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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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पंचम लम्बक ५७३

चलते-चलते वह बहुत विलंब से समुद्र-तट पर स्थित उस विटंकपुर नगर में फिर
पहुँचा ॥११८॥
विटंकपुर में उसने सामने आये हुए उस बनिये को देखा जिसके साथ पहली बार जाने
पर समय में जहाज टूट गया था। यह तो वही समुद्रदत्त है जो समुद्र में गिरकर भी बाहर कैसे निकल
पाया यह आश्चर्य है ! अथवा इसमें आश्चर्य ही क्या ? मैं ही इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हूँ। ऐसा सोचकर
उस ब्राह्मण ने बनिये के पास जाते ही उसे अपना परिचय दिया। बनिये ने उसे गले लगाकर हर्ष
प्रकट किया और उसे अपने घर लेजाकर स्वागत-सत्कार करने के पश्चात् पूछा कि नाव के टूटने
पर तुम समुद्र से कैसे पार हुए। उत्तर में शक्तिदेव ने अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया कैसे
कि मत्स्य के निगले जाने पर उत्स्थल-द्वीप में वह पहुँचा था॥११९-१२० ॥
अपना समाचार सुनाकर शक्तिदेव ने भी उस वैश्य से पूछा कि तुम कैसे समुद्र से बच
निकले सुनाओ ॥१२१॥
बनिये ने अपना वृत्तान्त सुनाते हुए उससे कहा—'उस समय समुद्र में गिर जाने पर मैं
एक काष्ठपट्ट (तख्ते) के सहारे तीन दिनों तक समुद्र में ही चक्कर काटता रह गया॥१२२॥
तीसरे दिन उसी मार्ग से एक नाव आई। उसमें बैठे हुए लोगों ने मुझे चिल्लाते हुए
देखकर उस पर चढ़ा लिया॥१२३॥
उस पर चढ़कर मैंने उसमें अपने पिता को बैठा हुआ पाया, जो बहुत दिनों से गये हुए थे
और किसी दूसरे द्वीप से आ रहे थे ॥१२४॥
मेरे पिता ने मुझे देखकर और गले लगाकर रोते हुए मेरा वृत्तान्त पूछा और मैंने सब
बताया ॥१२५॥
मैंने उनसे कहा पिताजी बहुत दिन व्यतीत होने पर और आपके न लौटने पर मैं अपना
कर्तव्य समझ कर व्यापार में लग गया॥१२६॥
इसी प्रसंग में दूसरे द्वीप को जाते हुए, नाव के टूट जाने से मैं समुद्र में गिरा और आप लोगों
ने आकर मेरा उद्धार किया॥१२७॥
तब मेरे पिता ने मुझसे कहा—'मेरे रहते हुए तुम इस जीवन के सन्देह में पड़ जानेवाले
कार्यों में क्यों लगते हो ? देखो मैं इस जहाज को सोने से भरा हुआ लाया हूँ ऐसा कहकर धैर्य
देते हुए वे मुझे घर ले आये" ॥१२८-१३१ ॥