पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ध्यानदीपप्रकरणम् ३९५
ध्यानदीपप्रकरणम् ३९५
जाने पर, पुरुष के अन्दर असंग वस्तु शेष रह जाती है । इस
असंग वस्तु की भावना जब बार बार की जाती है तब तत्वमसि
आदि वाक्यों से तत्वज्ञान [ कि ब्रह्मनाम का सत्य मैं ही हूँ
यह ज्ञान ] उत्पन्न हो ही जाता है ।
निर्विकारासङ्गनित्यस्वप्रकाशैकपूर्णताः ।
बुद्धौ झटिति शास्त्रोक्ता आरोहन्त्यविवादतः ॥१२८॥
उस समय तो निर्विकारता, असंगता, नित्यता, स्वप्रकाशता,
एकता, तथा पूर्णता नामक उदार धर्म; जिन का कि शास्त्रों
में वर्णन आता है, झटपट बुद्धि में बैठ जाते हैं । फिर उसे
इनके विषय में विवाद या संशय नहीं रहता [ जब तक निरोध
का लाभ नहीं हो जाता,तब तक निर्विकारता,असंगता, स्वप्रका-
शता आदि का सच्चा अर्थ किसी की कल्पना में आता ही
नहीं । इन शब्दों के अन्दर जो अनन्त खजाना भरा पड़ा है
वह उक्त साधन किये बिना किसी को दीखता ही नहीं । ]
योगाभ्यास स्त्वेतदर्थोऽमृतविन्दादिषु श्रुतः ।
एवं च दृष्टद्वारापि हेतुत्वादन्यतो वरम् ॥१२९॥
अमृतबिन्दु आदि उपनिषदों में उसी [निर्विकल्प समाधि
को सिद्ध करने] के लिये योगाभ्यास का करना बताया है ।
[क्योंकि निर्गुण उपासना प्रत्यक्षज्ञान के सब से अधिक निकट
है । उससे एक यह दृष्ट फल भी होता है कि निर्विकल्प समाधि का
लाभ हो जाता है] यों यह निर्गुण उपासना सगुण उपासना
से बहुत ऊँची वस्तु है । यह निर्गुणोपासना दृष्ट [ निर्विकल्प-
समाधिलाभ] और अदृष्ट[ज्ञान का साधन होने से]दो प्रकारों
से सगुणोपासना आदियों से श्रेष्ठ वस्तु है ।