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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

पंचम लम्बक ५६५

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पंचम लम्बक ५६५

तीसरी शशिरेखा है और चौथी शशिप्रभा है। हम चारों पिता के घर में बड़ी हुईं। एक
बार मुझसे छोटी वे तीनों बहिनें साथ ही गंगा-स्नान के लिए गईं॥५५-५६॥
वे तीनों यौवन-मद में मस्त होकर जलक्रीड़ा करती हुई उतथ्य नामक ऋषि को पानी
से सींचने लगीं॥५७॥
ऋषि के बार-बार मना करने पर भी जब बह न मानीं तब क्रुद्ध होकर उसने शाप दिया
कि 'तुम तीनों दुष्ट कन्याएँ मर्त्यलोक में उत्पन्न होओ'॥५८॥
इस शाप का समाचार सुनकर हमारे पिता ने ऋषि का अनुनय-विनय करके प्रसन्न
किया तो ऋषि उनके शाप का अन्त पृथक्-पृथक् रूप में किया किन्तु दिव्य ज्ञान से जुड़े हुए पूर्वजन्म
के स्मरण को मानव-जन्म में भी बने रहने का आदेश दिया॥५९-६०॥
तब उन तीनों के अपने-अपने विद्याधर-शरीर को छोड़कर मर्त्यलोक में चले जाने पर
मेरे पिता यह नगरी मुझे देकर वन को चले गये॥६१॥
तदनन्तर यहाँ रहती हुई मुझे स्वप्न में माता पार्वती ने यह आदेश दिया कि 'बेटी तेरा
पति मनुष्य होगा'॥६२॥
इसी कारण विद्याधर आदि के अनेक वीरों को छोड़कर मैं अभी तक कन्या ही रह
गई॥६३॥
इस समय तुम्हारे इस आश्चर्यमय जयमन्त्र ने और तुम्हारे सुन्दर शरीर ने मुझे अपने
वश में कर लिया। फलतः तुम्हारे इन सब आश्चर्यों ने ही मुझे अपने को तुम्हारे लिए अर्पण
करने को बाध्य कर दिया है॥६४॥
इसलिए आगामी चतुर्दशी के दिन तुम्हारे इस प्रसंग को पिता को सूचित करने मैं
ऋषभ नामक पर्वत पर जाऊँगी॥६५॥
वहाँ प्रतिवर्ष उस अवसर पर शिवपूजन के लिए मेला लगता है और सभी दिशाओं से
बड़े बड़े विद्याधर आते हैं॥६६॥
वहीं मेरे पिता भी आते हैं। अतः वहाँ जाकर उनसे आज्ञा लेकर मैं शीघ्र ही आती हूँ
तत्पश्चात् तुम मुझसे विवाह कर लो॥६७॥
तबतक यहाँ ठहरो—ऐसा कहकर उसने विद्याधरों के अनुरूप विविध उपचारों से
शक्तिदेव का स्वागत-सत्कार किया॥६८॥
वहाँ रहकर उन दिव्य भोगों का उपभोग करते हुए उसे ऐसा सुख प्राप्त हुआ जैसे दावाग्नि
से दग्ध (झुलसे हुए) व्यक्ति को अमृत-सरोवर में स्नान करने से होता है॥६९॥

५९९ कथासरित्सागर

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५९९ कथासरित्सागर
प्राप्तायां च चतुर्दश्यां सा तं चन्द्रप्रभाब्रवीत्।
अद्य गच्छामि विज्ञाप्य तातस्याहं भवत्कृतम् ॥७०॥
सर्वं परिजनश्चायं मयैव सह यास्यति।
त्वया त्वकाकिना दुःखं न भाव्यं दिवसद्वयम् ॥७१॥
एकेन पुनरतस्मिन्मन्दिरेऽप्यवतिष्ठता।
मध्यमा भवता भूमिर्नारोढव्या कथञ्चन ॥७२॥
इत्युक्त्वा सा युवानं स यस्तस्थिता तदन्तिके।
तदीयचित्तानुगता ययौ चन्द्रप्रभा ततः ॥७३॥
सोऽप्येकाकी ततस्तत्र स्थितश्चन्ता विनोदयन्।
स्थानस्थानञ्च बभ्राम शक्तिदेवा महर्द्धिषु ॥७४॥
किंसविदद्य निषिद्धं मे तया पृष्ठेऽधिरोहणम्।
विद्याधरदुहित्रेति जातकौतूहलोऽथ सः ॥७५॥
तस्यैव मध्यमां भूमिं मन्दिरस्यारुगेह् ताम्।
प्रायो वारितवामा हि प्रवृत्तिर्मनसो नृणाम् ॥७६॥
आरूढस्तत्र चापश्यद् गुप्तान् स्त्रीन् रत्नमण्डपान्।
एकं चोद्घाटितद्वारं तन्मध्यात् प्रविवेश सः ॥७७॥
प्रविश्य चान्तः सद्रत्नपर्यङ्के न्यस्ततूलिके।
पटावगुण्ठिततनुं शयानं कञ्चिदक्षत ॥७८॥
वीक्षते यावदुत्क्षिप्य पटं सार्थमृतां तथा।
परोपकारिनृपतस्तनयां वरनयकाम् ॥७९॥
दृष्ट्वा चाचिन्तयत्तत्सोऽप्यं किमिदं महदद्भुतम्।
किमप्रयोधमुप्तेयं किं वा भ्रान्तिरथाथवा ॥८०॥
यस्याः कृते प्रवासोऽयं मम सर्वेह तिष्ठति।
ममाद्यपगतप्राणा तत्र देशे च जीवति ॥८१॥
अम्लानकान्तिरस्याश्च तद् विद्याया मम ध्रुवम्।
कमापि चारुनटमिन्द्रजालं वितन्यते ॥८२॥
इति सञ्चिन्त्य विगत्य तावन्यौ मण्डपौ क्रमात्।
प्रविश्यान्तं च ददर्श तदृकन्ये च कस्यके ॥८३॥
ततोऽपि निर्गतस्तस्य साश्चर्यो मन्दिरस्य सः।
उपविष्टः स्थितोऽपश्यद् वापीमभ्यस्तमामयम् ॥८४॥

