पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९
द्वैत की अवज्ञा जब पूर्ण रूप से स्थित हो जाती है, तब साधक
की बुद्धि अद्वैत में स्थिर हो जाती है । इस बुद्धि के स्थिर हो
जाने पर फिर यह [ स्थिर बुद्धि वाला ] पुरुष 'जीवन्मुक्त'
कहाने लगता है । [अर्थात् जीवन्मुक्ति रूपी प्रयोजन के विद्य-
मान होने के कारण यह द्वैतापमान कोई निष्प्रयोजन बात
नहीं है । हां, उन लोगों का अद्वैतापमान उन के कल्याण मार्ग
का घातक अवश्य ही है ] ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥१०३॥
['जीवन्मुक्ति ही नहीं विदेहमुक्ति भी इसी द्वैतावज्ञा का फल
है' यह बात भगवद्गीता (२-७२) में कही गई है ] हे पार्थ, यहां
तक ब्रह्मनिष्ठा का वर्णन किया गया। [परमेश्वर की आराधना
से शुद्ध अन्तःकरण का] मनुष्य जब इस स्थिति को पा लेता है,
तब फिर वह कभी संसारमोह को प्राप्त नहीं होता है । यदि
अन्तकाल में भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में
निर्वाण किंवा लय को पा लेता है । [अथवा मरते समय क्षण
भर के लिये भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में निर्वाण
किंवा विदेहमुक्ति को पा लेता है, फिर जो पुरुष बचपन से ही इस
स्थिति में रहने लगा हो तो उस का कहना ही क्या है ? ]
सदद्वैतेऽनृतद्वैते यदन्योन्यैकवीक्षणम् ।
तस्यान्तकालस्तद्भेदबुद्धिरेव न चेतरः ॥१०४॥
[भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक में अन्तकाल शब्द से क्या
अभिप्राय है सो अब बताया जाता है] 'सद्रूप अद्वैत' तथा
'अनृतरूप द्वैत' में जो अब तक अन्योन्यैकवीक्षण
अन्योन्याध्यासरूपी ऐक्यज्ञान ] हो रहा था उस भ्रमज्ञान का
अन्तकाल तो यही है कि उनकी भेदबुद्धि उत्पन्न हो जाय
[अर्थात् उन अद्वैत और द्वैत को क्रम से सत्य और अनृत
समझ लिया जाय]। इस श्लोक में अन्तकाल शब्द का अभि-
प्राय वर्तमान देहपात से नहीं है ।
यद्वान्तकालः प्राणस्य वियोगोऽस्तु प्रसिद्धितः।
तस्मिन् कालेऽपि न भ्रान्तेर्गतायाः पुनरागमः॥१०५॥
अथवा लोकप्रसिद्धि के अनुसार प्राणों के वियोग को ही
अन्तकाल मान लो । उस में भी कोई दोष नहीं है । क्योंकि
जो भ्रान्ति उस समय नष्ट हो जायगी वह भ्रान्ति फिर कभी
भी लौट कर आने वाली नहीं है ।
इस लोक तथा परलोक की सन्धि 'मृत्यु' होती है । मृत्यु
समय में जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में उस
की परलोकसामग्री जल कर भस्म बन जायगी। फिर उसे
विदेह मुक्ति मिल जानी अत्यन्त सुकर होगी ।
नीरोग उपविष्टो वा रुग्णो वा विलुठन् भुवि ।
मूर्च्छितो वा त्यजत्वेष प्राणान् भ्रान्तिर्न सर्वथा ॥१०६॥
[जिस पुरुष की द्वैतावज्ञा स्थित हो गयी हो अथवा जिसे
ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो फिर] वह चाहे तो नीरोग
होकर, चाहे बैठे बैठे, चाहे रोगी रहकर, या भूमि पर पड़े
पड़े, अथवा मूर्च्छा अवस्था में प्राणों का त्याग करदे, उसे फिर
कभी भी भ्रान्ति नहीं हो सकती [मूर्च्छा आदि में ब्रह्म-विषयक
बुद्धिवृत्ति न भी हो तो भी ब्रह्मज्ञान के संस्कार तो रहते ही हैं,
उन्हीं से मुक्ति मिलकर रहेगी।]