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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् १४१

चित्रदीपप्रकरणम् १४१
तत्तेदन्ते अपि स्वत्वमिव त्वमहमादिषु ।
सर्वत्रानुगते तेन तयोरप्यात्मतेति चेत् ॥४७॥
ते आत्मत्वेऽप्यनुगते तत्तदन्ते ततस्तयोः ।
आत्मत्वं नैव संभाव्यं सम्यक्त्वादेर्यथा तथा ॥४८॥
शंका होती है कि—यदि स्वपन और आत्मा एक ही पदार्थ
हैं तो यह बताओ कि—त्वम् [तू] अहम् [मैं] आदि में
सर्वत्र रहने वाले स्वपन को जैसे तुम आत्मा मानते हो इसी
प्रकार सर्वत्र अनुगत तत्ता और इदन्ता [वह और यहपने] को
भी तुम आत्मा क्यों नहीं मान लेते हो ?॥४७॥ इसका समा-
धान—वे तत्ता और इदन्ता तो आत्मत्व रूपी जाति में भी
रहते हैं। यों आत्मा में तथा आत्मा से अन्यत्र भी रहने के
कारण इन को ठीक इसी प्रकार आत्मरूप नहीं माना जा सकता
जैसे कि सम्यक्पन आदि को आत्मा नहीं मानते हैं। ['आत्मत्व
सम्यक् है' 'आत्मत्व असम्यक् है' इस व्यवहार के प्रताप से
आत्मत्व में भी अनुवृत्त हुए हुए सम्यक्त्व और असम्यक्त्व
को जैसे कोई आत्मा नहीं मानता, इसी प्रकार आत्मा में रहने
वाली इन तत्ता और इदन्ता को आत्मा नहीं मान सकते हैं]
तत्तेदन्ते स्वतान्यत्वे त्वन्ताहन्ते परस्परम् ।
प्रतिद्वन्द्वितया लोके प्रसिद्धे नास्ति संशयः ॥४९॥
तत्ता और इदन्ता [वह और यह] स्वत्व तथा अन्यत्व
[खुद और दूसरा] त्वन्ता और अहन्ता [तू और मैं] ये परस्पर
प्रतिद्वन्द्वी [विरोधी] रूप से प्रसिद्ध हैं। इन में तो कोई संशय
ही नहीं है।

१४२ पञ्चदशी
अन्यतायाः प्रतिद्वन्द्वी स्वयं कूटस्थ इष्यताम् ।
त्वन्तायाः प्रतियोग्येपोऽहमित्यात्मनि कल्पितः ॥५०॥
अन्यता [दूसरेपन] का प्रतिद्वन्द्वी [प्रतियोगी] जो स्वयं
[खुदपन] है उस को तो कूटस्थ मानना चाहिये । त्वन्ता का
प्रतियोगी जो कि अहम् है [जिस को चिदाभास कहा जाता है]
वह तो कूटस्थ आत्मा में कल्पित कर लिया हुआ है ।
अहन्तास्वत्वयोर्भेदे रूप्यतेदन्तयोरिव ।
स्पष्टेऽपि मोहमापन्ना एकत्वं प्रतिपेदिरे ॥५१॥
रूप्यता और इदन्ता में जिस तरह का भेद है, उसी तरह
का भेद अहन्ता और स्वत्व में भी स्पष्ट ही है, तो भी भ्रान्त
लोगों ने इन्हें एक ही मान लिया है। [तात्पर्य यह है कि जीव
और कूटस्थ का भेद होने पर भी, सब किसी को इस बात का
ज्ञान न होने का कारण तो यह है कि बुद्धि का साक्षी जो
कूटस्थ है उसका प्रत्यक्ष बुद्धि से नहीं हो सकता, इस कारण
'अहं' इस शब्द से जोकि जीव और कूटस्थ दोनों प्रतीत हो
रहे हैं उन दोनों को भ्रान्ति से एक मान लिया गया है।]
तादात्म्याध्यास एवात्र पूर्वोक्ताविद्यया कृतः ।
अविद्यायां निवृत्तायां तत्कार्यं विनिवर्तते ॥५२॥
[जीव और कूटस्थ की एकता का जो भ्रम हो गया है अब
उस का कारण बताया जाता है] 'अनादिरविवेकोऽयम्' इस २५ वें
श्लोक में जिस अविद्या का कथन किया है, उस अविद्या ने ही
तादात्म्याध्यास [एकत्व का भ्रम] कर रक्खा है। यह अविद्या
जब निवृत्त हो जाती है तब अविद्या का