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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

षष्ठः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ३९५

षष्ठः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ३९५

अनु०—यह जो दूसरी अत्यन्त गोपनीय विधि बतायी जा रही है उसे भी ध्यान देकर समझो । इस विधि से व्यक्ति बड़े पातक दोष को छोड़कर अन्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। पवित्र क.रने वाले मन्त्रों से (सुरभिमती आदि मन्त्रों से ) जल का मार्जन करते हुए, रुद्र के ग्यारह अनुवाकों का जप करते हुए, पवित्र मन्त्रों के उच्चारण के साथ घृत की आहुति करते हुए तथा सुवर्ण, गो तथा तिल का दान कर मनुष्य बड़े पातक के दोष को छोड़कर अन्य सभी पापों से मुक्त होता जाता है ॥ ३-४ ॥

टि०--गोविन्दस्वामी की व्याख्या के अनुसार यहाँ भी सात दिन-रात्रि की अवधि समझनी चाहिए ।

अल्पप्रयासेन बहुपापक्षयलाभात् गुह्यमित्युक्तम् । प्रथमस्सर्वशब्द एकैकस्मिन् पापाभ्यासार्थः । द्वितीयः पापभेदापेक्षः । पवित्राणि 'सुरभिमत्यादयो मन्त्राः । रुद्रैकादशिका 'नमस्ते रुद्र' इत्येकादशाऽनुवाकाः । पूर्वं जपन् जुह्वत् प्रयच्छन् मुच्यत इति सम्बन्धः । अत्राऽपि वक्ष्यमाणस्सप्तरात्रः कालो भवति ॥ ३, ४ ॥

योऽश्नीयाद्यावकं पक्वं गोमूत्रे सशकृद्रसे ।
सदधिक्षीरसर्पिष्के मुच्यते ऽसोंऽहसः क्षणात् ॥ ५ ॥

अनु०—जो व्यक्ति गाय की मूत्र, गोबर के रस, दधि, दूध, घृत से मिश्रित पके हुए यावक का भक्षण करता है वह शीघ्र ही पाप से मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥

प्रसूतो यश्च शूद्रायां येनाऽगम्या च लङ्घिता ।
सप्तरात्रात्प्रमुच्येते विधिनेतेन तावुभौ ॥ ६ ॥

अनु०—जिस व्यक्ति ने शूद्रा स्त्री से पुत्र उत्पन्न किया है, जिस व्यक्ति ने ऐसी स्त्री से मैथुन किया है, जिससे मैथुन करना वर्जित है-वे दोनों ही प्रकार के दोषी व्यक्ति उपर्युक्त विधि से सात दिन में पाप से मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

यावकं पक्वं यवौदनो यवागूर्वा । शकृद्रसोऽपि गोरेव । तत्सहिते गोमूत्रे पक्वमित्यर्थः । तदेव दध्ना क्षीरेण सर्पिषा च संयुक्तं भवति । प्रसाङ्गात्पापं तद्वक्ष्यमाणम्-प्रसूतो यश्चेत्यादि । सप्तरात्रादिति कालनिर्देशविरोधात् क्षणादित्ययमर्थवादः । सप्तरात्राभिप्रायो वा । 'क्षणः क्षणोतेः प्रक्ष्णतः कालः' इति निर्वचनात् । क्रमोढायामपि शूद्रायामपत्योत्पादनं यः करोति


१. 'दधिक्राव्ण' इति सुरभिमती । तस्या सुरभिशब्दश्रवणात् ॥

३९६ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ परिवेत्रादिप्रायश्चित्तम्

येन वाऽगम्या पितृष्वसेय्यादिका लंघिता भवति, लंघनं गमनम्, तावुभाव-
नेन पूर्वोक्तेन विधिना मुच्येते ॥ ५, ६ ॥

न केवलमत्र—

रेतोमूत्रपुरीषाणां प्राशनेऽभोज्यभोजने ।
पर्याधानेज्ययोरेतत् परिवित्ते च भेषजम् ॥ ७ ॥

**अनु०—**वीर्यं मूत्र और मल खा लेने पर, जिन व्यक्तियों का अन्न खाना निषिद्ध है उनका अन्न खाने पर अथवा बड़े भाई से पहले ही छोटे भाई के अग्नि का आधान करने, श्रौत यज्ञ करने और विवाह करने पर भी उपर्युक्त व्रत ही पाप दूर करने का उपचार है ॥ ७ ॥

अभोज्यानां परिग्रहदुष्टानां स्वभावदुष्टानां च भोजने । पर्याधानं ज्यायसि तिष्ठत्यनाहिताग्नौ कनीयस आधानम् । आह च—

दाराग्निहोत्रसंयोगे कुरुते योऽग्रजे स्थिते ।
परिवेत्ता सविज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः ॥ इति

अत्राऽग्रजशब्दस्याऽयमर्थः—अग्र एव यस्मिन् जाते सत्यात्मनो जननं सम्भवति स तं प्रत्यग्रजः । एवं च सति पितर्यनाहिताग्नौ सति पुत्रेण नाऽऽधातव्यमिति भवति । परीज्यायामपि एतदेव पूर्वोक्तं भेषजम् । इज्या यागः नित्येज्या ऐष्टिकपाशुकसौमिकाः, न नैमित्तिकाः काम्याश्च । ते पितरं ज्येष्ठं वोल्लङ्घ्य न कर्तव्याः' यदि कुर्यात्तत्राऽपि एतदेव प्रायश्चित्तं—'योऽश्नीयाद्यावकं पक्वम्' इत्यादि ॥ ७ ॥

अपातकानि कर्माणि कृत्वैव सुवहून्यपि ।
मुच्यते सर्वपापेभ्य इत्येतद्वचनं सताम् ॥ ८ ॥

**अनु०—**जिस व्यक्ति ने पातक कर्मों को छोड़कर अन्य बहुत से अनगिनत पाप कर्म किये हैं वह भी सभी पापों से मुक्त हो जाता है, ऐसा सज्जनों का वचन है ॥ ८ ॥

पूर्वोक्तेन प्रायश्चित्तेनेति शेषः । सतां मन्वादीनाम् ॥ ८ ॥
सर्वत्राऽत्र मूलभूतं प्रमाणमाह--

मन्त्रमार्गप्रमाणं तु विधाने समुदीरितम् ।
भरद्वाजादयो येन ब्रह्मणस्समतां गताः ॥ ९ ॥

**अनु०—**यहाँ जिन नियमों का विधान किया गया है वे मन्त्रों के पाठ के ऊपर