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कुछ समय पश्चात् चतुर्दशी के आने पर चन्द्रप्रभा शक्तिदेव से कहने लगी—'आज मैं
तुम्हारे लिए पिता से निवेदन करने जाती हूँ, मेरे सभी सेवक मेरे साथ ही जायेंगे। इन दो
दिनों तक तुम अकेले दुःखी न होना ॥७०-७१॥
इस भवन में अकेले रहते हुए भी तुम बीच की मञ्जिल में कभी न जाना' ॥७२॥
उस युवक को ऐसा कहकर और उसी में अपने हृदय को रखकर तथा इसी प्रकार
उसके हृदय को चन्द्रप्रभा अपने साथ लेकर वहाँ से चली गई ॥७३॥
वह शक्तिदेव अब वहाँ अकेला रहता हुआ मन बहलाने के लिए, इधर-उधर अत्यन्त
समृद्धि-सम्पन्न उन मकानों में घूमता रहता था ॥७४॥
'उस विद्याधर-कन्या ने मेरा ऊपर (बीच की मञ्जिल में) जाना क्यो वारित किया' इस
प्रकार के कुतूहल से वह उसी मञ्जिल में पहुँचा। मनुष्यों के मन की प्रवृत्ति प्रायः निषेध के विपरीत
ही चलती है ॥७५॥
ऊपर चढ़कर उसने मूर्त रूप से सुरचित तीन मंडपों को देखा ॥७६॥
उसमें प्रविष्ट होकर उसने सुन्दर बिछावनों से युक्त रत्नों के पलंग पर दुपट्टा ओढ़ने से
ढंके हुए शरीर से शयन करते हुए किसी व्यक्ति को देखा ॥७७-७८॥
जब उसने कपड़ा उठाकर उसे देखा तब तो उसे परोपकारी राजा की मरी हुई कन्या
कनक-रेखा दिखाई पड़ी ॥७९॥
उसे देखकर शक्तिदेव सोचने लगा—'यह क्या महान् आश्चर्य है? क्या यह अचेतनावस्था
(बेहोशी) में सोई है या मुझ ही भ्रम हो रहा है ॥८०॥
जिसके लिए मेरी इतनी लम्बी और कष्टप्रद यात्रा हुई वह निर्जीव होकर यहाँ पड़ी है
और वहाँ (वर्धमान में) जीवित है ॥८१॥
इसकी मुखकान्ति भी मलिन नहीं पड़ी है। प्रतीत होता है कि विधाता ने किसी कारण
वश मेरे लिए असमय ही यह इन्द्रजाल रचा है ॥८२॥
ऐसा सोचते-सोचते उसने दूसरे दोनों मंडपों के अन्दर क्रमशः जाकर उसी प्रकार सोई
हुई और दो कन्याएँ देखीं ॥८३॥
उन मंडपों से निकलकर आश्चर्यचकित शक्तिदेव ने ऊपर बैठ हुए वहीं से नीचे एक
अत्यन्त सुन्दर बावली देखी और उसके किनारे पर रत्नों की जीनवाले एक सुन्दर घोड़े को
देखा ॥८४॥


१. 'अरेबियन नाइट्स' में तीन राजपोतों की कहानी में ऐसी राजकन्याओं की
चर्चा है और इसी प्रकार एक मंजिल देखने की मनाही है। वहाँ ऐसे ही एक घोड़े का वर्णन
भी है।—अनु.

५९८ कथासरित्सागर

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५९८ कथासरित्सागर
सत्तीरे रत्नपर्याणं¹ ददर्शैकं च वाजिनम्।
तत्रावतीर्यथ तत्तत्पार्श्वं कौतुकाश्रयो ॥८५॥
इयेष च समारोढुं शून्यं दृष्ट्वा स तेन च।
अश्वेनाहत्य पादेन तस्यां वाप्यां निक्षिक्षपे ॥८६॥
तन्निमग्नः स च क्षिप्रं वर्धमानपुराभिजात्।
उद्यानदीर्घिकामध्यादुन्ममज्ज ससम्भ्रमम् ॥८७॥
ददर्श जन्मभूमीं च सद्यो वापीजले स्थितम्।
आत्मानं कुमुदैस्तुल्यं दीनं चन्द्रप्रभां विना ॥८८॥
वर्धमानं पुरं क्वेदं क्व सा वैद्याधरी पुरी।
अहो किमेतदाश्चर्यमायाडम्बरजृम्भितम् ॥८९॥
कष्टं किमपि केनापि मन्दभाग्योऽस्मि वञ्चितः।
यदि वा कोऽत्र जानाति कीदृशी भवितव्यता ॥९०॥
इत्यादि चिन्तयन्सोऽथ वापीमध्यात् समुत्थितः।
सविस्मयः शक्तिदेवो ययौ पितृगृहं निजम् ॥९१॥
तत्रापदिष्टपटहभ्रमणं कृतकौतुकः।
पित्राभिनन्दितस्तस्थौ सोत्सवे स्वजने सह ॥९२॥
द्वितीयेऽह्नि बहिर्गेहान्निर्गतश्चाशृणोत् पुनः।
घोष्यमाणं सपटकं पुरे तस्मिन्निदं वचः ॥९३॥
विप्रक्षत्रियमध्यात्कनकपुरी येन तत्त्वतो दृष्टा।
ब्रवीतु स तस्मै तनयां सयौवराज्यां ददाति नृपः ॥९४॥
तच्छ्रुत्वैव स गत्वा तान् पटहोद्घोषकान् कृती।
मया दृष्टा पुरी सेति शक्तिदेवोऽब्रवीत्पुनः ॥९५॥
तस्तूर्णं नृपतेरग्रे स नीतोऽभून्नृपोऽपि तम्।
प्राग्जन्मने परिज्ञाय पुनर्वितथवादिनम् ॥९६॥
मिथ्या बह्मि न मया दृष्टा सा नगरी यदि।
तदिदानीं शरीरस्य निग्रहेण पणो मम ॥९७॥
अथ सा राजपुत्री मां पृच्छत्वित्यभ्यधत्त तत्।
गत्वा चान्तःपुरे राजा तत्रैवानाययत् सुताम् ॥९८॥
१ रत्नजटितमश्वपृष्ठास्तरणम्।

पंचम लम्बक ५६९

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पंचम लम्बक ५६९
उसे देखकर वह बीच की मंजिल से उतरकर कौतुक के साथ उस घोड़े के समीप
आया ॥८५॥
वहाँ एकान्त देखकर उसने घोड़े पर चढ़ने की इच्छा प्रकट की। ज्यों ही उसने उस पर
चढ़ने का प्रयत्न किया त्यों ही घोड़े ने लात मारकर उसे पासवाली बावली में गिरा दिया।
बावली में गिरा हुआ वह शक्तिदेव अकस्मात् ही वर्धमान नगर-स्थित अपने घर के उद्यान की बावली
में आ निकला ॥८६-८७॥
और उसने बावली के जल में खड़े हुए अपने को चन्द्रप्रभा के बिना मुरझाए हुए कुमुद
के समान अपनी जन्मभूमि में पाया ॥८८॥
शक्तिदेव का पुनः वर्धमाननगर में आगमन
वह सोचने लगा कहाँ यह वर्धमान नगर और कहाँ वह विद्याधरों की कनकपुरी नगरी!
यह क्या आश्चर्य है। क्या मायाजाल है? दुःख है कि किसी ने मुझ अभागे को ठग लिया है।
या यह कौन जानता है कि आगे क्या होनेवाला है॥८९-९०॥
इन सब बातों को सोचता हुआ वह चकित शक्तिदेव बावली से निकला और अपने पिता
के घर गया ॥९१॥
वहाँ पर वह राजा की घोषणा के अनुसार कनकपुरी का भ्रमण-वृत्तान्त किसी को न
बताकर, और इधर-उधर की झूठी बातें बनाकर पिता द्वारा प्यार किया गया वह शक्तिदेव उसके
आने की प्रसन्नता मनाते हुए घर के व्यक्तियों के साथ घर में ही रह गया ॥९२॥
दूसरे दिन घर से बाहर निकलकर उसने उसी ढिंढोरे को फिर से सुना जो उस नगर में
पीटा जा रहा था ॥९३॥
'कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय-युवक जिसने कनकपुरी देखी हो वह कहे और राजकन्या तथा
युवराज-पद प्राप्त करे' ॥९४॥
यह सुनकर वह सफल शक्तिदेव ढिंढोरा पीटनेवालों के पास गया और बोला— मैंने वह
नगरी देखी है' ॥९५॥
उन लोगों ने उसे शीघ्रता से राजा के पास ले जाकर खड़ा कर दिया और राजा ने भी उसे
पहचानकर पहले के समान झूठ बोलनेवाला समझा ॥९६॥
तब वह शक्तिदेव कहने लगा—'यदि मैं झूठ बोल रहा हूँ कि वह नगरी मैंने नहीं देखी
है तो मुझे प्राणदंड दिया जाय ॥९७॥
'आज यह राजपुत्री मुझसे (शक्ति देव से) उस नगरी के सम्बन्ध में पूछे ऐसा कहकर
राजा ने अपने सेवकों से राजकुमारी को वहीं बुलवा लिया ॥९८॥
७२

