पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०३
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तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०३
वह न तो अपने आपको ही जानता है और न दूसरे को ही
पहचान पाता है। कारण शरीर में पहुँच जाने पर तो यह
[अज्ञान के कारण] विनष्ट सा ही हो जाता है, यही अवस्था
अगले दिनों में आने वाले दुःखों का कारण भी होती है।
एते ज्वराः शरीरेषु त्रिषु स्वाभाविका मताः ।
वियोगे तु ज्वरैस्तानि शरीराण्येव नासते ॥२२७॥
तीनों शरीरों में प्रतीत होने वाले ये ज्वर शरीरों के साथ
ही साथ लगे हुए हैं। ये तो उनमें स्वभाव से ही रहते हैं। इन्हें
कोई उनमें से हटा नहीं सकता। स्थूल शरीर रोगी न हों, काम
क्रोधादि मन में उत्पन्न न हों, अज्ञान में दुःख रूपी भेड़िये
छिपे न बैठे हों, यह कभी होना ही नहीं है। क्योंकि इन ज्वरों
का जब इन शरीरों से वियोग हो जाता है तब तो फिर ये शरीर
ही नहीं रहने पाते [इसी से कहते हैं कि ये तो स्वाभाविक हैं]
तन्तौर्वियुज्येत पटो वालेभ्यः कम्बलो यथा ।
मृदो घटस्तथा देहो ज्वरेभ्योऽपीति दृश्यताम् ॥२२८॥
तन्तु से यदि वस्त्र वियुक्त हो सकता हो, बालों से यदि
कम्बल को पृथक् किया जा सकता हो, मिट्टी से यदि घट को
अलग करना सम्भव हो तो यह भी हो सकता है कि ज्वरों से
देह को बचाया जा सके [ये शरीर तो विपत्ति के वृक्ष हैं] ।
चिदाभासे स्वतः कोऽपि ज्वरो नास्ति, यतश्चितः ।
प्रकाशैकस्वभावत्वमेव दृष्टं न चेतरत् ॥२२९॥
चिदाभास को स्वयं तो कोई भी ज्वर नहीं होता [उसको
तो शरीरों के सम्बन्ध के कारण ही ज्वर होते हैं]। विद्वान्
साधक जब समाधिभावना में बैठ कर देखते हैं, तब वे चित्
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को केवल प्रकाश स्वभाव वाला ही पाते हैं। [यह चिदाभास
उस चित् का ही प्रतिबिम्ब है इस कारण उसमें भी कोई ज्वर
नहीं होता]।
चिदाभासेऽप्यसंभाव्या ज्वराः, साक्षिणि का कथा।
एवमप्येकतां मेने चिदाभासो ह्यविद्यया ॥२३०॥
यों जब कि चिदाभास में भी ज्वरों का होना असंभव है
तब फिर साक्षी में ज्वर नहीं होते, इसका तो कहना ही क्या ?
वस्तुस्थिति तो यही है फिर इस चिदाभास ने अपनी अविद्या
[बेसमझी] के कारण [उन शरीरों से] अपनी एकता मान ली
है [और यह अब अपने आपको ही सन्तापशील मान
बैठा है]।
साक्षिसत्यत्वमध्यक्ष्य स्वेनोपेते वपुस्त्रये।
तत्सर्वं वास्तवं स्वस्य स्वरूपमिति मन्यते ॥२३१॥
[एकता मानने की रीति तो यह है कि] उस चिदाभास ने,
अपने से युक्त इन तीनों शरीरों में, साक्षी की सत्यता का
अध्यास किया और फिर पीछे से ज्वरों से जलते हुए उन तीनों
शरीरों को ही, अपना सच्चा रूप समझ लिया। [मानों कोई
दहकती हुई भट्टी में घुस कर उस भट्टी को ही अपना आपा
मान बैठा हो और अन्दर बैठा बैठा जल रहा हो।]
एतस्मिन् भ्रान्तिकारेऽयं शरीरेषु ज्वरत्स्वथ।
स्वयमेव ज्वरामीति मन्यते हि कुटुम्बिवत् ॥२३२॥
इस भ्रान्ति के रहते रहते जब इस चिदाभास के किसी
शरीर को कोई ज्वर होजाता है तब यह कुटुम्बी पुरुष की तरह
अपने आपको ही ज्वरशील मान बैठता है।