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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages
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अज्ञस्तु कामलोभान्धो यथा मार्गप्रदर्शिभिः।
नीत्वा श्वभ्रेषु निक्षिप्य मुष्यते धूर्तभेटकैः ॥२०२॥
नैवावकाशं लभते राज्ञस्तस्यान्तिके परः।
धूर्तेर्निवद्धवाटस्य घालेरिव कृपीवरुः ॥२०३॥
अन्तर्भूय रहस्येषु तैर्वशीक्रियते हि सः।
तत्र धीरविशेषज्ञात् बिभ्रा तस्मात् पलायते ॥२०४॥
तस्माज्जितात्मा राजा स्याद्युक्तदण्डो विशेषवित्।
प्रजानुरागादेव हि स भवेद् भाजनं श्रियः ॥२०५॥

शूरसेननृपतेः तन्मन्त्रिणाम्च कथा
पूर्वं च शूरसेनाख्यो मृत्तकप्रत्ययो नृपः।
सचिवैः पेटकं कृत्वा भुज्यते स्म वशीकृतः ॥२०६॥
यस्तस्य सेवको राज्ञस्तस्मै तन्मन्त्रिणोऽत्र ते।
दातुं नैच्छंस्तृणमपि दित्सत्यपि च भूपतौ ॥२०७॥
तेषां तु सेवको योऽत्र बभूवस्तस्मै स्वयं च ते।
ते च विज्ञप्य राजानमनर्हायाप्यदापयन् ॥२०८॥
तद्दृष्ट्वा स नृपः बुद्ध्या शनैस्तद्धूर्तपेटकम्।
अन्योन्यं प्रज्ञया युक्त्या सचिवास्तानभेदयत् ॥२०९॥
भिन्नेषु तेषु नष्टेषु मिथः पैशुन्यकारिषु।
सम्यक्शशास राज्यं तत्स राजाऽथैरवञ्चितः ॥२१०॥
हरिसिंहश्च राजामूत्सामान्यो नीतितत्त्ववित्।
कृतभक्त्युपसामात्यः सदुर्गः सार्थसञ्चयः ॥२११॥
अनुरक्ताः प्रजाः कृत्वा चेष्टते स्म यथा तथा।
चक्रवर्त्यभियुक्तोऽपि न जगाम पराभवम् ॥२१२॥
एष विचार्यचिन्ता च सारं राज्येऽधिकं नु किम्।
इत्याद्युक्त्वा यथास्वं ते विरेमुर्गोमुखादयः ॥२१३॥
नरवाहनदत्तश्च तेषां श्रद्धाय तद्वचः।
चिन्त्ये पुरुषारम्भेऽप्यचिन्त्यं दैवमभ्यधात् ॥२१४॥


१ आसन्नवृक्षमुर्गुरारभ्य इत्यभिधीयते। —कामन्दके।

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मूर्ख सामान्य और लोभी राजा झूठे और अनुचित माप प्रदर्शित करनेवाले धूर्ती और
ठगों द्वारा गड्ढे में गिरा-गिराकर भ्रष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार के स्वार्थयों से
घिरे हुए मूर्ख राजा के पास बुद्धिमान् और श्रेष्ठ व्यक्ति उसी प्रकार नहीं जा सकते जिस
प्रकार निपुण किसान द्वारा लगाई गई बाड़ को पारकर धान के खेत तक नहीं पहुँचा जा
सकता ॥२ २-३ ॥।

ऐसा राजा धूर्तों का अन्तरङ्ग बन जाता है और अपना रहस्य प्रकट कर बैठता है। फलतः,
वह उनके वश में हो जाता है। और, ऐसे मूर्ख जनभिन्न राजा से खिन्न होकर राज्यलक्ष्मी भाग
जाती है ॥२ ४॥

