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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४९

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४९
बताया है । अब यहां ब्रह्मानन्द वासनानन्द और आनन्द का प्रतिबिम्ब
नों नये ही तीन भेद कर दिये हैं। यह पूर्वोत्तर विरोध है। इसके अति-
रिक्त इसी प्रकरण के 'यावद्यावदहंकार'इस ९८ वें श्लोक में तथा'तादृक्
प्रमान्' इस १२१ वें श्लोक में निजानन्द और मुख्यानन्द का भी वर्णन
है। तथा अगले आत्मानन्द प्रकरण में 'मन्दप्रज्ञं तु जिज्ञासु मात्मानन्देन
बोधयेत्'उससे भिन्न ही आत्मानन्द का वर्णन आया है। अद्वैतानन्द के
पहले श्लोक में योगानन्द नाम का भेद भी मालूम हो रहा है। अद्वैता-
नन्द के १०५ श्लोक में अद्वैतानन्द एक नया ही भेद देख रहे हैं। ऐसी
अवस्था में इन तीनों आनन्दों के अतिरिक्त और कोई आनन्द है ही
नहीं" यह कहना विरुद्ध प्रतीत होता है। उत्तर-अन्तःकरण वृत्तिरूप
होने के कारण से विद्यानन्द भी विषयानन्द में ही अन्तर्भूत हो जाता है।
तथा निजानन्द मुख्यानन्द आत्मानन्द योगानन्द और अद्वैतानन्द नाम
के सभी आनन्द ब्रह्मानन्द से भिन्न कुछ भी नहीं है। इसी प्रकरण के
९८ वें श्लोक में जिस निजानन्द का वर्णन है वह भी ब्रह्मानन्द से अति-
रिक्त तत्व नहीं है क्योंकि इससे अगले १०० वें श्लोक में इस निजानन्द
को ही ब्रह्मानन्द कहा है। मुख्यानन्द भी ब्रह्मानन्द ही है क्योंकि आगे
आनन्दवासना की उपेक्षा करके मुख्यानन्द की भावना, तत्पर होकर
करने की बात कही है यों इस में ब्रह्मानन्द को ही मुख्यानन्द कहा है।
आत्मानन्द और अद्वैतानन्द तो ब्रह्मानन्द ही है। इस कारण ब्रह्मानन्द
वासना और प्रतिबिम्ब वाला भेद ठीक ही है।
तथा च विषयानन्दो वासनानन्द इत्ययम् ।
आनन्दौ जनयन्नास्ते ब्रह्मानन्दः स्वयंप्रभः ॥८८॥
यों आनन्द के तीन प्रकार का होने पर भी जो स्वयंप्रकाश
आनन्द 'विषयानन्द' को और 'वासनानन्द' को उत्पन्न किया
करता है उसी को 'ब्रह्मानन्द' जानना चाहिये।
३०

४५० पञ्चदशी
श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यः स्वप्रकाशचिदात्मके ।
ब्रह्मानन्दे सुप्तिकाले सिद्धे सत्यन्यदा शृणु ॥८९॥
सुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति इत्यादि 'श्रुतियों'
से, 'मैं सुख पूर्वक सोया था' इत्यादि परामर्श के और तरह से
न हो सकने वाली 'युक्ति' से तथा सुषुप्ति के 'अनुभव' से अब
तक यह सिद्ध किया जा चुका है कि सुषुप्ति काल में स्वयंप्रकाश
ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में भी ब्रह्मानन्द को
जानने का जो उपाय है उसका वर्णन किया जायगा उसे सुन लो।
य आनन्दमयः सुप्तौ स विज्ञानमयात्मताम् ।
गत्वा स्वप्नं प्रबोधं वा प्राप्नोति स्थानभेदतः ॥९०॥
सुषुप्तिकाल का जो उपरिवर्णित 'आनन्दमय' है, वह जब
विज्ञानमयता को पाता है तब फिर स्थानभेद के कारण कर्मानु-
सार 'स्वप्न' या 'जागरण' में आता है ।
नेत्रे जागरणं कण्ठे स्वप्नः सुप्तिर्हृदम्बुजे ।
आपादमस्तकं देहं व्याप्य जागर्ति चेतनः ॥९१॥
(नेत्र में 'जागरण' रहता है कण्ठ में 'स्वप्न' होता है हृदय
कमल में 'सुषुप्ति' होती है ।) यह जीव केवल नेत्र ही नहीं किन्तु
पैर से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त करके जागा करता है ।
आत्मा का स्वाभाविक स्थान हृदय है परन्तु अहंकार और
ममता की प्रेरणा से जब वहां नहीं रहा जाता तब आत्मा का
प्रतिबिम्ब विषयभोगलिप्सा के लिये मलिन हो जाता है तब
जाग्रत अवस्था में तो नेत्र तथा स्वप्न अवस्था में कण्ठ उस के
निवास स्थान बन जाते हैं ।