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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 935 of 1855

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Page 935

स्तुति करते हुए तुम्हारे प्राचीन एवं उत्कृष्ट कार्यों को मंत्र वचनों के द्वारा बांधने का प्रयत्न
करते हैं. हम जो बातें जानते हैं, उन्हीं के द्वारा तुझ महान् की पूजा करते हैं. (६)
अभि त्वा पाजो रक्षसो वि तस्थे महि जज्ञानमभि तत्सु तिष्ठ.
तव प्रत्नेन युज्येन सख्या वज्रेण धृष्णो अप ता नुदस्व.. (७)
हे इंद्र! राक्षसों की सेना तुम्हारे सामने खड़ी होती है. तुम भी उस महान् एवं उन्नत सेना
के सामने डट जाओ. हे शत्रु पराभवकारी इंद्र! तुम प्राचीन, साथ रखने योग्य एवं नित्य-
सहायक वज्र द्वारा उन्हें दूर भगाओ. (७)
स तु श्रुधीन्द्र नूतनस्य ब्रह्मण्यतो वीर कारुधायः.
त्वं ह्या३ पिः प्रदिवि पितॄणां शश्वद्बभूथ सुहव एष्टौ.. (८)
हे स्तोताओं के रक्षक एवं वीर इंद्र! आधुनिक एवं स्तुति करने के इच्छुक हम लोगों के
वचनों को तुम सुनो. तुम्हीं यज्ञ में सुंदर आह्वान सुनकर अंगिरागोत्रीय ऋषियों के चिरकाल
बंधु बने थें. (८)
प्रोतये वरुणं मित्रमिन्द्रं मरुतः कृष्वावसे नो अद्य.
प्र पूषणं विष्णुमग्निं पुरन्धिं सवितारमोषधीः पर्वतांश्च.. (९)
हे भरद्वाज! हमारी रक्षा के लिए तुम इस समय वरुण, मित्र, मरुद्गण, पूषा, विष्णु,
सर्वप्रमुख-अग्नि, सविता, ओषधियों एवं पर्वतों को स्तुति द्वारा प्रसन्न करो. (९)
इम उ त्वा पुरुशाक प्रयज्यो जरितारो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
श्रुधी हवमा हुवतो हुवानो न त्वावाँ अन्यो अमृत त्वदस्ति.. (१०)
हे परम शक्तिशाली एवं अतिशय यज्ञपात्र इंद्र! ये स्तोता लोग स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी पूजा
करते हैं. हे मरणरहित इंद्र! स्तुति का विषय बनकर तुम मुझ स्तोता की पुकार सुनो. तुम्हारे
समान दूसरा कोई नहीं है. (१०)
नू म आ वाचमुप याहि विद्वान् विश्वेभिः सूनो सहसो यजत्रैः.
ये अग्निजिह्वा ऋतसाप आसुर्यं मनुं चक्रुरुपरं दसाय... (११)
हे बलपुत्र एवं विद्वान् इंद्र! तुम सभी देवों के साथ शीघ्र मेरे स्तुति वचनों के सामने
आओ. अग्नि उन देवों की जीभ है, जो यज्ञ का स्पर्श करते हैं एवं जिन्होंने शत्रुनाश के हेतु
मनु को असुरों की अपेक्षा शक्तिशाली बनाया. (११)
स नो बोधि पुरएता सुगेषूत दुर्गेषु पथिकृद्विदानः.
ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिर्न इन्द्राभि वक्षि वाजम्.. (१२)
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