इसलिए राजा को आत्मविजयी, उचित दंड देनेवाला और राजनीति आदि में विशेषज्ञ
होना चाहिए। ऐसा होने पर प्रजा के प्रेम से वह राजा लक्ष्मी का निवास-स्थान का पात्र बन
पाता है ॥२ ५॥

राजा शूरसेन और उसके मन्त्रियों की कथा

प्राचीन समय में शूरसेन नाम का एक राजा था जो एकमात्र सेवको पर विश्वास किया
करता था। वे सेवक एक दल बनाकर राजा को वश में करके उसे चूमा करते थे ॥२ ६॥

जिस योग्य सेवक को राजा कुछ देना भी चाहता था मन्त्रिगण उस एक तिनका भी नहीं
देन देते और जो उनके निजी चापलूस नौकर थे उन्हें वे स्वयं भी देत और राजा द्वारा भी
दिलाते थे ॥२ ७-८ ॥

यह सब देखकर और उन धूर्तों के दल को समझकर राजा ने अपनी बुद्धि से उनमे परस्पर
फूट उत्पन्न करा दी ॥२ ९॥

फूट के कारण उन चुगलखोर सेवकों के पृथक हो जाने पर अन्य अच्छे और सुधी व्यक्तियों
से युक्त वह राजा भली भाँति शासन करने लगा ॥२१० ॥

हरिदत्त नाम का एक नीतिज्ञ और साधारण राजा था उसने अपने महल मन्त्री
रखे थे। सुदृढ वित्त और बल का संग्रह भी पर्याप्त किया था। वह प्रजा को अपने प्रति अनुरक्त
करके जैसा चाहता था वैसा करता था। इसी कारण वह एक चक्रवर्ती राजा के आक्रमण करने
पर भी पराजित न हो सका ॥२११ २१२॥

इसलिए विचार और चिन्तन के अतिरिक्त राज्य का सार और क्या हो सकता है?
इतना कहकर अपनी-अपनी सम्मति देकर गोमुख आदि मन्त्री चुप हो गये ॥२१३॥

नरवाहनदत्त ने उनके विचारो पर श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा— पुरुष का कर्तृव्य
चिन्तनीय होने पर भी दैवगति अचिन्तनीय है ॥२१४॥

८६ कथासरित्सागर

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८६ कथासरित्सागर
ततश्चोत्थाय तत्रैव क्षात्रं तां प्रेक्षितुं ययौ।
स विरम्बकृतोत्कण्ठां प्रियां मदनमञ्जुकाम् ॥२१५॥
प्राप्ते तन्मन्दिरे तस्मिन्नामनस्ये कृतादृशः।
क्षण स्फुरितनेनाय गोमुख विस्मिताब्रवीत् ॥२१६॥
नरवाहनदत्तंश्च राजसूतामनागते।
उत्सुका पदवीमस्य द्रष्टु मदनमञ्जुषा ॥२१७॥
हर्म्याग्रभूमिमारूढा गोमुखानुगता मया।
यावत्तावत्पुमानेको नभसोऽत्रावतीर्णवान् ॥२१८॥
स किरीटी च खड्गी च मां दिव्याकृतिरब्रवीत्।
अह मानसवेगाख्यो राजा विद्याधरेश्वरः ॥२१९॥
स्वस्त्री सुरभिदत्ताख्या स्व च शापच्युता भुवि।
सुता च सव दिव्ययमेतन्न विन्त्रि किम ॥२२०॥
तदहि म सुतामेतां मच्चम्व गच्छतो ह्ययम्।
इत्युक्त तन् रहमा विहस्याहं समग्रवम् ॥२२१॥
नरवाहनदत्तोऽस्या भर्त्ता दवनिर्मितः।
सर्वेषां यत्र युष्माकं चक्रवर्ती भविष्यति ॥२२२॥
इत्युक्तः स मयात्याज्य ख्याम् विद्याधरो गतः।
मन्दुर्नीनयनादेवकाराण्डवितुन्नतोषम ॥२२३॥
गच्छन्त्या गोमगा रात्रौप्रत्नान्नग्गिमस्वामिनोह न ।
शत्रपुत्रेन्नग्णिासन्नुदुष्यामु भाविनं प्रभुम् ॥२२४॥
पातं विधातुमप्येष्यन्तमद्य विद्याधरा रिताः।
उक्त्वाऽतो निधनार्थं च वञ्चयत्विनं प्रभुम् ॥२२५॥
गत्वाच रक्षितं पालाद् गतानाञ्च शम्भना।
मार्गावारयिष नातमाप्यमाना श्श मया ॥२२६॥
अद्य विद्याधराः सन्त्र्यवरप्रसाद विशाधिनः।
श्श्या कश्चित्त्गनेनात् गधुष्यान्मभियाडवीर्र ॥२२७॥
भाजना सहि नो यावन् मद्धर्म्मसमन्चता।
सच्दा गन्तुश श्कि स चास्तु विशाद्यते॥ २२८॥
ल्लान्तारूगवातं गत्वा तां शापशान्ये।
उपत्यन्तेव शौण्डिभ्यन् गत्वा प्रदेशामिति ॥ २२९॥

