पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१५
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१५
गुंजापुञ्जादि दहेत नान्यारोपितवन्हिना ।
नान्यारोपितसंसारधर्मानैवमहं भजे ॥२५९॥
जिस गुञ्जा समूह को दूसरे लोग अग्नि समझ लेते हैं, तो
जैसे वह यथार्थ ही जलाने नहीं लगता है, इसी प्रकार दूसरों
के आरोपित संसारधर्मों को भला मैं कैसे स्वीकार करलूँ ?
शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते जानन् कस्माच्छृणोम्यहम् ।
मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥२६०॥
ब्रह्म और आत्मा की एकता रूपी तत्व का ज्ञान जिन्हें
नहीं हो पाया है, वे लोग श्रवण करें [ उनके लिये तो श्रवण
करना ठीक है ] परन्तु उस तत्व को जान लेने वाला मैं भला
अब श्रवण क्यों करूँ ? तत्व ऐसा है या वैसा है ऐसा संशय
जिन लोगों को होता हो वे लोग मनन करें । परन्तु संशय से
रहित मैं भला अब मनन भी क्यों करूँ ?
विपर्यस्तो निदिध्यासेत् किं ध्यानमविपर्ययात् ।
देहात्मत्वविपर्यास न कदाचिद् भजाम्यहम् ॥२६१॥
जिसको विपर्यय हो रहा है, वह निदिध्यासन करे। जब
किसी को विपर्यय ही न हो तब फिर ध्यान ही कैसा ? मुझे
तो देहात्मता रूपी विपर्यास अब कभी होता ही नहीं है [फिर
मैं ध्यान भी क्यों करूँ ?]
अहं मनुष्य इत्यादि व्यवहारो विनाप्यमुम् ।
विपर्यास चिरान्भ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥२६२॥
यह विपर्यास जब नहीं रहता, तब भी अनादि काल से
अभ्यस्त वासनाओं के प्रभाव से ही 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा
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व्यवहार चलता रह सकता है। [अनादिकाल की वासनायें
ज्ञानी से भी 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा कहला देती हैं]
प्रारब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते ।
कर्माक्षये त्वसौ नैव शाम्येद् ध्यानसहस्रतः ॥२६३॥
प्रारब्ध कर्म के क्षीण हो जाने पर, व्यवहार भी (स्वयमेव)
शान्त हो जाता है, ध्यान रक्खो कि जब तक कर्म क्षीण नहीं
हो जाते, तब तक तो हज़ारों ध्यानों से भी यह व्यवहार
निवृत्त नहीं हो सकता ।
ऐसी अवस्था में व्यवहार को जबरदस्ती बन्द करने का वहम
झूठा वहम है। ज़बरदस्ती कर्मसन्यास का जो मार्ग है वह कल्याण
कारी नहीं है। एक जगह औषधप्रयोग से दबाया हुआ फोड़ा जैसे
दूसरी जगह फूट निकलता है, इसी प्रकार व्यवहार को ज़बरदस्ती
बन्द करने से या तो बाहर का बाज़ार अन्दर मन में जा लगता
है, या यह होता है कि एक जगह का व्यवहार बन्द करते ही,
व्यवहार का जो अनादि अभ्यास है, उससे दूसरी जगह दूसरी
तरह का व्यवहार होने लग पड़ता है। व्यवहार को ज़बरदस्ती
बन्द करने के इसी वहम से प्रभावित हुए पुरुष, स्त्री पुत्रों के या
घर के व्यवहार को छोड़कर महन्ती में या अन्य के प्रबन्धों में
फँसे पाये जाते हैं। देशान्तरवास का [कालेपानी का] दण्ड जिन
को राजा देता है उनका इस देश का व्यवहार तो बन्द हो
जाता है, परन्तु वे वहां जाकर नये सम्बन्ध बना ही लेते हैं।
यों व्यवहार ज़बरदस्ती बन्द करने की चीज़ नहीं है । व्यव-
हार छूटता है छोड़ा नहीं जाता। यह तो यमनियमों का अभ्यास
करते-करते स्वभाव से स्वयमेव छूटना चाहिये। पका हुआ
खरबूजा जैसे स्वयमेव डण्ठल से अलग हो जाता है, या जैसे पक
जाने पर गर्भ माता की नाभि के बन्धन से टूट कर बाहर आ
जाता है, इसी प्रकार यह व्यवहारत्याग भी अत्यन्त स्वाभाविक
रूप में होना चाहिये। व्यवहार के रुकने के लिये कर्मों के क्षीण
होने की बाट बड़े धैर्य से देखनी चाहिये। जैसे छोड़ा हुआ बाण
ध्यान करने से बीच में नहीं रुक जाता, इसी प्रकार प्रारब्ध जब
तक समाप्त नहीं हो लेता तब तक व्यवहार किसी के भी रोके
रुक नहीं सकता।
विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टं चेद् ध्यानमस्तु ते।
अबाधिकां व्यवहृतिं पश्यन् ध्यायाम्यहं कुतः ॥२६४॥
व्यवहार को विरल (कम) करने के लिये यदि तुझे ध्यान
करना पसन्द आता है तो तू ध्यान किया कर। परन्तु
मुझे तो अब यह व्यवहार बाधक ही नहीं दीखता है।
फिर मैं ध्यान के बखेड़े में क्यों पहूं ?