५७ कथासरित्सागर

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५७ कथासरित्सागर
सा दृष्टा दृष्टपूर्वं तं विप्रं राजानमभ्यधात् ।
तात मिथ्यैव भूयोऽपि किञ्चिद् वक्ष्यत्यसाविति ॥९९॥
शक्तिदेवस्ततोऽवादीदहं सत्यं नृपाय वा ।
वच्मि राजसुते त्वं तु वदैव मम कौतुकम् ॥१००॥
मया कनकपुर्यां त्वं पर्यङ्के गतजीविता ।
दृष्टा ऽहह न पश्यामि जीवन्तीं भवतीं कथम् ॥१०१॥
इत्युक्ता शक्तिदेवेन साभिज्ञानं नृपात्मजा ।
सद्यः कनकरेखा सा जगादैव पितुः पुरः ॥१०२॥
तात दृष्टामुना सत्यं नगरी सा महात्मना ।
अचिराच्चैष भर्ता मे तत्रस्थाया भविष्यति ॥१०३॥
तत्र मद्भगिनीश्चान्यास्तिस्रोऽप्य परिनेष्यति ।
विद्याधराधिराज्यं च तस्यां पुरि करिष्यति ॥१०४॥
मया त्वद्य प्रवेष्टव्या स्वा तनुश्च पुरी च सा ।
मुनेः शापादहं ह्यत्र जाताऽभूवं भवद्गृहे ॥१०५॥
यदा कनकपुर्यां ते गेहमालोक्य मानुषः ।
मर्त्यभावभृतस्तत्स्वप्रतिभवं करिष्यति ॥१०६॥
तदा ते शापमुक्तिश्च स च स्यान्मानुषः पतिः ।
इति मे च स शापान्तं पुनरेवाऽदिशन्मुनिः ॥१०७॥
जातिस्मरा च मानुष्येऽप्यहं ज्ञानवती तथा ।
तद्ब्रजाम्यधुना सिद्धये निजं वैद्याधरं पदम् ॥१०८॥
इत्युक्त्वा राजपुत्री सा तनुं त्यक्त्वा तिरोदधे ।
तुमुलश्चोदभूत्तस्मिन्नाक्रन्दो राजमन्दिरे ॥१०९॥
शक्तिदेवोऽप्युभयतो भ्रष्टस्तत्रैवुदत्तरे ।
श्लेशे प्राप्यापि न प्राप्ते ध्यायस्ते द्वे अपि प्रिये ॥११०॥
निन्दन्खिन्नोऽपि चात्मानमसम्पून्नमनोरथः ।
निर्गत्य राजभवनात् क्षणादेवमचिन्तयत् ॥१११॥
अभीष्टं भावि मे तावदुक्तं कनकरेखया ।
तत्किमर्थं विषादामि सत्त्वाधीना हि सिद्धयः ॥११२॥
पथा तेनैव कनकपुरीं गच्छामि तां पुनः ।
भूयोऽप्यवश्यं दैव मे तत्रोपायं करिष्यति ॥११३॥
इत्यालोच्यैव स प्रायाच्छक्तिदेवो पुरस्ततः ।
असिद्धार्था निवर्तन्ते नहि धीराः कृतोद्यमाः ॥११४॥

पञ्चम लम्बक ५७१

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पञ्चम लम्बक ५७१
राजकन्या पहले ही हँसे हुए उस ब्राह्मण-युवक को देखकर बोली—'पिताजी यह
फिर भी कुछ इधर-उधर की मनमानी झूठ बोलेगा'॥१९१॥
तब शक्तिदेव ने राजकुमारी से कहा—'मैं सच हूँ या झूठ लेकिन राजकुमारी तू मरे
एक कौतुक को दूर कर, मैं कहता हूँ मैंने कनकपुरी में तुझे पलंग पर मरी हुई पड़ी देखा है। यहाँ यह
बात नहीं देख रहा हूँ तू कैसे जी रही है यह रहस्य मुझे बता ॥१९२॥
शक्तिदेव द्वारा सच्ची जानकारी व गाव इस प्रकार कहने पर वह राजकन्या कनकरेखा
पिता के सामने बोली—॥१९३॥
पिताजी इसने सचमुच वह नगरी देखी है। अतः यह शीघ्र ही कनकपुरी में जाने पर मेरा
पति होगा॥१९४॥
वहाँ पर मेरी और भी तीन बहिनों को ब्याहेगा और नगरी में विद्याधरों पर राज्य
करेगा॥१९५॥
अब आज ही मुझे अपनी नगरी और अपने पूर्व कलेवर में प्रवेश करना चाहिए। मुनि
के शाप से मैं तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई थी॥१९६॥
शाप देने के पश्चात् मुनि ने शाप का अन्त इस प्रकार कहकर किया था कि जब कोई मनुष्य
कनकपुरी में तेरा मृत शरीर देखकर मनुष्य-शरीर धारण करनेवाली तेरा रहस्य प्रकट करेगा
तब तेरी शाप से मुक्ति होगी और वह मनुष्य तेरा पति होगा॥१९७॥
मानव-शरीर पाकर भी मैं पूर्वजन्म का स्मरण करती थी और मुझे सब ज्ञान था। सो
अब मैं अपनी सिद्धि के लिए अपने विद्याधरस्थान को जाती हूँ॥१९८॥
इतना कहकर राजपुत्री अपना शरीर त्यागकर अन्तर्हित हो गई और राजभवन में
जोर से रोना-चिल्लाना मच गया॥१९९॥
दोनों ओर से मारा गया शक्तिदेव उन उन रत्नों को प्राप्त करके भी इन दोनों (चन्द्र-
प्रभा और कनकरेखा) प्रेयसियों में से एक को भी न पाकर स्तब्ध-सा रह गया॥१११॥
अनन्तर मनोरथभंग या निष्फता से अपनी निन्दा करता हुआ उसी समय राजभवन
से निकलकर सोचने लगा—॥१११॥
कनकरेखा ने कहा है जब मेरी अभिलाषा पूर्ण होगी ही तब क्यों व्यर्थ दुःखी होऊँ,
स्थितियाँ मनोरथ के अधीन होगीं? ॥११॥
तो मैं फिर उसी मार्ग से कनकपुरी को जाऊँ। भाग्य फिर भी अवश्य मेरी सहायता
करेगा। ऐसा सोचकर वह शक्तिदेव वर्धमान नगर से चल पड़ा। कष्ट है उसकी ओर उस दिशा
सम्बन्धी प्रयत्न किये प्रयत्न से दुःख नहीं॥११३॥११७॥