षष्ठ लम्बक ८७

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षष्ठ लम्बक ८७
तब नरवाहनदत्त अपने उन साथियों के साथ चिरकाल से उत्कण्ठित प्रिया मदनमंचुका
को देखने के लिए गया ॥२१५॥
उसके निवास-स्थान पर पहुँचते ही आसन पर बैठकर स्वागत-सत्कार करती हुई
विस्मित कलिङ्गसेना गोमुख से कहने लगी—॥२१६॥
'गोमुख राजकुमार नरवाहनदत्त के यहाँ न आने पर, अर्थात् उनके आने से पूर्व उनके
आने की प्रतीक्षा में उत्कण्ठिता मदनमंचुका भवन के ऊपर की छत पर चढ़ी और उसके पीछे
मैं भी गई। इतने में ही एक दिव्य मुकुटधारी पुरुष आकाश से उतरा ॥२१७-२१८॥
उसके हाथ में तलवार थी और सिर पर किरीट था। उस दिव्य पुरुष ने मुझसे कहा—
'मैं मानसवेग नामक विद्याधरों का राजा हूँ ॥२१९॥
तू शाप से पतित सुरभिला नाम की स्वर्गीय स्त्री है। तुम्हारी कन्या भी दिव्य
स्त्री है। यह मुझे ज्ञात है ॥२२० ॥
इसलिए तू इस कन्या को मुझे दे दे। उसका और मेरा यह सम्बन्ध योग्य है। उसके
इस प्रकार कहने पर मैंने हँसकर कहा—॥२२१॥
देवताओं द्वारा पहले से ही निश्चित किया गया नरवाहनदत्त इसका पति हो चुका है।
वह तुम सब विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥२२२॥
मेरी कन्या को ले जाने के लिए आरम्भित उसकी बिजली के समान मुझसे इस प्रकार
कहकर वह विद्याधर आकाश में उड़ गया ॥२२३॥
यह सुनकर गोमुख बोला— हमारा यह राजकुमार नरवाहनदत्त जब उत्पन्न हुआ था
तभी आकाशवाणी ने सूचना दी थी कि वह विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा। इसलिए उसे
अपना भावी राजा समझकर विद्याधरगण उसे नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु कोई
भी दुष्ट बलवान् विधि के विधान के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता। भगवान् शंकर ने उसकी रक्षा
के लिए गण को नियुक्त किया है ऐसा नारद मुनि ने यह पिता से कहा है और उनसे मैंने
सुना है ॥२२४-२२६॥
इसीलिए ये विद्याधर इस समय हमारे विरोधी बने हुए हैं। इतना कहकर कलिङ्गसेना
अपने रोते हुए दामाद के रूप में बातें — दर्प भले ही समाप्त मदनमंचुका सहित नहीं की उन्होंने
या हँसी नहीं जाती है गोमुख ही समझदार उपाय कर उसने विचार कर कार्य नष्ट कर दिया
गया ॥२२७-२२८॥
कलिङ्गसेना की बातें सुनकर दामाद आदि कहने लगे कि इस कार्य के लिए शीघ्र ही वासवदत्त
को सूचित करो ॥ ॥

