बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ५९
नवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ५९
प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः
इदानीं दृष्टदोषाणामपि केषांचिद्द्रव्याणां शौचमापादयितुमाह—
¹'नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्यं यच्च प्रसारितम् ।
ब्रह्मचारिगतं भैक्षं नित्यं मेध्यमिति श्रुतिः ॥ १ ॥
अनु०—कारु ( कारीगर ) का हाथ नित्य शुद्ध रहता है, विक्रय के लिए फैलायी गयी वस्तु भी सदा शुद्ध होती है, तथा ब्रह्मचारी के हाथ में गया हुआ भिक्षा से प्राप्त अन्न सदैव शुद्ध होता है ऐसी वेद की उक्ति है ॥ १ ॥
हस्तादन्येन पादादिना स्पर्शने दोषः । आपणगतैः विक्रीतुं पण्यं प्रसारितम् । श्रुत्युपन्यासः सामान्यतो दृष्टथा प्रक्षाळनाद्याशङ्कानिवृत्त्यर्थः ॥ १ ॥
किञ्च—
²वत्सः प्रस्नवने मेध्यः शकुनिः फलशातने ।
स्त्रियश्च रतिसंसर्गे श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ २ ॥
अनु०—दूध पेन्हाते समय ( गो को उपस्तृत करते समय ) गाय का बछड़ा शुद्ध होता है, वृक्ष से फल गिरते समय पक्षी पवित्र होता है, संभोग क्रिया के समय स्त्रियाँ पवित्र होती हैं और शिकार में मृग को पकड़ते समय कुत्ता शुद्ध होता है ॥ २ ॥
टि०—इस पद्य का भाव है कि तत्तत् क्रिया में इन प्राणियों के मुख से या श्वास, लार आदि से स्पृष्ट होने पर भी अशुद्धि का दोष नहीं होता । गो के दूध दुहते समय बछड़ा जो थन से दुग्धपान करता है उससे दुग्ध अशुद्ध नहीं माना जाता, किन्तु अन्य समय पर बछड़े के मुख से स्पृष्ट होने पर अशुद्धि मानी जाती है । कौआ आदि पक्षी यदि काटकर फल गिरावे तो वह अशुद्ध नहीं होता, किन्तु फल के गिरने पर यदि पक्षी उसे छूता है तो फल अशुद्ध माना जायगा । इसी प्रकार यदि शिकार में कुत्ता मृग आदि पशु को काटता है तो वह अशुद्ध नहीं समझा जायगा, अन्यथा कुत्ते के मुख से स्पृष्ट होने पर अशुद्धि मानी जाती है । रतिकाल में स्त्री के मुख या श्वास से स्पर्श अशुद्धिजनक नहीं होता । इस संबन्ध में गोविन्द स्वामी ने वसिष्ठधर्म सूत्र से तीन पद्य उद्धृत किये हैं ।
अत्र 'पक्षिजग्धं गवाऽऽघ्रातमवधूतंमवक्षुतम्'
१. श्लोकोऽयं समानानुपूर्वीको मनौ दृश्यते । cf. म. ५. १२९.
२. श्लोकोऽयं समानानुपूर्वीक एव वासिष्ठे दृश्यते । cf. व. ध. २८. ८. किञ्चिदेवान्यथयितो मनौ । See मनु. ५. १३०.
६० बौधायन-धर्मसूत्रम् [ शुद्धिप्रकरणम्
इत्येवमायालोचनया जुगुप्सा नैव कर्तव्या। दोहकालादन्यत्र वत्सलो-
ढेऽपि दोषः। तथा शातनग्रहणात् वृक्षात्पतितस्य शकुनिजग्धस्य भक्षणे दोषः।
रतिसंसर्गग्रहणात् अन्यत्र स्त्रीणां श्वासलालास्वादने दोषः। तत्राऽपि स्वभार्याया
एव। तथा मृगयाया अन्यत्र श्वलोढस्य दोषः। तथा च वसिष्ठः—
श्वहताश्च मृगा वन्याः पतितं च खगैः फलम्।
बालैस्तनुपरिक्रान्तं स्त्रीभिराचरितं च यत्॥
प्रसारितं च यत्पण्यं यो दोषः स्त्रीमुखेषु च।
मशकैर्मक्षिकाभिश्च लीढं चेन्नाऽवहन्वते॥
क्षितिस्थाश्चैव या आपो गवां तृप्तिकराश्च याः।
परिसङ्ख्याय तान् सर्वान् शुचीनाह प्रजापतिः॥ इति॥ २॥
आकराश्शुचयस्सर्वे वर्जयित्वा सुराकरम्।
अदूष्यास्सन्तता धारा वातोद्धूताश्च रेणवः॥ ३॥
**अनु०—**सुरा निर्माण के स्थान को छोड़कर अन्य सभी वस्तुओं के उत्पत्ति स्थान या निर्माण के साधन पवित्र होते हैं। बहते हुए जल की धारा और वायु द्वारा उड़ायी गयी धूल अदृष्य होती है॥ ३॥
आकरा उत्पत्तिस्थानानि। गुडक्षौद्रादीनां दुष्टदोषाणां न तत्र शङ्का कार्ये-
त्यभिप्रायः। सुराकरं तु वर्जयेत्, स्पर्शनगन्धग्रहणादीनां प्रतिषेधात्। अदूष्या-
स्सन्तता एव धाराः। अशुचिस्पृष्टा अपि जलप्रस्रवणादयः अदूष्याः। विच्छि-
न्नास्तु दूष्याः। अत एतद्गम्यते विच्छिन्नया करकादिधारया नाऽऽचामेदिति।
वायूत्थापिताश्चेदवस्करादिदेशादुत्थापिता अप्यदूष्या एव रेणवः॥ ३॥
किञ्च—
अमेध्येषु च ये वृक्षा उप्ताः पुष्पफलोपगाः।
तेषामपि न दुष्यन्ति पुष्पाणि च फलानि च॥ ४॥
**अनु०—**पुष्प और फल देने वाले जो वृक्ष या पौधे अपवित्र स्थानों पर उगते हैं उनके भी फूल और फल दूषित नहीं होते हैं॥ ४॥
वृक्षग्रहणं पुष्पग्रहणं चौषधिशाखादीनामप्युपलक्षणार्थम्॥ ४॥
किञ्च—
चैत्यवृक्षं चितिं यूपं चण्डालं वेदविक्रयम्।
एतानि ब्राह्मणस्स्पृष्ट्वा सचेलो जलमाविशेत्॥ ५॥
**अनु०—**पवित्र स्थान पर स्थित वृक्ष को, चिता, यज्ञीय यूप, चण्डाल या वेद