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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् १८७

चित्रदीपप्रकरणम् १८७
काश में विवेक नहीं किया करते, इसी प्रकार आपातदर्शी
[ अथवा स्थूल विचारक ] लोग ब्रह्म और ईश्वर को एक ही
समझ बैठते हैं। [ इन दोनों के भेद को वे नहीं जानते ] ।
उपक्रमादिभिर्लिङ्गै स्तात्पर्यस्य विचारणात् ।
असङ्गं ब्रह्म, मायावी सृजत्येष महेश्वरः ॥१९५॥
उपक्रमोपसंहारा वभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं
तात्पर्यनिर्णये । इन उपक्रम आदि छः लिंगों से जब श्रुति के
तात्पर्य का विचार किया जाता है, तब यह ज्ञात होता है कि
ब्रह्म तो असंग ही है [ यह कुछ भी करता धरता नहीं है ] इस
जगत् का सर्जन तो यह मायावी महेश्वर ही किया करता है ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं चेत्युपक्रम्योपसंहृतम् ।
यतो वाचो निवर्तन्त इत्यसङ्गत्वनिर्णयः ॥१९६॥
'सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह्म' (तै. २-१) यों इस वाक्य से प्रारम्भ
करके 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' (तै. २-४) यहाँ
तक के सन्दर्भ से ब्रह्म की असंगता का निर्णय किया गया है।
[ फिर उस असंग ब्रह्म से जगत् का सर्जन कैसे हो सकेगा ] ?
मायी सृजति विश्वं संनिरुद्धस्तत्र मायया ।
अन्य इत्यपरा ब्रूते श्रुतिस्तेनेश्वरः सृजेत् ॥१९७॥
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः (श्वे.
४-९) इस दूसरी श्रुति ने तो स्पष्ट ही कहा है कि मायी तो
इस जगत् को बनाता है, परन्तु दूसरा बिचारा जीव, माया के
बस इस में क़ैद हो गया है। इस श्रुति से सिद्ध होता है कि
ईश्वर ही इस जगत् का स्रष्टा है ब्रह्म नहीं है [ तथा जीव इस
जगत् में बँध गया है ।]

१८८ पञ्चदशी
आनन्दमय ईशोऽयं बहु स्यामित्यवैक्षत ।
हिरण्यगर्भरूपोऽभूत् सुप्तिः स्वप्नो यथा भवेत् ॥१९८॥
[आनन्दमय ईश्वर ही जगत् का कारण है यह सिद्ध हो
चुका । उससे जगत् की उत्पत्ति कैसे होती है वह रीति अब
बतायी जाती है] गाढ निद्रा का ही जैसे [पिछली रात में]
स्वप्न हो जाता है, इसी प्रकार इस आनन्दमय ईश्वर ने पड़े पड़े
यह विचार किया कि 'अब मैं बहुरूप हो जाऊँ'। इस विचार के
करते ही बस वह हिरण्यगर्भरूप हो गया। मानो सुषुप्ति का
ही सपना बन गया ।
क्रमेण युगपद्वैषा सृष्टिर्ज्ञेया यथाश्रुति ।
द्विविधश्रुतिसद्भावाद् द्विविधस्वप्नदर्शनात् ॥१९९॥
श्रुति के कथनानुसार क्रम से अथवा एक साथ ही यह सृष्टि
उत्पन्न होगयी, यह जान लेना चाहिये। क्योंकि दोनों ही प्रकार
की श्रुतियें विद्यमान हैं, तथा दोनों ही प्रकार के स्वप्न भी देखे
जाते हैं। [तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः (तै. २-१) इत्यादि
श्रुति में क्रमोत्पन्न सृष्टि का वर्णन है । इदं सर्वमसृजत (बृह. १-
२-५) इत्यादियों में युगपत् सृष्टि का वर्णन आता है । श्रुत्यनु-
कूल होने से दोनों ही बातें माननीय हैं। लोक में भी दो तरह
के स्वप्न देखे जाते हैं—किसी स्वप्न में तो क्रम से पदार्थ उत्पन्न
होते हैं, तथा किसी में सब के सब पदार्थ एक साथ उत्पन्न हो
पड़ते हैं] ।
सूत्रात्मा सूक्ष्मदेहाख्यः सर्वजीवघनात्मकः ।
सर्वाहंमानधारित्वात् क्रियाज्ञानादिशक्तिमान् ॥२००॥