८८ कथासरित्सागर

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८८ कथासरित्सागर
ततस्तद्विगतभीस्तस्मिन्नुद्याने व्यहरद्दिनम्।
नरवाहनदत्तस्तां पश्यन् मदनमञ्जुकाम् ॥२३०॥
उत्फुल्लपद्मवदनां दलत्कुवलयेक्षणाम्।
बन्धूककमनीयोष्ठीं मन्दारस्तबकस्तनीम् ॥२३१॥
शिरीष सुकुमाराङ्गीं पञ्चपुष्पमयीमिव।
एकामेव जगज्जैत्रीं स्मरेण विहितामिषुम् ॥२३२॥
कलिङ्गसेनाऽप्यन्येद्युर्गत्वा वत्सेश्वरं स्वयं।
सुताविवाहहेतोस्तद्यथामीष्टं व्यजिज्ञपत् ॥२३३॥
वत्सेशोऽपि विमृश्यैतामाहूय निजमन्त्रिणः।
देव्यां वासवदत्तायां स्थितायां निजगाद तान् ॥२३४॥
कलिङ्गसेना त्वरते सुतोद्वाहाय तत्कथम्।
कुर्मो यद्वचकीत्येतां लोको वक्ष्यत्यसामिति ॥२३५॥
लोकोऽथ सर्वदा रक्ष्यस्तत्रावेहि किं पुरा।
रामभद्रेण शुद्धापि त्यक्ता देवी न जानकी ॥२३६॥
अम्बा हृतापि भीष्मेण बलाद् भ्रातुः कृते तथा।
प्रतीपं किं न वा रक्ष्यं वृत्तपूर्वैरन्यभर्तृका ॥२३७॥
एवं कलिङ्गसेनषा स्वयंवरवृते मयि।
व्यूढा मदनवेगेन तेनैतां गर्हते जनः ॥२३८॥
अतोऽस्यास्तनयामेतां गान्धर्वेविधिना स्वयम्।
नरवाहनदत्तोऽसावुद्वहत्वनुरूपिकाम् ॥२३९॥
इत्युक्ते वत्सराजन स्माह यौगन्धरायणः।
इच्छेत्कलिङ्गसेनेतःनौचित्यं न च प्रभो! ॥२४०॥
न्ध्येषा हि न सामान्या गन्तुसेत्यगङ्गोद्गतम्।
मित्रण चैतदुक्तं मे ज्ञानिना ब्रह्मराक्षसा ॥२४१॥
इत्यादि तत्र ते यावद् विमृशन्ति परस्परम्।
एवं माहेश्वरी वाणी तावत् प्रादुरभूद् दिवः ॥२४२॥
मत्रेवानल्दग्यस्य सृष्ट्म्यात्र मनोभुवः।
नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा विनिर्मिता ॥२४३॥
तपस्तुष्टेन भार्यास्य रतिर्मदनमञ्जुका।
एतया मद्विशिष्यार्थं मर्वान्तिपुरमृध्यता। ॥२४४॥
विद्याधरगणिपत्यं श दिव्यं वन्यं करिष्यति।
मत्प्रसादाद् विजिक्ष्यागीतियुक्त्वा विरराम खात् ॥२४५॥

