कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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यह सुनकर बिन्दुमती अपने पति से कहने लगी— आर्यपुत्र गोमांस-भक्षण का पाप तो
अविचिन्त्य है, इस विषय में यहाँ क्या कहा जा सकता है। मैं गायों के ही थोड़े-से अपराध के कारण
धीवरों के कुल में जन्मी। अब इससे कब उद्धार होगा यह पता नहीं ॥१६०-१६१॥
ऐसा कहती हुई पत्नी से शक्तिदेव बोला— आश्चर्य है प्रिये ! तुम कौन हो और
इस धीवर के कुल में तुम्हारा जन्म कैसे हुआ? ॥१६२॥
इस प्रकार अत्यन्त आग्रह के साथ पूछते हुए शक्तिदेव से उसने कहा—'यह अत्यन्त
गोपनीय बात है। यदि तुम मेरी बात मानो तो मैं तुमसे कहती हूँ' ॥१६३॥
तब शक्तिदेव के शपथ खाकर उसे गुप्त रखने की प्रतिज्ञा करने पर, उस बिन्दुमती ने
प्रारम्भ से इस प्रकार उसे बताया ॥१६४॥
बिन्दुमती की कथा
'इस द्वीप में तुम्हारी एक दूसरी पत्नी भी होगी और वह शीघ्र ही गर्भवती हो
जायगी ॥१६५॥
गर्भ के आठवें महीने में तुम्हें उसका पेट फाड़कर उस गर्भ को निकालना पड़ेगा और इस
कार्य में तुम्हें घृणा न करनी होगी' ॥१६६॥
धीवर-कन्या के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव अत्यन्त आश्चर्य-चकित हुआ और घृणा
प्रकट करने लगा। यह देखकर धीवर-कन्या ने फिर उससे कहा—'यह कार्य किसी गुप्त
कारण से तुम्हें करना ही पड़ेगा। अब सुनो मैं कौन हूँ और धीवर जाति में मेरा जन्म कैसे
हुआ? ॥१६७-१६८॥
'मैं पहले जन्म में विद्याधरी थी। इस समय शाप से पतित होकर मर्त्यलोक में मेरा
जन्म हुआ है॥१६९॥
विद्याधर जन्म में मैंने वीणा के तारों को दाँतों से तोड़कर जोड़ा था इसी से धीवर
कुल में मेरा जन्म हुआ ॥१७० ॥
इस प्रकार गाय के मृत चमड़े को दाँतों से छूने पर जब मेरी इस प्रकार अधोगति हुई
तब मांस-भक्षण की तो बात ही क्या कही जा सकती है ॥१७१॥
उसके ऐसा कहते हुए मध्य में ही उसका एक भाई आकर शक्तिदेव से बोला—'उठो
देखो यह शूकर उठकर अनन्त मत्स्यों को मारता हुआ इधर ही सामने आ गया है' ॥१७२-१७३॥
यह सुनकर वह शक्तिदेव अपने भवन से उतरकर घोड़े पर सवार होकर और हाथ में
शक्ति (शस्त्र) लिये हुए शूकर की ओर दौड़ा ॥१७४॥