५७२ कथासरित्सागर

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५७२ कथासरित्सागर
गच्छंश्चिराच्च सम्प्राप जलधेः पुलिनस्थितम्।
तद्विटङ्कपुरं नाम नगरं पुनरेव सः ॥११५॥
तत्रापश्यच्च वणिजं तं सम्मुखमुपागतम्।
येन साकं गतस्याब्धिं पोतमादावभज्यत ॥११६॥
सोऽयं समुद्रदत्त स्यात् क्व च पतितोऽम्बुधौ।
उत्तीर्णोऽथ न वा चित्रमहमवे मिदर्शनम् ॥११७॥
इत्यालोच्य स यावत्तमभ्येति वणिजं द्विजः।
तावत्स स परिज्ञाय हृष्टः कण्ठेऽग्रहीद् वणिक् ॥११८॥
अनेषीच्च निजं गेहं कृतातिथ्यश्च पृष्टवान्।
पोतमग्ने त्वमम्भोधावे कथमत्तीर्णवानिति ॥११९॥
क्षपितवोऽपि वृत्तान्तं तथा च कृत्स्नमब्रवीत्।
यथा मत्स्यनिगीर्णः प्रागुत्स्थलोद्वीपमाप सः ॥१२० ॥
अनन्तरं च तमपि प्रत्यपृच्छद् वणिग्वरम्।
क्व तदा त्वमप्यब्धिमुत्तीर्णो वर्ण्यतामिति ॥१२१॥
अथाब्रवीत्सोऽपि वणिक् सवाहं पतितोऽम्बुधौ।
दिनत्रयं भ्रमन्नासमकं फलहकं श्रितः ॥१२२॥
ततस्तेन पथाऽकस्मादेकं वहनमागतम्।
तत्रस्थैश्चाहमाक्रन्दन् दृष्ट्या चात्रारोपितः ॥१२३॥
मारूढञ्चात्र पितरं स्वमपश्यमहं तदा।
गत्वा द्वीपान्तरं पूर्वं चिरात्तत्कालमागतम् ॥१२४॥
स मां दृष्ट्वा परिज्ञाय कृतकण्ठग्रहः पिता।
स्वमपृच्छद् वृत्तान्तमहं चैव तमब्रुवम् ॥१२५॥
चिरकालप्रयातेऽपि तात त्वय्यनुपागते।
स्वधमं इति वाणिज्यं स्वयमस्मि प्रवृत्तवान् ॥१२६॥
ततो द्वीपान्तरं गच्छंस्तह वहनभङ्गतः।
अधाम्बुधौ निमग्नः सन् प्राप्य युष्माभिरित्युभूत् ॥१२७॥
एवं मयोक्तस्तातो मां सोपालम्भमभाषत।
आरोहसि किमर्थं त्वमीदृशान् प्राणसंशयान् ॥१२८॥
धनमस्ति हि मे पुत्र! स्थितश्चाहं तदर्जने।
पश्यानीतं मयेदं ते वहनं हेमपूरितम् ॥१२९॥
इत्युक्त्वाश्वास्य तेनैव वहनेन निजं गृहम्।
विटङ्कपुरमानीतस्तेनेवेदमहं ततः ॥१३ ०॥

पंचम लम्बक ५७३

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पंचम लम्बक ५७३

चलते-चलते वह बहुत विलंब से समुद्र-तट पर स्थित उस विटंकपुर नगर में फिर
पहुँचा ॥११८॥
विटंकपुर में उसने सामने आये हुए उस बनिये को देखा जिसके साथ पहली बार जाने
पर समय में जहाज टूट गया था। यह तो वही समुद्रदत्त है जो समुद्र में गिरकर भी बाहर कैसे निकल
पाया यह आश्चर्य है ! अथवा इसमें आश्चर्य ही क्या ? मैं ही इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हूँ। ऐसा सोचकर
उस ब्राह्मण ने बनिये के पास जाते ही उसे अपना परिचय दिया। बनिये ने उसे गले लगाकर हर्ष
प्रकट किया और उसे अपने घर लेजाकर स्वागत-सत्कार करने के पश्चात् पूछा कि नाव के टूटने
पर तुम समुद्र से कैसे पार हुए। उत्तर में शक्तिदेव ने अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया कैसे
कि मत्स्य के निगले जाने पर उत्स्थल-द्वीप में वह पहुँचा था॥११९-१२० ॥
अपना समाचार सुनाकर शक्तिदेव ने भी उस वैश्य से पूछा कि तुम कैसे समुद्र से बच
निकले सुनाओ ॥१२१॥
बनिये ने अपना वृत्तान्त सुनाते हुए उससे कहा—'उस समय समुद्र में गिर जाने पर मैं
एक काष्ठपट्ट (तख्ते) के सहारे तीन दिनों तक समुद्र में ही चक्कर काटता रह गया॥१२२॥
तीसरे दिन उसी मार्ग से एक नाव आई। उसमें बैठे हुए लोगों ने मुझे चिल्लाते हुए
देखकर उस पर चढ़ा लिया॥१२३॥
उस पर चढ़कर मैंने उसमें अपने पिता को बैठा हुआ पाया, जो बहुत दिनों से गये हुए थे
और किसी दूसरे द्वीप से आ रहे थे ॥१२४॥
मेरे पिता ने मुझे देखकर और गले लगाकर रोते हुए मेरा वृत्तान्त पूछा और मैंने सब
बताया ॥१२५॥
मैंने उनसे कहा पिताजी बहुत दिन व्यतीत होने पर और आपके न लौटने पर मैं अपना
कर्तव्य समझ कर व्यापार में लग गया॥१२६॥
इसी प्रसंग में दूसरे द्वीप को जाते हुए, नाव के टूट जाने से मैं समुद्र में गिरा और आप लोगों
ने आकर मेरा उद्धार किया॥१२७॥
तब मेरे पिता ने मुझसे कहा—'मेरे रहते हुए तुम इस जीवन के सन्देह में पड़ जानेवाले
कार्यों में क्यों लगते हो ? देखो मैं इस जहाज को सोने से भरा हुआ लाया हूँ ऐसा कहकर धैर्य
देते हुए वे मुझे घर ले आये" ॥१२८-१३१ ॥

५७४ कथासरित्सागर

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५७४ कथासरित्सागर
इत्येतद् वणिजस्तस्माच्छक्तिदेवो निशम्य स।
विरम्य च त्रियामां तामन्येद्युस्तमपोचत् ॥१३१॥
गन्तव्यमुत्स्थलद्वीप सार्थवाह! पुनर्मया।
तत्कथं तत्र गच्छामि साम्प्रतं कथ्यतामिति ॥१३२॥
गन्तुं प्रवृत्तास्तत्राद्य मदीया व्यवहारिणः¹।
तद्यानपात्रमारूह्य श्रयातु सह तैर्भवान् ॥१३३॥
इत्युक्तस्तेन वणिजा स तस्तद्व्यवहारिभिः।
साकं तदुत्स्थलद्वीपं शक्तिदेवो ययौ ततः ॥१३४॥
यः स बन्धुर्महात्मा मे विष्णुदत्तोऽत्र तिष्ठति।
प्राग्वत्तस्यैव निकटं वस्तुमिच्छामि तन्मठम् ॥१३५॥
इति सम्प्राप्य च द्वीप तंत्कालं च विचिन्त्य सः।
विपणीमध्यमार्गेण गन्तुं प्रावर्तत द्विजः ॥१३६॥
तावच्च तत्र दैवात्तं दृष्ट्वा दाशपतेः सुताः।
सत्यव्रतस्य तस्यारात् परिज्ञायैवमब्रुवन् ॥१३७॥
तातेन सार्क कनकपुरीं लिन्प्सुस्तिस्त्वया।
अह्यप्रगास्त्वमेकश्च कथमत्रागतो भवान् ॥१३८॥
शक्तिदेवस्ततोऽवादीदम्बुराशौ स वः पिता।
पतितोऽम्बुभिराकष्टवहनो वडवामुखे ॥१३९॥
तच्छ्रुत्वा दाशपुत्रास्ते क्रुद्धा भृत्यान्बभाषिरे।
बध्नीतेनं दुरात्मानं हतोऽनेन स नः पिता ॥१४०॥
अन्यथा कथमेकस्मिन् सति प्रवहणे द्वयोः।
वडवाग्नौ पतेदेको द्वितीयश्चोत्तरे ततः ॥१४१॥
तदेष चण्डिका देव्याः पुरस्तात् पितृघातकः।
अस्माभिरुपहन्तव्यः श्वः प्रभाते पशूकृतः ॥१४२॥
इत्युक्त्वा दाशपुत्रास्ते भृत्यान्बवन्ध्वैव तं तदा।
शक्तिदेवं ततो निन्युर्मयङ्कश्चण्डिकामृहम् ॥१४३॥
शवरूपबलितानेकजीवं प्रबिततोवरम्।
कथदृष्टाबलीवन्स्तमाळ मृत्योरिवाननम् ॥१४४॥
१ व्यापारिणः।
२ अपशुरपि पशूक्तः कृत इतिभावः।

