते हैं. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 941Permalink

न यं जरन्ति शरदो न मासा न द्याव इन्द्रमवकर्शयन्ति.
वृद्धस्य चिद्वर्धतामस्य तनूः स्तोमेभिरुक्थैश्च शस्यमाना.. (७)
वर्ष एवं मास इंद्र को बूढ़ा नहीं बनाते. दिन भी उन्हें दुर्बल नहीं करते. हमारी स्तुतियां
सुनकर महान् इंद्र का शरीर बढ़े. (७)
न वीळवे नमते न स्थिराय न शर्धते दस्युजूताय स्तवान्.
अज्रा इन्द्रस्य गिरयश्चिदृष्वा गम्भीरे चिद्भवति गाधमस्मै.. (८)
हमारी स्तुतियां सुनकर इंद्र दृढ़शरीर एवं युद्ध में अविचल रहने वाले यजमान के वश में
नहीं होते और न दस्युओं द्वारा उत्साहित तथा प्रेरित यजमान की ही बात मानते हैं. महान्
पर्वत भी इंद्र के लिए सुगम हैं एवं अधिक गहरा स्थान भी इंद्र से बच नहीं सकता. (८)
गम्भीरेण न उरुणामत्रिन्प्रेषो यन्धि सुतपावन्वाजान्.
स्था ऊ षु ऊर्ध्व ऊती अरिषण्यन्नक्तोर्व्युष्टौ परितक्म्यायाम्.. (९)
हे बलवान् एवं सोम पीने वाले इंद्र! तुम गंभीर एवं विस्तृत मन से हमें अन्न तथा शक्ति
दो. तुम हमारी हिंसा न करते हुए रात-दिन हमारी रक्षा के लिए तैयार रहो. (९)
सचस्व नायमवसे अभीक इतो वा तमिन्द्र पाहि रिषः.
अमा चैनमरण्ये पाहि रिषो मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (१०)
हे इंद्र! तुम यज्ञकर्म के नेता यजमान की रक्षा करो एवं समीपवर्ती तथा दूरवर्ती शत्रुओं
से उसे बचाओ. तुम घर में तथा जंगल में यजमान की रक्षा करो. हम शोभन-संतान वाले
बनकर सौ वर्ष तक प्रसन्न रहें. (१०)
सूक्त—२५ देवता—इंद्र
या त ऊतिरवमा या परमा या मध्यमेन्द्र शुष्मिन्नस्ति.
ताभिरू षु वृत्रहत्येऽवीर्न अभिश्न वाजैर्महान्न उग्र.. (१)
हे बलवान् इंद्र! तुम्हारे जो अधम, मध्यम एवं उत्तम रक्षा-साधन हैं, उनके द्वारा युद्ध में
हमारी भली-भांति रक्षा करो. हे उग्र एवं महान् इंद्र! तुम हमें भोजन के साधनरूप अन्न से
युक्त करो. (१)
आभिः स्पृधो मिथतीररिषण्यन्नमित्रस्य व्यथया मन्युमिन्द्र.
आभिर्विश्वा अभियुजो विषूचीरार्याय विशोऽव तारीर्दासीः.. (२)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमारी शत्रुघातिनी सेना की रक्षा करते हुए
शत्रुओं के कोष को समाप्त करो. इन्हीं स्तुतियों से प्रसन्न होकर यज्ञ करने वाले यजमान के
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 942Permalink

कल्याण के लिए या कार्यों को नष्ट करने वाली सभी प्रजाओं को समाप्त करो. (२)
इन्द्र जामय उत येऽजामयोऽर्वाचीनासो वनुषो युयुज्रे.
त्वमेषां विथुरा शवांसि जहि वृष्ण्यानि कृणुही पराच:.. (३)
हे इंद्र! जो निकट या दूर स्थित शत्रु हमारे सामने न आकर हमारी हिंसा करने के लिए
तैयार हैं, तुम उन शत्रुओं के बलों को हीन करो उनकी शक्ति समाप्त करो एवं उन्हें हमसे
विमुख बनाओ. (३)
शूरो वा शूरं वनते शरीरैस्तनूरुचा तरुषि यत्कृण्वैते.