षष्ठ लम्बक ८१

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षष्ठ लम्बक ८१
तब नरवाहनदत्त उस दिन मन्दारगुच्छ के समान स्तनोंवाली शिरीष-सुमन के समान
मुखमण्डल विकसित कमल के समान मुखवाली और प्रफुल्ल कुमुदों के समान नेत्रोंवाली
दुपहरिया फूल की भाँति लाल होठों वाली मानों जगद्विजय के लिए निर्मित कामदेव के एक
बाण के समान उस मदनमञ्चुका के साथ उद्यान में विहार करता रहा ॥२३ २३२॥
दूसरे दिन कलिङ्गसेना ने भी स्वयं वत्सराज के पास जाकर अपना अभिलषित प्रस्ताव
निवेदित किया जो कन्या-विवाह के सम्बन्ध में था ॥२३३॥
वत्सराज ने भी कलिङ्गसेना को विदा करके अपने मन्त्रियों को बुलाकर रानी वासवदत्ता
की उपस्थिति में उनसे कहा—॥२३४॥
'कलिङ्गसेना कन्या के विवाह के लिए शीघ्रता कर रही है। अतः हम यह विवाह कैसे
करें क्योंकि उस साध्वी को भी लोग व्यभिचारिणी कहते हैं ॥२३५॥
जनापवाद से तो सदा बचना ही चाहिए। प्राचीनकाल में श्रीरामचन्द्रजी ने जनापवाद
के ही कारण क्या जानकी को नहीं त्याग दिया था ? ॥२३६॥
भीष्म ने अपने भाई के लिए अपहरण की गई पूर्व-विवाहित अम्बा को क्या नहीं छोड़
दिया था ? ॥२३७॥
इसी प्रकार कलिङ्गसेना स्वयंवर द्वारा मेरा वरण कर लेने पर भी मदनवेग से विवाहित
हुई। यही कारण है कि लोग इसकी निन्दा करते हैं ॥२३८॥
इसलिए नरवाहनदत्त अपने अनुकर इसकी कन्या को गान्धर्व-विधि से विवाहित
कर लेगा ॥२३९॥
वत्सराज के ऐसा कहने पर यौगन्धरायण ने कहा—'स्वामिन् ! यदि कलिङ्गसेना ऐसा
चाहती है तो यह अनुचित कैसे हो सकता है ? वह साधारण नहीं दिव्य स्त्री है। इसलिए इसकी
कन्या भी दिव्य है। यह बात मेरे मित्र ब्रह्मराक्षस ने मुझसे बार-बार कही है ॥२४ २४१॥
इस प्रकार जब वे परस्पर विचार कर ही रहे थे इतने ही में आकाश से दिव्यवाणी सुनाई
पड़ी —॥२४२॥
'मेरे नेत्रानल से दग्ध कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त के लिए मैंने ही कामदेव की भार्या
रति के तप से सन्तुष्ट होकर इस मदनमंचुका की सृष्टि की है। यह नरवाहनदत्त की प्रधान महिषी
होकर, मेरी कृपा से शत्रुओं को जीतकर दिव्य मलयपर्यन्त विद्याधरों की साम्राज्ञी बनी
रहेगी इतना कहकर दिव्यवाणी मौन हो गई ॥२४३ २४५॥
११

