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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३
सकृदाप्तोपदेशेन परोक्षज्ञान मुद्भवत् ।
विष्णुमूर्त्युपदेशो हि न मीमांसामपेक्षते ॥२५॥
आप्त पुरुष के एक बार के उपदेश से ही परोक्ष ज्ञान हो जाता
है। लोक में भी देखलो कि विष्णुमूर्तिका उपदेश बहस और
तर्क की अपेक्षा नहीं करता [जिसको उससे ज्ञान होना होता
है उस पहली बार के उपदेश से ही हो जाता है । ]
कर्मोपास्ती विचार्येते अनुष्ठेयाविनिर्णयात् ।
बहुशाखाविप्रकीर्णं निर्णोतुं कः प्रभुर्नरः ॥२६॥
अनुष्ठान करने योग्य कर्म तथा उपासनाओं में सन्देह
हो सकता है, इससे उनका विचार किया जाता है। क्योंकि
अनेक शाखाओं में जहां तहां प्रतिपादित किये हुए कर्म को
कोई भी पुरुष सहसा निर्णय नहीं कर सकता ।
निर्णीतोऽर्थः कल्पसूत्रै ग्रथित स्तावतास्तिकः ।
विचारमन्तरेणापि शक्तोऽनुष्ठातुमञ्जसा ॥२७॥
जैमिनि आदि पूर्वाचार्यों ने जिस अर्थ का निश्चय कर
दिया है, उसी अर्थ [कर्म पद्धति] को कल्प सूत्रों ने संग्रह कर
लिया है। आस्तिक पुरुष तो बस इतने ही से सन्तुष्ट हो जाता
है और विचार किये बिना भी कर्म को भले प्रकार कर
सकता है ।
उपास्तीनामनुष्ठानमार्षग्रन्थेषु वर्णितम् ।
विचाराक्षममर्त्याश्च तच्छ्रुत्वोपासते गुरोः ॥२८॥
उपासनाओं की रीति भी आर्ष ग्रन्थों में कही गयी है ।
जो पुरुष स्वयं विचार नहीं कर सकते, वे कल्पों में कही हुई
उपासनाओं को गुरुमुख से सुनकर करने लगते हैं ।

३६४ पञ्चदशी
वेदवाक्यानि निर्णोतु मिच्छन् मीमांसतां जनः ।
आप्तोपदेशमात्रेण ह्यनुष्ठानं हि सम्भवेत् ॥२९॥
वेद वाक्यों का निर्णय चाहने वाला आजकल का पुरुष,
अपनी बुद्धि को सन्तुष्ट करने के लिये उनका विचार करता
है तो करे । उन कर्मों का अनुष्ठान तो केवल इतने से ही हो
सकता है कि वे आप्तों के उपदेश हैं ।
ब्रह्मसाक्षात्कृति स्त्वेवं विचारेण विना नृणाम् ।
आप्तोपदेशमात्रेण न सम्भवति कुत्रचित् ॥३०॥
कर्मानुष्ठान की तरह, विचार किये विना केवल आप्त
पुरुष के कहदेने से ही ब्रह्म साक्षात्कार तो कभी भी संभव
नहीं है ।
परोक्षज्ञान मश्रद्धा प्रतिबध्नाति नेतरत् ।
अविचारोऽपरोक्षस्य ज्ञानस्य प्रतिबन्धकः ॥३१॥
अश्रद्धा ही परोक्षज्ञान को होने से रोकती रहती है, अवि-
चार नहीं, [जब अश्रद्धा टूट जाती है तब एक बार के उपदेश
से ही परोक्षज्ञान हो सकता है] अविचार तो अपरोक्षज्ञान का
प्रतिबन्धक है । [विचार के द्वारा जब तक अविचार को निवृत्त
नहीं कर दिया जाता तब तक अपरोक्षज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता
इस कारण विचार करना चाहिये ।]
विचार्याप्यापरोक्ष्येण ब्रह्मात्मानं न वेत्ति चेत् ।
आपरोक्ष्यावसानत्वादू भूयो भूयो विचारयेत् ॥३२॥
'तत्' 'त्वं' पदार्थों को विचार कर भी यदि ब्रह्म और आत्मा
की एकता को प्रत्यक्षरूप में नहीं जान सका है तो बार बार
विचार ही करना चाहिये । क्योंकि विचार की समाप्ति तभी