तोके वा गोषु तनये यदप्सु वि क्रन्दसी उर्वरासु ब्रवैते.. (४)
हे इंद्र! वीर तुम्हारा अनुग्रह पाकर अपनी शारीरिक शक्ति से विरोधी वीर को मार
डालता है. शरीर से शोभा पाते हुए वे दोनों एक-दूसरे के विरोध में युद्ध करते हैं तथा पुत्र,
पौत्र, गाय, जल एवं उपजाऊ भूमि के विषय में जोर-जोर से बातें करते हैं. (४)
नहि त्वा शूरो न तुरो न धृष्णुर्न त्वा योधो मन्यमानो युयोध.
इन्द्र नकिष्ट्वा प्रत्यस्त्येषां विश्वा जातान्यभ्यसि तानि.. (५)
हे इंद्र! शूर, शत्रुनाशक, विजय पाने वाले एवं युद्ध में क्रुद्ध होते हुए योद्धा तुम्हारे साथ
युद्ध करने को तैयार नहीं होते. हे इंद्र! इन लोगों में कोई भी तुम्हारे बराबर नहीं है. तुम उन
सबको हराते हो. (५)
स पत्यत उभयोर्नृम्णमयौर्यदी वेधसः समिथे हवन्ते.
वृत्रे वा महो नृवति क्षये वा व्यचस्वन्ता यदि वितन्तसैते.. (६)
दास-दासियों वाले घर के लिए जो दो व्यक्ति आपस में लड़ते हैं, उन में से वही धन
पाता है, जिसके ऋत्विज् इंद्र के निमित्त हवन करते हैं. (६)
अध स्मा ते चर्षणीयो यदेजानिन्द्र त्रातोत भवा वरूता.
अस्माकासो ये नृतमासो अर्य इन्द्र सूरयो दधिरे पुरो न:.. (७)
हे इंद्र! तुम्हारे स्तोता जब भय से कांपने लगें तो तुम उनका पालन एवं रक्षण करो. हे
इंद्र! हमारे जो पुरुष यज्ञकार्य के नेता हैं एवं जिन्होंने हमें प्रधान बनाया है, तुम उनकी रक्षा
करो. (७)
अनु ते दायि मह इन्द्रियाय सत्रा ते विश्वमनु वृत्रहत्ये.
अनु क्षत्रमनु सहो यजत्रेन्द्र देवेभिरनु ते नृषह्ये.. (८)
हे महान् इंद्र! तुम्हारा ऐश्वर्य बढ़ाने के निमित्त शत्रुवध के लिए तुम्हें सभी शक्तियां दी गई
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 943Permalink

हैं। हे यज्ञपात्र इंद्र! युद्ध में तुम्हें सभी देवों ने ऐसा बल दिया है, जिससे तुम शत्रुओं का नाश
करने के साथ ही सबको धारण कर सको। (८)
एवा न स्पृधः समज समत्स्विन्द्र रारन्धि मिथतीरदेवीः.
विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो भरद्वाजा उत त इन्द्र नूनम्.. (९)
हे इंद्र! तुम इस प्रकार स्तुतियां सुनकर युद्धों में शत्रु सेनाओं को मारने के लिए हमें
प्रेरित करो एवं हिंसा करती हुई असुर सेनाओं को वश में करो. हे इंद्र! हम भरद्वाजवंशीय
ऋषि तुम्हारी स्तुति करते हुए अन्न के साथ ही निवास स्थान प्राप्त करें. (९)
सूक्त—२६ देवता—इंद्र
श्रुधी न इन्द्र ह्वयामसि त्वा महो वाजस्य सातौ वावृषाणाः.
सं यद्विशोऽयन्त शूरसाता उग्रं नोऽवः पार्ये अहन्दाः.. (१)
हे इंद्र! हम स्तोता तुम्हें सोमरस से सींचते हुए महान् अन्न पाने के लिए बुलाते हैं. तुम
हमारी पुकार सुनो. जब लोग युद्ध के लिए जावें, तब हम लोगों की उत्तम रक्षा करना. (१)
त्वां वाजी हवते वाजिनेयो महो वाजस्य गध्यस्य सातौ.
त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं तरुत्रं त्वां चष्टे मुष्टिहा गोषु युध्यन्.. (२)
हे इंद्र! वाजिनी के पुत्र भरद्वाज सबके द्वारा चाहने योग्य महान् अन्न को पाने के लिए
हव्ययुक्त होकर तुम्हें बुलाते हैं. उपद्रव सामने आने पर मैं सज्जनों के पालक एवं दुष्टों के
विनाशक इंद्र को बुलाता हूं. मैं गायों के हेतु शत्रुओं से लड़ता हुआ उन्हें मुक्कों से मार
डालता हूं. (२)
त्वं कविं चोदयोऽर्कसातौ त्वं कुत्साय शुष्णं दाशुषे वर्क्.