८१० कथासरित्सागर

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८१० कथासरित्सागर
नरवाहनदत्तस्य मदनमञ्‍चुकायाश्च विवाहः
श्रुत्वैतां भगवद्वाणीं वत्सेन सहपरिच्छदः।
सं प्रणम्य सुतोद्वाहे सानन्दो निश्चय व्यधात् ॥२४६॥
अथ स सचिवमुख्यै पूर्वविज्ञाततत्त्व
नरपतिरभिनन्द्याहूय मोहूर्त्तिकांश्च।
शुभफलदमपृच्छल्लग्नमूचुस्तु ते तं
कतिपयदिनमध्ये भावि प्राप्तपूजाः ॥२४७॥
कालं मनागनुभविष्यति कश्चिदत्र
पुत्रो वियोगमनया सह भार्यया च।
जानीमहे वयमि' निजशास्त्रदृष्ट्या
वत्सेश्वरेति जगदुर्गणका पुनस्ते ॥२४८॥
ततःससूनोर्निजवैभबोचितं विवाहसम्भारविधिं व्यधान्नृपः।
तथा यथास्य स्वपुरी म केवलं पृथिव्यपि क्षोभमगातदुद्यमात् ॥२४९॥
प्राप्ते विवाहदिवसेऽथ कलिङ्गसेना
पित्रा निसृष्टनिजदिव्यविभूषणायाः।
तस्याः प्रसाधनविधिं दुहितुश्चकार
सोमप्रभा पतिनिवेशवशागता च ॥२५०॥
कृतदिव्यकौतुका सा सुतरामेव मदनमञ्चुका व्यभौ।
मन्वेषमेव कान्ता चन्द्रतनुः कान्तिकानुगता ॥२५१॥
दिव्याङ्गनाश्च तस्या दूराच्च श्रूयमाणगीतरवाः।
तद्रूपजिताच्छम्भा ह्रीता इव गङ्गरुं विदधुः ॥२५२॥
भक्तानुकम्पिनि जयात्रिसुतं त्वयाद्य
रत्त्यास्तपः स्वयमुपेत्य कृतं कृतार्थम्।
इत्यावि दिव्यवरचारणवाद्यमिश्र--
वाक्सानुमेयमपि सन्दिदृशेऽत्र गौर्या ॥२५३॥
अथ नरवाहनदत्त प्रविवेश मदनमञ्चुकाध्युषितम्।
कृतवरकौतुकसोमी विविधमहातोद्यभूवृविवाहगृहम् ॥२५४॥
निर्वर्त्य तत्र बहुलोद्यतविप्रमत्तबीवाह मङ्गलविधिं च वधूबरी तौ।
वेदीं समारुरुहतुर्ज्वलिताग्निमुच्चै राज्ञो शिरोमणिमिवामलरत्नदीपाम् ॥२५५॥

षष्ठ लम्बक ८११

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षष्ठ लम्बक ८११
नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का विवाह
वत्सराज ने अपने साथियों-सहित इस प्रकार भगवद्वाणी को सुनकर उसे प्रणाम किया
और पुत्र के विवाह के लिए आनन्द के साथ निर्णय किया॥२४६॥
तदनन्तर वत्सराज ने सारी वास्तविक स्थिति को समझनेवाले मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण
का अभिनन्दन करके और ज्योतिषियों को बुलाकर शुभफल देनेवाला विवाह-लग्न पूछा और
समुचित दक्षिणा आदि से पुरस्कृत ज्योतिषियों ने कुछ ही दिनों में विवाह-लग्न निश्चित
कर दिया॥२४७॥
ज्योतिषियों ने कहा—'महाराज आपका यह पुत्र कुछ दिनों तक इस पत्नी के
वियोग का कष्ट झेलेगा यह हमलोग शास्त्र की दृष्टि से जानते हैं॥२४८॥
तदनन्तर राजा ने अपने वैभव के अनुसार पुत्र के विवाह की तैयारी आरम्भ की। उसकी
तैयारी के उद्योग से केवल कौशाम्बी नगरी में ही नहीं प्रत्युत सारी पृथ्वी में हलचल मच गई॥२४९॥
विवाह का दिन आने पर कन्या के पिता मदनवेग द्वारा दिये गये वस्त्र और अलंकारों से
माता कलिङ्गसेना ने और पति की आज्ञा से आई हुई कलिङ्गसेना की सखी सोमप्रभा ने कन्या
मदनमंचुका को विवाहोचित रूप में सुसज्जित कर दिया॥२५०॥
दिव्य सामग्री से अलंकृत मदनमंचुका इतनी सुन्दर लग रही थी जैसे कात्तिक मास
(शरदऋतु) में चन्द्रमा शोभित होता है॥२५१॥
शिवजी की आज्ञा से आयी हुई दिव्य स्त्रियाँ मदनमंचुका के रूप से पराजित होकर
अतएव लाज से छिपकर मानों मंगल-गान कर रही थीं॥२५२॥
भक्तों पर दया करनेवाली हे पार्वती ! तुम्हारी जय हो। तुमने आज स्वयं उपस्थित
होकर रति के तप को सफल किया'—इत्यादि वाक्यों से वे देवी की स्तुति करने लगीं और गन्धर्व
गण वाद्य-ध्वनि करने लगे॥२५३॥
वर के वेष में सुसज्जित अतएव शोभित नरवाहनदत्त वाद्यों की ध्वनि से मुखरित
और मदनमंचुका से अलंकृत विवाह-मंडप में प्रविष्ट हुआ॥२५४॥
बड़े-बड़े विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा विवाह-विधि को सम्पन्न करके वर और वधू राजा के
किरीट-स्थित निर्मल रत्नदीपों के समान देदीप्यमान अग्नि की प्रदक्षिणा के लिए वेदी के
निकट गये॥२५५॥

