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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

द्वितीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १६७

द्वितीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १६७

गिनीवत्' इति । बिभृयादिति शेषः । स्वयमेव ब्रवीति—'गर्भो न दुष्यति कश्यप इति विज्ञायते' इति । मिन्दाहुती पुनः सर्वत्राऽविशिष्टे । अनिर्दिष्टद्रव्यकत्वादाज्यद्रव्यं प्रतीयात् ॥ ३८ ॥

( परिवित्तः परिवेत्ता या चैनं परिविन्दति ।
सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ) ॥
परिवित्तः परिवेत्ता दाता यश्चाऽपि याजकः ।
कृच्छ्रद्वादशरात्रेण स्त्री त्रिरात्रेण शुद्ध्यतीति ॥ ३९ ॥
इति बौधायनीयधर्मसूत्रे द्वितीयप्रश्ने प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥

**अनु०—**वह ज्येष्ठ भ्राता, जिसके अविवाहित रहते हुए ही छोटे भाई ने विवाह कर लिया हो, ज्येष्ठ भ्राता के अविवाहित रहते हुए विवाह करने वाला, इस प्रकार विवाह करने वाले से विवाहित स्त्री, उस कन्या का विवाह के लिए दान करने वाला तथा इस प्रकार का विवाह कराने वाला पुरोहित ये सभी पाँच नरक जाते हैं। वह ज्येष्ठ भ्राता, जिसके अविवाहित रहते हुए ही छोटे भाई ने विवाह कर लिया है, बड़े भाई के विवाह से पहले ही विवाहित छोटा भाई, विवाह के लिए कन्यादान देने वाला, विवाह संस्कार संपन्न कराने वाला पुरोहित बारह दिन का कृच्छ्रव्रत करने पर शुद्ध होते हैं और जिस स्त्री का इस प्रकार विवाह हुआ हो वह तीन दिन उपवास करने पर शुद्ध होती है ॥३९॥

अकृतदाराग्निहोत्रसंयोगे अग्रजे तिष्ठति यः कनीयान् दारसंयोगमग्निहोत्रसंयोगं वा करोति स परिवेत्ता । इतरः परिवित्तः । परिवेत्तर्य्यः कन्यां प्रयच्छति स दाता । तमेव यो याजयति स याजकः । एतेषां चतुर्णां कृच्छ्रेण शुद्धिः । ययाऽसौ परिवेत्ताऽभूत् ^२तस्याः त्रिरात्रोपवासेन शुद्धिः ॥ ३९ ॥


द्वितीयः खण्डः

अथ पतनीयानि ॥ १ ॥

**अनु०—**अब पतनीय कर्मों का विवेचन किया जायगा, (जिनसे पतन या वर्ण की हानि होती है)

वक्ष्याम इति वाक्यसमाप्तिः । पतनीयानि पतनाहार्णि कर्माणि महापातकेभ्य ईषन्न्यूनानि ॥ १ ॥


१. कुण्डलान्तर्गतो भागो ग. पुस्तके नाऽस्ति ।
२. सा स्त्री त्रिसत्रेण शुध्यति घ. पु. ।

१६८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ प्रायश्चित्तम्

कानि पुनस्तानि ?

^१समुद्रसंयानम् । ब्रह्मस्वन्यासापहरणम् । भूम्यनृतम् । सर्व-पण्यैर्व्यवहरणम् । शूद्रसेवनम् । शूद्राभिजननम् । तदपत्यत्वं च । ^२एषामन्यतमत्कृत्वा चतुर्थकालामितभोजिनस्स्युस्सवनानु कल्पम् । स्थानासनाभ्यां विहरन्त एते त्रिभिर्वर्षैस्तदपहन्ति पापम् ॥ २ ॥

अनु०—ये पतनीय कर्म हैं—समुद्र की यात्रा करना, ब्राह्मण की सम्पत्ति या धरोहर रखी हुई वस्तु हड़प लेना, भूमि के संबन्ध में झूठी गवाही देना, सभी प्रकार की वस्तुओं का क्रय-विक्रय करना ( चाहे वह निषिद्ध हो या न हो ), शूद्र की सेवा करना, शूद्रा स्त्री में गर्भाधान करना, इस प्रकार शूद्रा से ( अपनी शूद्रा पत्नी से भी पुत्र के रूप में उत्पन्न होना,—इनमें से कोई भी पतनीय कर्म करने पर प्रायश्चित्त के लिए भोजन की चौथी वेला को ही अल्प भोजन करे, तीनों सवन काल प्रातः, मध्याह्न और सायं ) स्नान करे, दिन में खड़ा रहे तथा रात्रि को बैठकर ही बितावे, इस प्रकार तीन वर्ष बिताने पर पतनीय कर्म का पाप नष्ट माना जाता है ॥ २ ॥

टि०—'शूद्राभिजननम्, तदपत्यत्वं च' की व्याख्या में गोविन्द स्वामी ने शूद्र की सन्तान होने की यह भी स्थिति बतलायी है कि शूद्र के यहाँ पुत्र बनकर रहना भी पतनीय कर्म है 'शूद्रस्य वा पुत्रभावः, तवायं पुत्रोऽस्मि इत्युपजीवनम् ।'

समुद्रसंयानं नावा द्वीपान्तरगमनम् । ब्राह्मणस्वन्यासापहरणं निक्षेपापहरणम् । भूम्यनृतं साक्ष्ये भूमिविषयानृतवादः । सर्वैः पण्यैर्व्यवहरणीयैरप्युभयतोदद्भिव्र्यवहरणम् । शूद्रप्रेष्यता तत्सेवनमुच्यते । शूद्रायां गर्भस्थापनं शूद्राभिजननम् । शूद्रायां स्वभार्यायामपि जातत्वं तदपत्यत्वम् । शूद्रस्य वा पुत्रभावस्तवाऽहं पुत्रोऽस्मोत्युपजीवनम् । एषामन्यतमस्मिन् कृते प्रायश्चित्तम्—चतुर्थकालाः चतुर्थे काले येषां भोजनं ते तथोक्ताः । मितभोजिनः अल्पभुजः । अपोऽभ्युपेयुस्सवनानु कल्पं त्रिषवणस्नानिनः स्थानासनाभ्यामहोरात्रयोर्यथासङ्ख्यं विहरन्त एवमाचरन्तः एते तत्पापं त्रिभिः संवत्सरैरपहन्ति अपघ्नन्तीत्यर्थः ॥२॥

^३यदेकरात्रेण करोति पापं कृष्णं वर्णं ब्राह्मणस्सेवमानः । चतुर्थकाल उदकाभ्यवायी त्रिभिर्वर्षैस्तदपहन्ति पापमिति ॥ ३ ॥


१. एतत्सूत्रं नवधा विभक्तं इ. पुस्तके ।
२. cf. आप. ध. १. २५. ११.
३. cf. आप ध. १. २७. ११.