त्वं शिरो अमर्मणः पराहन्नतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन्.. (३)
हे इंद्र! तुम भार्गव ऋषि को अन्न पाने के लिए प्रेरित करो. तुमने हव्यदाता कुत्स के
कल्याण के लिए शुष्ण असुर को मारा था. तुमने अतिथिग्व को सुखी करने के लिए स्वयं को
अजेय समझने वाले शंबर असुर का सिर काट दिया. (३)
त्वं रथं प्र भरो योधमृष्वमावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम्.
त्वं तुग्रं वेतसवे सचाहन्त्वं तुजिं गृणन्तामिन्द्र तूतोः.. (४)
हे इंद्र! तुमने वृषभ राजा को युद्ध का साधन रथ दिया था. वृषभ जब दस दिन तक
चलने वाला युद्ध लड़ रहा था, तब तुमने उसकी रक्षा की थी. तुमने राजा वेतस का सहायक
बनकर तुग्र असुर को मारा था एवं स्तुति करने वाले तुजि नामक राजा की उन्नति की थी. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 944Permalink

त्वं तदुक्थमिन्द्र बर्हणा कः प्र यच्छता सहसा शूर दर्षि.
अव गिरेर्दासं शम्बरं हन्प्रावो दिवोदासं चित्राभिरूती.. (५)
हे शत्रुनाशक इंद्र! तुमने प्रशंसनीय कार्य किया है. हे शूर इंद्र! तुमने शंबर असुर के
सैकड़ों एवं हजारों योद्धाओं को विदीर्ण किया था. तुमने पर्वत से उत्पन्न एवं यज्ञादि कर्मों के
विघातक शंबर असुर को मारा था एवं विचित्र रक्षासाधनों द्वारा दिवोदास का पालन किया
था. (५)
त्वं श्रद्धाभिर्मन्दसानः सोमैर्दभीतये चुमुरिमिन्द्र सिष्वप्.
त्वं रजिं पिठीनसे दशस्यन्षष्टिं सहस्रा शच्या सचाहन्.. (६)
हे इंद्र! तुमने श्रद्धापूर्वक किए गए यज्ञों एवं सोमरस से प्रसन्न होकर दभीति राजा के
कल्याण के लिए चुमुरि नामक असुर को मारा. तुमने पिठीनस को राज्य देते समय अपनी
बुद्धि द्वारा साठ हजार योद्धाओं को एक साथ ही मार डाला. (६)
अहं चन तत्सूरिभिरानश्यां तव ज्याय इन्द्र सुम्नमोजः.
त्वया यत्स्तवन्ते सधवीर वीरास्त्रिवरूथेन नहुषा शविष्ठ.. (७)
हे वीरों से युक्त एवं अतिशय शक्तिशाली इंद्र! स्तोतागण शत्रुविजयी एवं त्रिभुवन-रक्षक
के रूप में तुम्हें मानकर तुम्हारे दिए हुए सुख एवं बल की स्तुति करते हैं. हे इंद्र! हम
भरद्वाजगोत्रीय ऋषि तुम्हारे द्वारा दिए गए उत्तम बल और सुख को अपने स्तोताओं के साथ
प्राप्त करें. (७)
वयं ते अस्यामिन्द्र द्युम्नहूतौ सखायः स्याम महिन प्रेष्ठाः.
प्रातर्दानिः क्षत्रश्रीरस्तु श्रेष्ठो घने वृत्राणां सनये धनानाम्.. (८)
हे पूजनीय इंद्र! हम तुम्हारे स्तोता इस धन निमित्तक स्तोत्र द्वारा तुम्हारे अतिशय प्रिय
बनें. प्रतर्दन के पुत्र क्षत्रश्री हमारे राजा हैं. वे शत्रुओं के नाश एवं धनलाभ में सबसे श्रेष्ठ हों.
(८)
सूक्त—२७ देवता—इंद्र
किमस्य मदे किम्वस्य पीताविन्द्रः किमस्य सख्ये चकार.