८१२ कथासरित्सागर

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८१२ कथासरित्सागर
यदि युगपदिहेन्दुमूर्तिमान् कनकगिरिं भ्रमतोऽभितः कदाचित् ।
भवति तदुपमा तयोस्तदानीं जगति वधूवरयोः प्रदक्षिणेऽग्नेः ॥२५६॥
यथा विवाहोत्सवतूल्यनादा
नपोधमन्दन्दुभयोऽन्तरिक्ष ।
तथा वधूत्सारितहोमलाजाः
सुरोज्झिताः कौसुमवृष्टयोऽत्र ॥२५७॥
सत कनकराशिभिर्मणिमयैश्च जामातर
समर्धयदुदारधीः किल शशिकूसेना तया।
यथात्र बुबुधे जनैरपि सुदुर्गंतोऽस्या पुरः
स काममलकापतिः कृपणभूभृताऽन्ये तु के ॥२५८॥
निष्पन्नावृद्यचिराभिमतस्यानुरूप—
पाणिग्रहोत्सवविधौ च वधूवरौ तौ।
अभ्यन्तरं विविशतुः प्रमदोपरुद्धं
लोकस्य मानसमिवामलचित्रमक्ति ॥२५९॥
सङ्वाहिनीपरिगतैरपि विश्ववन्द्य
शौर्याधितैरपि जितावनतैर्नरेन्द्रैः।
सा वारिराशिभिरिवाशु पुरी पुपूरे
वत्सेश्वरस्य सवुपायनरत्नहस्तैः ॥२६ ॥
अनुजीबिजनाय सोऽपि राजा व्यकिरद्धेम तथा महोत्सवेऽस्मिन् ।
यदि परमभवन्न जातरूपा जननीगर्भंगता यथास्य राष्ट्रे ॥२६१॥
वरचारणनर्तकीसमूहैर्विविधदिगन्तसमागतैस्तदात्र।
परितः स्तवनृत्तगीतवाद्यैर्बुबुधे तन्मय एव जीवलोकः ॥२६२॥
वातोद्धूतपताकाबाहुलसा नोरुखेऽत्र कौशाम्बी।
सापि ननर्तेव पुरी पौरस्त्रीरचितमण्डनाभरणा ॥२६३॥