पंचम लम्बक ५७५

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पंचम लम्बक ५७५
वैश्य का समाचार सुनकर शक्तिदेव ने रात को वहीं विश्राम किया और दूसरे दिन
उससे कहा— हे व्यापारी मुझे पुनः उत्पस्थल-द्वीप जाना है। सो बताओ मुझे कैसे जाना
चाहिए' ॥१३१-१३२॥
वैश्य ने कहा, —'आज ही मेरे व्यापारी वैश्य वहाँ जाने के लिए तैयार हैं तुम उन्हीं के
जहाज पर चढ़कर वहाँ जाओ' ॥१३३॥
इस प्रकार उस वैश्य द्वारा वहाँ जाने की सारी व्यवस्था कर देने पर, शक्तिदेव उन्हीं के
साथ उत्पलक-द्वीप को गया ॥१३४॥
वहाँ जाकर उसने निश्चय किया कि यहाँ जो मेरा भाई विष्णुदत्त रहता है वह अत्यन्त
उदार है पहले उसी के मठ में निवास के लिए जाना चाहिए ॥१३५॥
ऐसा सोचकर वह ब्राह्मण बाजार के बीच से वहाँ जाने लगा ॥१३६॥
इसी बीच दैवयोग से सत्यव्रत नामक निषादराज के पुत्रों ने उसे देखा और पहिचान कर
इस प्रकार पूछा —॥१३७॥
'हे ब्राह्मण तुम तो कनकपुरी को ढूँढ़ते हुए मेरे पिता के साथ यहाँ से गये थे। अब तुम
अकेले कैसे आ गये ? ॥१३८॥
तब शक्तिदेव ने कहा—'वह तुम्हारा पिता समुद्री भँवर द्वारा नाव को अपनी ओर खींच
लेने पर बड़वानल के मुँह में जा गिरा' ॥१३९॥
यह सुनकर धीवर के पुत्र क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने सेवकों से कहा— 'इस दुष्ट को
बाँध लो। इसने हमारे पिता को मार डाला है ॥१४०॥
अन्यथा एक ही नाव पर एक साथ यात्रा करते हुए कैसे एक व्यक्ति बड़वानल में
गिर गया और एक बच गया ॥१४१॥
इसलिए अपने पिता के इस हत्यारे को हम कल प्रातःकाल चंडिका देवी के सामने
पशु की तरह इसका बलिदान करेंगे ॥१४२॥
इस प्रकार कहकर धीवर-पुत्रों ने नौकरों से उसे बँधवाकर चंडिका के मन्दिर में
पहुँचा दिया ॥१४३॥
वह चंडिका-मन्दिर, निरन्तर प्राणियों को निगलनेवाला विशाल उदरवाला और लटकते
हुए घंटे-रूपी दाँतोंवाला मानो मौत का प्रत्यक्ष मुँह था ॥१४४॥

५७६ कथासरित्सागर

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५७६ कथासरित्सागर

तत्र बद्धः स्थितो रात्रौ शशयानः स्वजीवित।
स शक्तिदेवो देवीं तां चण्डीमेवं व्यजिज्ञपत् ॥१४५॥
'बालार्कबिम्बनिभया भगवति मूर्त्या त्वया परित्रातम्।
निर्भरपीतप्रविसृतरुग्दानवकण्ठरुधिरयेव जगत् ॥१४६॥
सं मां सततप्रणतं निष्कारणविधुरवर्गहस्तगतम्।
रक्षस्व सुदूरागतमिष्टजनप्राप्तितृष्णया वरदे ! ॥१४७॥
इति देवीं स विज्ञप्य प्राप्य निद्रां कथञ्चन।
अपश्यद्योषितं स्वप्ने तद्गर्भगृहनिर्गताम् ॥१४८॥
सा दिव्याकृतिरभ्येत्य सद्येव जगाद तम्।
भो शक्तिदेव ! मा भैषीर्न तेऽनिष्टं भविष्यति ॥१४९॥
अस्येषां दासपुत्राणां नाम्ना विन्दुमती । स्वसा।
सा प्रातर्वीक्ष्य कन्या त्वां भर्तृत्वेऽभ्यर्थयिष्यति ॥१५०॥
तच्च त्वं प्रतिपद्येथाः सैव त्वां मोचयिष्यति।
न चा सा धीवरी सा हि दिव्या स्त्री शापतःच्युता ॥१५१॥
एतच्छ्रुत्वा प्रबुद्धस्य तस्य नेत्रामृतच्छटा।
प्रभाते दाशकन्या सा तद्देवीगृहमाययौ ॥१५२॥
जगादे चैनमभ्येत्य निर्वेदात्साममुत्सुका।
इतोऽहं मोचयामि त्वां तत्कुरुष्वेप्सितं मम ॥१५३॥
भ्रातॄणां सम्मता ह्येते प्रत्याख्याता वरा मया।
त्वयि दृष्टे तु मे प्रीतिः सञ्जाता तद्द्‌भजस्व माम् ॥१५४॥
इत्युक्तः स तया बिन्दुमत्या दाशेन्द्रकन्यया।
शक्तिदेवः स्मरन् स्वप्नं हृष्टस्तत्तथ्यपद्यत ॥१५५॥
तयैव मोचितस्तां च सुमुखीं परिणीतवान्।
स्वप्नलब्धाम्बिकादेवीऋतुभिर्विहितेप्सिताम् ॥१५६॥
तस्थौ च सुखसिद्धयेव तत्र पुष्यकरुम्भया।
रूपान्तरोपागतया स तया सह दिव्यया ॥१५७॥
एकदा हर्म्यपृष्ठस्थो धृतगोमांसभारकम्।
मार्गगतं स चण्डालं दृष्ट्वा तामब्रवीत् प्रियाम् ॥१५८॥
वन्द्यास्त्रिजगतोऽप्येता याः कृशोदरि धेनवः।
तासां पिशितमश्नाति पश्यायं पापकृत्कथम् ॥१५९॥