रणा वा ये निषदि किं ते अस्य पुरा विविद्र किमु नूतनासः.. (१)
इंद्र ने सोमरस से प्रसन्न होकर, सोमरस को पीकर एवं इससे मित्रता रखकर क्या काम
किया? हे इंद्र! प्राचीन एवं नवीन स्तोताओं ने यज्ञशाला में तुमसे क्या पाया? (१)
सदस्य मदे सद्वस्य पीताविन्द्रः सदस्य सख्ये चकार.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 945Permalink

रणा वा ये निषदि सत्ते अस्य पुरा विविद्रे सदु नूतनासः.. (२)
इंद्र ने सोमरस से प्रसन्न होकर, सोमरस पीकर एवं सोमरस से मित्रता स्थापित करके
उत्तम कर्म किए. हे इंद्र! प्राचीन एवं नवीन स्तोताओं ने तुमसे यज्ञशाला में सत्कर्म प्राप्त किया
था. (२)
नहि नु ते महिमनः समस्य न मघवन् मघवत्त्वस्य विद्म.
न राधसोराधसो नूतनस्येन्द्र नकिर्ददृश इन्द्रियं ते.. (३)
हे धनस्वामी इंद्र! हम तुम्हारे समान किसी महत्त्वशाली एवं धनी को नहीं जानते. तुम्हारे
समान धन का भी हमें ज्ञान नहीं है. हे इंद्र! तुम्हारे समान शक्ति कोई नहीं दिखाता. (३)
एतत्त्यत्त इन्द्रियमचेति येनावधीर्वरशिखस्य शेषः.
वज्रस्य यत्ते निहतस्य शुष्मात्स्वनाच्चिदिन्द्र परमो ददार.. (४)
हे इंद्र! हम तुम्हारा वह बल नहीं जानते, जिसके द्वारा तुमने वरशिख नामक राक्षस के
पुत्रों का वध किया था. हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा फेंके गए वज्र के शब्द से ही अतिशय बली
वरशिख के पुत्र मर गए थे. (४)
वधीदिन्द्रो वरशिखस्य शेषोऽभ्यावर्तिने चायमानाय शिक्षन्.
वृचीवतो यद्धरियूपीयायां हन्पूर्वे अर्धे भियसापरो दर्त्.. (५)
इंद्र ने चायमान राजा के पुत्र अभ्यवर्ती को मनचाहा धन देते हुए वरशिख के पुत्रों का
वध किया था. इंद्र ने जब हरियूपीया नामक नदी के एक ओर खड़े वरशिख के परिवारी
वृचीवान् को मारा, तब उस नदी के दूसरे किनारे पर खड़े वरशिख के पुत्र भय से मर गए. (५)
त्रिंशच्छतं वर्मिण इन्द्र साकं यव्यावत्यां पुरुहूत श्रवस्या.
वृचीवन्तः शरवे पत्यमानाः पात्रा भिन्दानान्यर्थनायन्.. (६)
हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम्हें युद्ध में मारकर यश चाहने वाले, तुम्हें मारने के लिए
आक्रमणकारी, यज्ञपात्रों को तोड़ते हुए एवं कवच धारण करने वाले वरशिख के एक सौ तीस
पुत्र यव्यावती नदी के समीप एक साथ ही मारे गए. (६)
यस्य गावावरुषा सूयवस्यू अन्तरू षु चरतो रेरिहाणा.
स सृञ्जयाय तुर्वशं परादाद्वृचीवतो दैववाताय शिक्षन्.. (७)
जिन इंद्र के तेजस्वी, सुंदर घास के इच्छुक एवं बार-बार घास का स्वाद लेने वाले घोड़े
धरती-आकाश के मध्य घूमते हैं, उन इंद्र ने तुर्वश राजा को सृंजय के लिए भेंट कर दिया एवं
देववाक वंश के राजा अभ्यवर्ती के कल्याण के लिए वरशिख के पुत्रों को वश में किया. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 946Permalink

द्वयाँ अग्ने रथिनो विंशतिं गा वधूमतो मघवा मह्यं सम्राट्.
अभ्यावर्ती चायमानो ददाति दूणाशेयं दक्षिणा पार्थवानाम्.. (८)
हे अग्नि! अधिक धन देने वाले एवं राजयज्ञ करने वाले राजा चायमान के पुत्र अभ्यवर्ती
ने हम भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों के लिए स्त्रियों सहित रथ एवं बीस गाएं दी हैं. पृथुवंश में
उत्पन्न राजा अभ्यवर्ती की दक्षिणा किसी के द्वारा नष्ट नहीं की जा सकती. (८)
सूक्त—२८ देवता—गो व इंद्र
आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे.