षष्ठ लम्बक ८१५

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षष्ठ लम्बक ८१५
अग्नि-प्रदक्षिणा के समय वर और वधू की शोभा कुछ इस प्रकार थी कि यदि सूर्य और
चन्द्रमा दोनों एक साथ मिलकर सुमेरु पर्वत के चारों ओर भ्रमण करें, तो उस समय की शोभा
की उपमा दी जा सकती है ॥२५६॥
आकाश में विवाहोत्सव में बजनेवाले वाद्यों के शब्द गूंजने लगे और नगरी में वधू द्वारा
अग्नि में हवन किये गये धान के दानों का धुआं और देवताओं द्वारा बरसाये गये पुष्प फैल
गये ॥२५७॥
उदार चित्तवाली कलिङ्गसेना ने रत्नों मणियों और सुवर्ण की राशि से जामाता
नरवाहनदत्त को इस प्रकार सम्पन्न कर दिया जिससे प्रजा ने उसके आगे कुबेर को भी तुच्छ
समझा। अन्यान्य बेचारे राजाओं की तो गणना ही क्या ? ॥२५८॥
इस प्रकार चिरकाल से अभिलषित इस योग्य पाणिग्रहण-संस्कार के भली भांति सम्पन्न
हो जाने पर वे वर और वधू दोनों निर्मल लोक-हृदय में चित्रित मूर्ति के समान सुन्दरी रमणियों
से भरे हुए कौतुकागार में गये ॥२५९ ॥
इस अवसर पर कौशाम्बी नगरी विशाल वाहिनियों (सेना और नदियों) के पति
चिरवन्द्य वीरत्वाभिमानी पहले पराजित होने के कारण नम्र हुए और विविध प्रकार की बहुमूल्य
भेंटों को उपहार-स्वरूप हाथों में लिये हुए राजाओं से इस प्रकार भर गई थी मानों चारों ओर
रत्नाकर (समुद्र) ही लहरा रहा हो ॥२६० ॥
पुत्र-विवाह के इस अवसर पर वत्सराज उदयन ने प्रसन्नता के कारण इतना सोना
और धन वितरित किया कि केवल माताओं के गर्भ में स्थित कन्याएं ही अलंकार-हीन
रह गईं ॥२६१॥
इस अवसर पर भिन्न-भिन्न और दूर-दूर देशों से आई हुई वेश्याओं और नर्तकियों बन्दियों
और भाटों के गीतों और स्तुतियों से उस नगरी का समस्त वातावरण मानों संगीत और उत्सव
मय हो रहा था। नागरिक स्त्रियों द्वारा सजाई-संवारी गई अतएव अलंकार-युक्त एवं वायु
से आन्दोलित पताकाओं-रूपी हाथोंवाली कौशाम्बी नगरी नृत्य करती हुई लक्ष्मी के समान
लग रही थी ॥२६२-२६३॥

२१४ कथासरित्सागर

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२१४ कथासरित्सागर
एवं च स प्रतिदिनं परिवर्धमानो
निर्वर्त्यते स्म सुचिरेण महोत्सवोऽत्र।
सर्वः सदैव च सुहृत्स्वजनो जनश्च
हृष्टस्ततः किमपि पूर्णमनोरथाऽभूत् ॥२६४॥
स च नरवाहनदत्तो युवराजो मदनमञ्चुकासहितः।
भजते स्म सुचिरकांक्षितमुदयेऽपि जीवलोकसुखम् ॥२६५॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
मदनमञ्चुकालम्बकेऽष्टमस्तरङ्गः।
समाप्तश्चायं मदनमञ्चुकालम्बकः षष्ठः।

षष्ठ लम्बक ८१५

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षष्ठ लम्बक ८१५
इस नगरी के महोत्सव दिन प्रतिदन बढ़ने लगे और अनेक दिनों तक उत्सव निरन्तर
चलते रहने पर समाप्त हुए। सभी कुटुम्बी और मित्र परस्पर प्रेम और आनन्दपूर्वक रहने लगे
उनके मनोरथ सफल और पूर्ण हुए ॥२६४॥
विवाह के पश्चात् युवराज नरवाहनदत्त अभ्युदय की आशा रखता हुआ चिर अभि
लषित सांसारिक भोगों को मदनमञ्चुका के साथ आनन्दपूर्वक भोगने लगा ॥२६५॥
आठवाँ तरंग समाप्त
मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक भी समाप्त

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