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वहाँ बाँधकर रखा गया शक्तिदेव अपने जीवन में संशय करता हुए चण्डिका की स्तुति
करने लगा—॥१४५॥
'हे भगवति भरपेट पिये हुए दैत्य के रुधिर समानों उदय होते हुए सूर्य-बिम्ब के समान
वर्णवाली (अपनी) मूर्ति से तुमने संसार की रक्षा की है। इसलिए निरन्तर प्रणाम करते हुए, बिना
कारण ही पामरों के हाथों में पड़े हुए और प्रेमी जनों की प्राप्ति के लिए दूर देश से आये हुए मेरी
रक्षा करो'॥१४६ १४७॥
शक्तिदेव इस प्रकार देवी की स्तुति करके सो गया। उसने स्वप्न में देखा कि उस मन्दिर
के गर्भगृह से एक दिव्य स्त्री निकली और उस पर मानों दया करती हुई कहने लगी—
'हे शक्तिदेव तेरा अनिष्ट नहीं होगा ॥१४८ १४९॥
इन धीवर-पुत्रों की बिन्दुमती नाम की बहिन है। वह अभी कुमारी है। प्रातःकाल तुझ
देखकर अपना पति बनाने के लिए तुमसे प्रार्थना करेगी॥१५० ॥
तुम उसे स्वीकार कर लेना वही तुम्हें छुड़वा देगी। वह निषाद-जाति की कन्या नहीं है
प्रत्युत शाप के प्रभाव से पतित दिव्य-स्त्री है"॥१५१॥
यह सुनकर शक्तिदेव के जागने पर प्रातःकाल ही आँखों में अमृत वर्षा करनेवाली
धीवर कन्या उस देवी-मन्दिर में आई॥१५२॥
वह धीवर-कन्या शक्तिदेव के समीप आकर और अपना परिचय देकर उत्सुकता के साथ
कहने लगी—'मैं तुम्हें छोड़वा दूँगी पर प्रतिज्ञा करो कि तुम मेरी इच्छा पूरी करोगे।
मेरे विवाह के लिए मेरे भाइयों द्वारा सम्मत और लाये गये सभी वरों को मैंने अस्वीकृत
कर दिया है किन्तु तुम्हे देखकर मुझे तुम पर प्रेम हो गया है इसलिए मुझे स्वीकार
करो ॥१५३ १५४॥
धीवर-राज की कन्या बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर अपने स्वप्न को स्मरण करते
हुए शक्तिदेव ने उसके प्रस्ताव को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया। और, इसी प्रतिज्ञा पर
छुड़ाये गये उसने बिन्दुमती से विवाह भी कर लिया क्योंकि स्वप्न में चंडिका का आदेश
पाकर उसके भाई बहिन की इच्छा से सम्मत हो गये थे॥१५५ १५६॥
पुण्य से प्राप्त की हुई सिद्धि के समान दूसरा रूप धारण की हुई उस दिव्य रमणी बिन्दु
मती के साथ वह वहीं रहने लगा। एक बार भवन की छत पर उमा के साथ बैठे हुए शक्तिदेव ने
सिर पर गोमांस का बोझ उठाये हुए और मार्ग पर चलते हुए एक चांडाल को देखकर
अपनी पत्नी से पूछा—॥१५७-१५८॥
हे कृशोदरि, जो गाय तीनों लोकों के लिए वन्दनीय है उसका मांस यह पापी कैसे
खाता है ? ॥१५९॥
७३

५७८ कथासरित्सागर

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५७८ कथासरित्सागर

सम्प्रहृष्टा साप्यवादात्तं पतिं बिन्दुमती तदा ।
अचिन्त्यमार्यपुत्रैतत्पापमत्र किमुच्यते ॥ १६०॥
अहं गवां प्रभावेण स्वल्पादप्यपराध्यतः ॥
जाता दाशकुलेऽमुष्मिन् का स्वेतस्यात्र निष्कृतिः ॥ १६१॥
एवमुक्तवतीमेव शक्तिदेवो जगाद ताम्।
चित्रं ब्रूहि प्रिये ! का त्वं दाशजन्म कथं च ते ॥ १६२॥
अभिनिर्बध्यतश्चैवं पृच्छन्तं तमुवाच सा।
वदामि गोप्यमप्येतद् वचनं मे करोषि चेत् ॥ १६३॥
बाढं प्रिये ! करोमीति तेनोक्ते सपथोत्तरम्।
सा सर्वं जगादेदमादौ तावत् समीहितम् ॥ १६४॥
बिन्दुमती कथा
अस्मिन् द्वीपे द्वितीयापि भार्या ते भविताधुना।
सा चार्यपुत्र न चिरादमृतगर्भा भविष्यति ॥ १६५॥
अष्टमे गर्भमासे च पाटयित्वोदरं त्वया।
तस्याः स गर्भः क्रष्टव्यो नैव कार्या घृणात्र च ॥ १६६॥
एवमुक्तवती तस्मिन् किमेतदिति विस्मिते।
ससद्गुणे च भूयः सा दाशेन्द्रतनयाब्रवीत् ॥ १६७॥
इत्येतत्तव कर्तव्यं हेतोः कस्यापि मद्बचः।
अथेदं शृणु या चाहं दाशजन्म यथा च मे ॥ १६८॥
अहं जन्मान्तरेऽभूवं कापि विद्याधरी पुरा।
महर्षेस्तोक्ते च शापेन परिभ्रष्टास्मि साम्प्रतम् ॥ १६९॥
विद्याधरत्वे च यदा छित्त्वा दन्तैरयोजयम्।
वीणासु तन्त्रीस्तेनेह जाताहं दाशवेश्मनि ॥ १७०॥
तदेवं वदने स्पृष्टे शुक्रेण स्नायुना गवाम्।
ईदृश्यधोगतिः का तु वार्ता तन्मांसभक्षणे ॥ १७१॥
इत्येवं कथयन्त्यां च तत्र तस्यां ससम्भ्रमम्।
एकोऽभ्युपेत्य तद् भ्राता शक्तिदेवमभाषत ॥ १७२॥
उत्तिष्ठ सुमहानेष कुतोप्युत्थाय सूकरः।
हतानेकजनो दर्पादितोऽभिमुखमागतः ॥ १७३॥
तच्छ्रुत्वा साञ्जवीर्येश्च गत्वेव स स्वहर्म्यतः।
मारुह्य शक्तिहस्तोऽश्वमपावृतपुरं प्रति ॥ १७४॥

पंचम लम्बक ५७१

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पंचम लम्बक ५७१
यह सुनकर बिन्दुमती अपने पति से कहने लगी— आर्यपुत्र गोमांस-भक्षण का पाप तो
अविचिन्त्य है, इस विषय में यहाँ क्या कहा जा सकता है। मैं गायों के ही थोड़े-से अपराध के कारण
धीवरों के कुल में जन्मी। अब इससे कब उद्धार होगा यह पता नहीं ॥१६०-१६१॥
ऐसा कहती हुई पत्नी से शक्तिदेव बोला— आश्चर्य है प्रिये ! तुम कौन हो और
इस धीवर के कुल में तुम्हारा जन्म कैसे हुआ? ॥१६२॥
इस प्रकार अत्यन्त आग्रह के साथ पूछते हुए शक्तिदेव से उसने कहा—'यह अत्यन्त
गोपनीय बात है। यदि तुम मेरी बात मानो तो मैं तुमसे कहती हूँ' ॥१६३॥
तब शक्तिदेव के शपथ खाकर उसे गुप्त रखने की प्रतिज्ञा करने पर, उस बिन्दुमती ने
प्रारम्भ से इस प्रकार उसे बताया ॥१६४॥
बिन्दुमती की कथा
'इस द्वीप में तुम्हारी एक दूसरी पत्नी भी होगी और वह शीघ्र ही गर्भवती हो
जायगी ॥१६५॥
गर्भ के आठवें महीने में तुम्हें उसका पेट फाड़कर उस गर्भ को निकालना पड़ेगा और इस
कार्य में तुम्हें घृणा न करनी होगी' ॥१६६॥
धीवर-कन्या के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव अत्यन्त आश्चर्य-चकित हुआ और घृणा
प्रकट करने लगा। यह देखकर धीवर-कन्या ने फिर उससे कहा—'यह कार्य किसी गुप्त
कारण से तुम्हें करना ही पड़ेगा। अब सुनो मैं कौन हूँ और धीवर जाति में मेरा जन्म कैसे
हुआ? ॥१६७-१६८॥
'मैं पहले जन्म में विद्याधरी थी। इस समय शाप से पतित होकर मर्त्यलोक में मेरा
जन्म हुआ है॥१६९॥
विद्याधर जन्म में मैंने वीणा के तारों को दाँतों से तोड़कर जोड़ा था इसी से धीवर
कुल में मेरा जन्म हुआ ॥१७० ॥
इस प्रकार गाय के मृत चमड़े को दाँतों से छूने पर जब मेरी इस प्रकार अधोगति हुई
तब मांस-भक्षण की तो बात ही क्या कही जा सकती है ॥१७१॥
उसके ऐसा कहते हुए मध्य में ही उसका एक भाई आकर शक्तिदेव से बोला—'उठो
देखो यह शूकर उठकर अनन्त मत्स्यों को मारता हुआ इधर ही सामने आ गया है' ॥१७२-१७३॥
यह सुनकर वह शक्तिदेव अपने भवन से उतरकर घोड़े पर सवार होकर और हाथ में
शक्ति (शस्त्र) लिये हुए शूकर की ओर दौड़ा ॥१७४॥