प्रजावतीः पुरुरूपा इह स्युरिन्द्राय पूर्वीरुषसो दुहाना.. (१)
गाएं हमारे घर आवें और हमारा कल्याण करें. वे हमारी गोशाला में बैठें एवं हमारे ऊपर
प्रसन्न हों. इस गोशाला की तरह-तरह के रंगों वाली गाएं बछड़ों वाली होकर इंद्र के निमित्त
प्रातःकाल दूध दें. (१)
इन्द्रो यज्वने पृणते च शिक्षत्युपेद्ददाति न स्वं मुषायति.
भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने खिल्ये नि दधति देवयुम्.. (२)
इंद्र यज्ञ करने वाले एवं स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करने वाले को मनचाहा धन देते हैं. वे उन्हें
सदा धन देते हैं, कभी छीनते नहीं. वे बराबर ऐसे लोगों का धन बढ़ाते हैं एवं देवों को चाहने
वाले को शत्रुओं द्वारा भिन्न न होने वाले स्थान में रखते हैं. (२)
न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति.
देवाँश्च याभिर्यजते ददाति च ज्योगित्ताभिः सचते गोपतिः सह.. (३)
वे गाएं नष्ट न हों. चोर उन्हें चुरावें नहीं. शत्रुओं का शस्त्र उन पर न गिरे. गायों का
स्वामी जिन गायों द्वारा इंद्र के निमित्त यज्ञ करता है एवं जिन्हें इंद्र को दिया जाता है, उन
गायों के साथ उनका स्वामी अधिक समय तक रहे. (३)
न ता अर्वा रेणुककाटो अश्नुते न संस्कृतत्रमुप यन्ति ता अभि.
उरुगायमभयं तस्य ता अनु गावो मर्तस्य वि चरन्ति यज्वनः.. (४)
धूल उड़ाने वाले एवं युद्ध के लिए आए हुए घोड़े उन गायों को न पावें. वे गाएं विशसन
संस्कार को न प्राप्त करें. यज्ञकर्त्ता मनुष्य की गाएं विस्तृत एवं भयरहित स्थान में घूमें. (४)
गावो भगो गाव इन्द्रो मे अच्छान् गावः सोमस्य प्रथमस्य भक्षः.
इमा या गावः स जनास इन्द्र इच्छामीद्धृदा मनसा चिदिन्द्रम्.. (५)
गाएं हमारा धन हों. इंद्र हमें गाएं दें. गाएं हमें उत्तम सोमरस के रूप में भक्ष्य दें. हे
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 947Permalink

मनुष्यो! इसी प्रकार की गाएं इंद्र बन जाती हैं. हम श्रद्धापूर्ण मन से इंद्र को चाहते हैं. (५)
यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम्.
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद्वो वय उच्यते सभासु.. (६)
हे गायो! तुम हमें बलिष्ठ बनाओ. तुम दुबले एवं असुंदर को भी सुंदर शरीर वाला
बनाओ. हे भद्रवचन वाली गायो! हमारे घर को कल्याणमय बनाओ. यज्ञ सभाओं में तुम्हारे
महान् अन्न का वर्णन होता है. (६)
प्रजावती: सूयवसं रिशन्ती: शुद्धा अप: सुप्रापाणे पिबन्ती:
मा व: स्तेन ईशत माघशंस: परि वो हेती रुद्रस्य वृज्या:.. (७)
हे गायो! तुम संतान वाली बनो, खाने के निमित्त सुंदर तिनके तोड़ो एवं सुख से पीने
योग्य तालाब आदि से साफ पानी पिओ. चोर तुम्हारा मालिक न बने. हिंसक पशु तुम पर
आक्रमण न करें. कालरूप परमेश्वर का आयुध तुमसे दूर रहे. (७)
उपेदमुपपर्चनमासु गोषूप पृच्यताम्. उप ऋषभस्य रेतस्युपेन्द्र तव वीर्ये.. (८)
हे इंद्र! तुम्हें शक्तिशाली बनाने के लिए इन गायों के पुष्ट होने की प्रार्थना की जा रही है.
तुम्हारी शक्ति के लिए गायों को गर्भवती बनाने वाले सांडों की शक्ति की प्रार्थना की जा रही
है. (८)
सूक्त—२९ देवता—इंद्र
इन्द्रं वो नर: सख्याय सेपुर्महो यन्तः सुमतये चकाना:.
महो हि दाता वज्रहस्तो अस्ति महामु रणवमवसे यजध्वम्.. (१)
हे यजमानो! तुम्हारे मित्ररूपी ऋत्विज् मित्रता पाने के लिए इंद्र की सेवा करते हैं. वे
महान् स्तोत्र बोलते हुए इंद्र की कृपादृष्टि चाहते हैं. हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र महान्
धनदाता हैं. तुम रक्षा के हेतु महान् एवं सुंदर इंद्र की पूजा करो. (१)
आ यस्मिन्हस्ते नर्या मिमिक्षुरा रथे हिरण्यये रथेष्ठा:.
