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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 940 of 1855

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Page 940

सोमरस-युक्त यज्ञ में इंद्र की सोमपान से उत्पन्न प्रसन्नता यजमान की अभिलाषा पूरी
करने वाली हो. वैदिक मंत्रों वाली स्तुति भी यजमान की इच्छा पूरी करे. सोम पीने वाले,
सोमलता का रसहीन अंश स्वीकारने वाले एवं धनवान् इंद्र मानवों की स्तुतियों द्वारा पूजा
करने योग्य हैं. स्वर्ग में रहने वाले एवं स्तुतियों के स्वामी इंद्र पूर्णतया रक्षा करते हैं. (१)
ततुर्रिवीरो नर्यो विचेताः श्रोता हवं गृणत उव्यूतिः.
वसुः शंसो नरां कारुधाया वाजी स्तुतो विदथे दाति वाजम्.. (२)
शत्रुओं के हिंसक, वीर, मानवहितकारी, विशेष-ज्ञानी हमारी स्तुति सुनने वाले,
स्तुतिकर्त्ताओं के विशेष रक्षक, निवासस्थान देने वाले, स्तोताओं के प्रशंसनीय, स्तुतियों को
समझने वाले एवं अन्न के स्वामी इंद्र यज्ञ में बुलाए जाने पर अन्न देते हैं. (२)
अक्षो न चक्रयोः शूर बृहन्प्र ते मह्ना रिरिचे रोदस्योः.
वृक्षस्य नु ते पुरुहूत वया व्यू३ तयो रुरुहुरिन्द्र पूर्वीः.. (३)
हे शूर इंद्र! तुम्हारी महिमा तुम्हारे रथ के पहियों के अक्ष के समान धरती-आकाश से
बढ़ जाती है. हे बहुतों द्वारा बुलाए हुए इंद्र! तुम्हारी बहुत सी रक्षाएं वृक्ष की शाखाओं के
समान बढ़ती हैं. (३)
शचीवतस्ते पुरुशाक शाका गवामिव स्रुतयः सञ्चरणीः.
वत्सानां न तन्तयस्त इन्द्र दामन्वन्तो अदामानः सुदामन्.. (४)
हे अनेक यज्ञकर्मकर्त्ता एवं बुद्धिमान् इंद्र! तुम्हारी शक्तियां गायों के समान मार्गों पर
चलती हैं. हे शोभन-दान वाले इंद्र! तुम्हारी शक्तियां बछड़ों की रस्सियों के समान स्वयं
बंधनहीन रहकर शत्रुओं को बांधती हैं. (४)
अन्यदद्य कर्वरमन्यदु श्वोऽसच्च सन्मुहुराचक्रिरिन्द्रः.
मित्रो नो अत्रा वरुणश्च पूषार्यो वशस्य पर्यैतास्ति.. (५)
इंद्र आज जो काम करते हैं, कल उसकी अपेक्षा विलक्षण कार्य करते हैं, वे बार-बार
सत् एवं असत् कार्य करते हैं. इस यज्ञ में इंद्र के अतिरिक्त मित्र, वरुण, पूषा एवं सविता
हमारी अभिलाषा पूरी करें. (५)
वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरिन्द्रानयन्त यज्ञैः.
तं त्वाभिः सुष्टुतिभिर्वाजयन्त आजिं न जग्मुर्गिर्वाहो अश्वा.. (६)
हे इंद्र! स्तोता हव्य और स्तुतियों द्वारा तुमसे इस प्रकार अपनी मनचाही वस्तुएं प्राप्त
करते हैं, जिस प्रकार पर्वत के ऊपरी भाग से जल मिलता है. हे स्तुतियों द्वारा वंदना करने
योग्य इंद्र! स्तुति करने वाले एवं अन्न के इच्छुक भरद्वाजगोत्रीय ऋषि स्तुतियां लेकर तुम्हारे
समीप इस प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार घोड़े जल्दी से युद्ध में उपस्थित होते हैं. (६)
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