५८ कथासरित्सागर

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५८ कथासरित्सागर
प्रजहार च दृष्ट्वैव तस्मिन्नीरेऽभिधावति।
पलाय्य व्रणित सोऽपि वराहः प्राविशद् बिलम् ॥१७५॥
शक्तिदेवोऽपि तत्रैव तदन्वपी प्रविश्य च।
क्षणादपश्यत् सावासमुद्यानगहनं महत् ॥१७६॥
तत्रस्थश्च ददर्शासौ कन्यामत्यमृताकृतिम्।
ससम्भ्रममुपायातां प्रीत्येव वनदेवताम् ॥१७७॥
तामपृच्छच्च कस्यासि ! का त्वं किं सम्भ्रमश्च ते।
तच्छ्रुत्वा सापि सुमुखी तमवं प्रत्यभाषत ॥१७८॥
अस्ति दक्षिणविछनायो नृपतिश्चण्डविक्रमः।
तस्याहं विन्दुरेखाख्या सुता सुभगकन्यका ॥१७९॥
इहाकस्माच्च पापो मां दैत्यो ज्वलितलोचनः।
अपहृत्य च्छलेनाद्य पितुरानीतवान् गृहात् ॥१८०॥
स चामिषार्थी वाराहं रूपं कृत्वा बहिर्गतः।
विद्धोऽद्य क्षुधार्त्तः सन् शक्त्या वीरेण केनचित् ॥१८१॥
विद्धमात्रं प्रविश्येह पञ्चत्वमागतश्च सः।
तद्वधूतितकौमारा पश्चाद्बाह्य च निर्गता ॥१८२॥
तच्छ्रुत्वा शक्तिदेवस्तामूचे कस्तर्हि सम्भ्रमः।
मयैव स वराहो हि हत शक्त्या नृपात्मजे ॥१८३॥
तत साप्यवदत्तर्हि ब्रूहि मे को भवानिति।
विप्रोऽहं शक्तिदेवाख्य इति प्रत्यब्रवीच्च सः ॥१८४॥
सहि त्वमेव मे भर्तेत्युचितं स तया वृतः।
ततस्यादाय तां धीरो बिलद्वारेण निर्ययौ ॥१८५॥
गृहं गत्वा च भार्यायै बिन्दुमत्यै निवेद्य तत्।
तच्छङ्कितं कुमारीं तां बिन्दुरेखामुपोढवान् ॥१८६॥
ततस्तस्य द्विभार्यस्य शक्तिदेवस्य तिष्ठतः।
तत्रैका बिन्दुरेखा सा भार्या गर्भमधारयत् ॥१८७॥
अष्टमे गर्भमासे च तस्या स्वैरमुपेत्य तम्।
आद्या बिन्दुमती भार्या शक्तिदेवमुवाच सा ॥१८८॥
वीर ! तत्स्मर यन्मह्यं प्रतिश्रुतमभूत्त्वया।
सोऽयं द्वितीयभार्याया गर्भमासोऽष्टमस्तव ॥१८९॥

पंचम लम्बक ५८१

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पंचम लम्बक ५८१
उसने भागते हुए सूअर पर प्रहार किया। आहत सूअर भी भागकर अपने बिल में चला
गया॥१७५॥
उसे ढूँढ़ता हुआ वह शक्तिदेव भी बिल में घुसा और अन्दर जाकर क्षण-भर में उसने
सुन्दर बने हुए निवास-गृहवाले एक वन उद्यान को देखा॥१७६॥
वहाँ जाकर उसने अद्भुत स्वरूपवाली और घबराई हुई एक कन्या को प्रेम से स्वागत
के लिए आई हुई, साक्षात् वनदेवी के समान देखा॥१७७॥
और उससे पूछा—'कल्याणमयी तू कौन है? और तुझे इतनी व्याकुलता क्यों है?
यह सुनकर वह सुन्दरी उससे इस प्रकार कहने लगी—॥१७८॥
'हे सुन्दर! दक्षिण-देश में चंडविक्रम नाम का एक राजा है। मैं उसी की कन्या हूँ।
मेरा नाम बिन्दुरेखा है। यह पापी दैत्य छलकर मुझे पिता के घर से हरण करके
यहाँ ले आया है॥१७९-१८०॥
वह दैत्य मांस-भक्षण के लिए सूअर का रूप धारण करके बाहर गया। किसी से शक्ति
द्वारा आहत होने पर वह मूर्च्छा यहाँ आकर मर गया। इसीलिए मैं भी घर से बाहर निकलकर
भाग आई हूँ किन्तु मेरी कुमारावस्था को उसने दूषित (नष्ट) नहीं किया है'॥१८१-१८२॥
यह सुनकर शक्तिदेव ने उससे कहा—'तब चिन्ता की क्या बात है? हे राजपुत्रि
मैंने ही शक्ति से इस सूअर को मारा है'॥१८३॥
तब वह कन्या कहने लगी कि तुम कौन हो यह बताओ। उत्तर में उसने कहा—
'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण हूँ'॥१८४॥
कन्या ने कहा—'तब तू ही मेरा स्वामी है।' उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव उसे
लेकर बिल-मार्ग से बाहर निकल आया॥१८५॥
तदनन्तर उस कन्या को ले जाकर अपनी पत्नी बिन्दुमती को सौंप दिया। और, पत्नी
के विश्वास दिलाने पर शक्तिदेव ने उस कन्या से पाणिग्रहण कर लिया॥१८६॥
तत्पश्चात् दो पत्नियोंवाले शक्तिदेव के वहाँ रहते हुए एक पत्नी गर्भवती हो गई
इस गर्भ का अष्टम मास निकट आने पर शक्तिदेव की पहली पत्नी बिन्दुमती उसके पास जाकर
धीरे-से कहने लगी—'वीर, उस बात का स्मरण करो जो तुमने पहले मुझसे प्रतिज्ञा की थी
तुम्हारी दूसरी भार्या को आठ महीने का गर्भ हो गया है॥१८७-१८९॥