आ रश्मयो गभस्त्यो: स्थूरयोराध्वन्नश्वासो वृषणो युजाना:.. (२)
जिन इंद्र के हाथों में मानव-हितकारी धन रहता है, जो सोने के बने रथ पर बैठते हैं,
जिनकी मोटी भुजाओं में किरणें समाई हुई हैं एवं जिनके कामवर्षक घोड़े रथ में जुड़े हुए हैं,
उनकी हम स्तुति करते हैं. (२)
श्रिये ते पादा दुव आ मिमिक्षुर्धृष्णुर्वज्री शवसा दक्षिणावान्.
वसानो अत्कं सुरभिं दृशे कं स्वर्ष्ण नृतविषिरो बभूथ.. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 948Permalink

हे इंद्र! भरद्वाज ऋषि ऐश्वर्य पाने के लिए तुम्हारे चरणों में अपनी सेवा भेंट करते हैं. तुम
वज्रधारणकर्त्ता, शत्रुपराभवकारी एवं शक्ति द्वारा दक्षिणारूप धन स्तोताओं को देते हो. हे
नेता इंद्र! तुम सबको दिखाई देने के विचार से प्रशंसनीय एवं नित्यगमन वाला रूप धारण
करके सूर्य के समान घूमते हो. (३)
स सोम आमिश्लतमः सुतो भूद्यस्मिन्पक्तिः पच्यते सन्ति धानाः.
इन्द्रं नरः स्तुवन्तो ब्रह्मकारा उक्था शंसन्तो देववाततमाः.. (४)
सोमरस निचोड़ जाने पर उस में भली-भांति से दूध-दही मिलाया गया है. इसके बाद ही
पुरोडाश पकाया गया है एवं जौ भूने गए हैं. यज्ञ के नेता ऋत्विज् हव्यरूप अन्न धारण करते
हुए इंद्र की स्तुतियां करते हैं एवं उक्थों को बोलते हुए देवों के निकट जाते हैं. (४)
न ते अन्तः शवसो धाय्यस्य वि तु बाबधे रोदसी महित्वा.
आ ता सूरिः पृणति तूतुजानो यूथेवाप्सु समीजमान ऊती.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारी शक्ति का अंत नहीं है. धरती-आकाश भी तुम्हारे महान् बल से डरते हैं.
गोरक्षक जिस प्रकार पानी के द्वारा गायों को संतुष्ट बनाता है, उसी प्रकार स्तोता तृप्त करने
वाले हवि से तुम्हें भली-भांति प्रसन्न करते हैं. (५)
एवेदिन्द्रः सुहव ऋष्वो अस्तूती अनूती हिरिशिप्रः सत्वा.
एवा हि जातो असमात्योजाः पुरू च वृत्रा हनति नि दस्यून्.. (६)
हरे रंग की ठोड़ी वाले इंद्र इस प्रकार ठीक से बुलाने योग्य हैं. इंद्र स्वयं आवें अथवा न
आवें, पर स्तोताओं को धन देते हैं. इस प्रकार उत्पन्न हुए इंद्र सर्वाधिक शक्तिशाली होने के
कारण बड़े-बड़े शत्रुओं एवं राक्षसों को मारते हैं. (६)
सूक्त—३० देवता—इंद्र
भूय इद्वावृधे वीर्यायँ एको अजुर्यो दयते वसूनि.
प्र रिरिचे दिव इन्द्रः पृथिव्या अर्धमिदस्य प्रति रोदसी उभे.. (१)
इंद्र वीरतापूर्ण-कार्य करने के लिए बार-बार बढ़े हैं. प्रमुख एवं जरारहित इंद्र स्तोताओं
को धन देते हैं एवं धरती-आकाश से भी बढ़कर हैं. इनका आधा भाग ही धरती-आकाश के
बराबर है. (१)
अधा मन्ये बृहदसुर्यमस्य यानि दाधार नकिरा मिनाति.
दिवेदिवे सूर्यो दर्शतो भूद्वि सद्मान्युर्विया सुक्रतुर्धात्.. (२)
हम इंद्र के उस बल की स्तुति करते हैं, जो असुरों को मारने में कुशल है. इंद्र जिन कामों