जब कि 'तज्जलान्' इस न्याय से सभी कुछ ब्रह्मतत्व है, तो इस
व्यवहार को भी ब्रह्मरूप में ही देखना चाहिये। आँखें बन्द करके
केवल एकान्त में बैठकर ही ब्रह्मतत्व का ध्यान करना तो ऐसा ही
है जैसे किसी बालक को एक कोठरी में बैठाकर दिशा बतायी गई
हों और फिर जब कहीं बाहिर उससे दिशा बूझी जाय कि इधर
कौनसी दिशा है ? और वह यह कहने लगे कि चलो कोठरी में
चलकर बताऊंगा। यहां तो मुझे मालूम नहीं है। ठीक इसी प्रकार
केवल ध्यानमुद्रा में बैठकर ही ब्रह्मतत्व को समझना और व्यवहार
में इस तत्व को भूल जाना—व्यवहार में इस तत्व को लागू न
करना—भी ऐसा ही अधूरा ज्ञान है। जो ज्ञान व्यवहार में न
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आ सके, व्यवहार की जरा सी ठोकर भी जिस ज्ञान से न
सहारी जाय, जो ज्ञान व्यवहारभीरु बनादे, वह ज्ञान ज्ञान
ही नहीं है। जिस ज्ञान के छोटे से कल्पित कोने में अनन्त
ब्रह्माण्ड भरे पड़े हैं, वही ज्ञान यदि व्यवहार के आ पड़ने पर
भाग खड़ा होता हो, तो उस ज्ञान को सच्चा ज्ञान मत समझो।
वह तो तोते के राम राम की तरह निर्वीर्य ज्ञान है। उस पर
मुक्ति रूपी फल कदापि लगने वाला नहीं है।
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥२६५॥
मुझ को तो विक्षेप ही नहीं होता है, इसी से मुझे समाधि
की भी आवश्यकता नहीं है। विक्षेप और समाधि ये दोनों तो
विकारशील मन के ही धर्म हैं। [इन्द्रियों को रोककर ही दीखने
वाला आत्मा सच्चा आत्मा नहीं है। इन्द्रियों को रोककर चित्त-
वृत्ति को बन्द करके पाई हुई अवस्था तो योगवालों की समाधि
है। वेदान्त की समाधि तो यह है कि आत्मा और ब्रह्मतत्व
को एक समझा जाय और फिर अखण्ड ब्रह्मरूप होकर बैठा
जाय, हरएक क्रिया, हरएक व्यवहार, हरएक पदार्थ, हरएक प्राणी
ब्रह्मरूप दीखें यह तो—यही सहज समाधि है। यह करनी
नहीं पड़ती यह तो स्वभाव से होती है।]
नित्यानुभवरूपस्य को मे वानुभवः पृथक् ।
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येवनि श्चयः ॥२६६॥
जो मैं नित्यानुभव स्वरूप हूँ, उस मुझ को मुझ से पृथक्
अनुभव भी क्या होगा ? [इसी से मैं समाधि के फल कहाने
वाले अनुभव के सम्पादन का उद्योग भी अब नहीं करता हूँ]