५८२ कथासरित्सागर

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५८२ कथासरित्सागर
सद्गत्वा गर्भमेतस्या विपाद्योर्ध्वमाहर।
अनतिक्रमणीयं हि निजं सत्यवचस्तव ॥१९०॥
एवमुक्तस्तया शक्तिदेवः स्नेहकृपाकुलः।
प्रतिज्ञापरतन्त्रश्च क्षणमासीदनुत्तरः ॥१९१॥
जातोद्वेगश्च निर्गत्य बिन्दुरेखान्तिकं ययौ।
सापि खिन्नमुपायान्तं तं विलोक्यैवमब्रवीत् ॥१९२॥
आर्यपुत्र! विषण्णोऽसि किमद्य ननु वेद्म्यहम्।
बिन्दुमत्य नियुक्तरत्वं गर्भस्योत्पाटने मम ॥१९३॥
तच्च तेऽवश्यकर्तव्यं कार्यं किञ्चिद्धि विद्यते।
नृशंसता न मास्त्यत्र काचिन्मा घृणां कृपा ॥१९४॥
देवदत्तब्राह्मणस्य कथा
तथाहि शृणु नामात्र देवदत्तकथामिमाम्।
पुरामूद्धरिदत्ताख्यः कम्बुकाख्ये पुरे द्विजः ॥१९५॥
तस्य च श्रीमतः पुत्रः कृतविद्योऽपि शैशवे।
देवदत्ताभिधानोऽभूद्द्यूतैकव्यसनी युवा ॥१९६॥
द्यूतहारितवस्त्रादिर्गन्तुं नालं पितुर्गृहम्।
एकदा च विवेशैकः स शून्यं देवतागृहम् ॥१९७॥
तत्र चापश्यदेकाकी साधितानेक कार्मणम्।
जपन्तं जालपादाख्यं महाव्रतिनमेककम् ॥१९८॥
चकार च शनैस्तस्य प्रणाममुपगम्य सः।
तेनाप्यपास्तमौनेन स्वागतेनाभ्यनन्द्यत ॥१९९॥
स्थितः क्षणाच्च तेनैव पृष्टो वैधुर्यकारणम्।
शशंसास्मै स्वविपदं व्यसनक्षीणवित्तताम् ॥२००॥
ततस्तं स जगादैवं देवदत्तं महाव्रती।
नास्ति व्यसनिनां वत्स! भुवि पर्याप्तये धनम् ॥२०१॥
इच्छा च विपदं हर्तुं यदि ते कुरु मद्वचः।
विद्याधरत्वं प्राप्तं यत् कृतः परिकरो मया ॥२०२॥
तत्साधय त्वमप्येतन्मया सह सुलक्षण!
मच्छासनं तु पाल्यं तन्नश्यन्तु विपदस्तव ॥२०३॥
१ विविधकाम्यनानावशां तावकम् ।

पंचम लम्बक ५८१

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पंचम लम्बक ५८१
इसलिए अब तुम उसके पास जाकर उसका पेट फाड़कर लाओ। अब तुम्हें अपनी कही
हुई सत्य बात से विचलित न होना चाहिए'॥१९० ॥
पत्नी के द्वारा इस प्रकार कहा गया शक्तिदेव प्रेम और दया से व्याकुल तथा प्रतिज्ञा से
पराधीन होकर कुछ देर चुप रहा॥१९१॥
कुछ क्षण आवेश में आकर और वहाँ से निकलकर वह बिन्दुरेखा के पास गया। बिन्दु-
रेखा ने उसे दुःखी और चिन्तित होकर अपने पास आते हुए देखकर कहा—'आर्यपुत्र आज
दुःखी क्यों हो? यह मैं जानती हूँ कि तुम्हें बिन्दुमंती ने मेरा गर्भ फाड़ने के लिए कहा है। यह कार्य
तुम्हें अवश्य करना चाहिए। उससे कुछ काम बनेगा इसमें कुछ भी क्रूरता नहीं है। इसलिए
घृणा न करो'॥१९२-१९४॥
देवदत्त ब्राह्मण की कथा
'हे नाथ इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें देवदत्त की कथा कहती हूँ सुनो—प्राचीन समय में
कम्बुक नामक नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उस धनी ब्राह्मण का देवदत्त नामक
एक पुत्र हुआ जो बाल्यावस्था में ही विद्वान् होकर भी युवावस्था में जूए का व्यसनी हो
गया था॥१९५-१९६॥
एक बार जूए में अपने कपड़े तक हार जाने के कारण वह अपने पिता के घर न जा सका
और लज्जित होकर वह एक देवमन्दिर में जाकर ठहरा॥१९७॥
वहाँ मन्दिर में अकेले उसने अनेक सामग्रियों को एकत्र करके एकान्त में जप करते हुए
महाव्रती जाह्नपाद नामक तपस्वी को देखा॥१९८॥
देवदत्त धीरे से उसके पास जाकर प्रणाम करके बैठा। जाह्नपाद ने भी मौन त्यागकर
उसका प्रेमपूर्ण वचनों से स्वागत किया॥१९९॥
कुछ समय बैठने के पश्चात् व्रती जाह्नपाद ने उसकी चिन्ता और दुर्दशा का कारण पूछा।
उसके पूछने पर देवदत्त ने अपनी दुर्दशा का कारण जूए के व्यसन में धन का नष्ट हो जाना
बताया॥२००॥
तब महातपस्वी जाह्नपाद ने कहा—'बेटा व्यसनियों के लिए पृथ्वी में पूरा धन ही
नहीं है'॥२०१॥
यदि तुम मेरी बात मानो तो मेरी इच्छा तुम्हारा कष्ट दूर करने की है। मैंने अपनी
साधना से जैसे विद्याधरत्व प्राप्त किया है और सिद्धि प्राप्त की है, उसे तुम भी मेरे साथ
प्राप्त करो किन्तु मेरी आज्ञा का पालन करना होगा। तुम्हारी सब विपत्तियां दूर हो
जायेंगी'॥२०२-२०३॥

५८४ कथासरित्सागर

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५८४ कथासरित्सागर
इत्युक्तो व्रतिना तेन प्रतिश्रुत्य १ तथेति तत्।
स देवदत्तस्तत्पार्श्वे सदैव स्थितिमग्रहीत् ॥२०४॥
अन्येद्युश्च श्मशानान्ते गत्वा वटतरोरधः।
विधाय रजनीं पूजां परमान्नं निवेद्य च॥२ ५॥
बलीन्दिक्षु च विक्षिप्य सम्पादिततदर्चनः।
तं पार्श्ववर्तिनं विप्रमुवाच स महाव्रती ॥२ ६॥
एवमेव त्वया कार्यमिह प्रत्यहमर्चनम्।
विद्युत्प्रभे गृहाणेमां पूजामित्यभिधायिना ॥२०७॥
अतः परं न जानेऽहं सिद्धिस्त्वैव ध्रुवावयोः।
इत्युक्त्वा स ययौ तेन समं स्वनिलयं व्रती ॥२०८॥
सोऽपि नित्यं तरोस्तस्य मूलं गत्वा समर्च तत्।
देवदत्तोऽर्चनं चक्रे तथैव विधिना ततः ॥२०९॥
एकदा च सपर्यान्ते द्विधाभूतात्तरोस्ततः।
अकस्मात्पश्यतस्तस्य दिव्या नारी विनिर्ययौ ॥२१ ॥
एह्यस्मत्स्वामिनी भद्र ! वक्ति त्वामिति वादिनी।
सा तं प्रवेशयामास तस्यैवाभ्यन्तरं तरोः ॥२११॥
स प्रविश्य ददर्शात्र दिव्यां मणिमयं गृहम्।
पर्यङ्कवर्त्तिनीमेकां तत्र चान्तर्वरस्त्रियम् ॥२१२॥
रूपिणी सिद्धिरस्माकमियं स्यादिति स क्षणात्।
यावद्व्यवस्यति तावत्सा कृतातिथ्या वराङ्गना ॥२१३॥
रणिताभरणैरङ्गैर्विहितस्वागतैरिव ।
उत्थाय निजपर्यङ्के तमुपावेशयत् स्वयम् ॥२१४॥
जगाद च महाभाग ! सुता यक्षपतेरहम्।
कन्या हि रत्नवर्यस्य ख्याता विद्युत्प्रभाख्यया ॥२१५॥
आराधयच्च मामेष बालपादो महाव्रती।
यस्यार्थसिद्धिर्देवास्मि त्वं प्राणेष्वपि मे प्रभुः ॥२१६॥
तस्माद् दृष्टानुरागिण्याः कुरु पाणिग्रहं मम।
इत्युक्तः स तया चक्रे देवदत्तस्तथेति तत् ॥२१७॥
१ स्वीकृत्येति भावः
२ परमान्नं तु पायसम् इत्यमरः।