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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३१३

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३१३

अवारितस्थानान्यनिषिद्धानि। अप्रतिहतावकाशाः वृत्तिशून्या देशाः। समूहनी सम्मार्जनी ॥ ९॥

पालनीत्यहिंसिकेत्येवेदमुक्तं भवति। तुषविहीनांस्तण्डुलानिच्छति सज्जनेभ्यो बीजानि वा पालयतीति पालनी ॥ १० ॥

अनु०—पालनी नाम की वृत्ति, जिसे अहिंसिका वृत्ति भी कहते हैं इस प्रकार की होती है। सज्जनों से बिना छिलके के चावलों को या बीजों को प्राप्त करने की इच्छा करे और उन्हीं से अपना पालन करे तो पालनी वृत्ति कहलाती है ॥ १० ॥

सज्जनेभ्यो विद्वद्भ्यः। पालयति प्रयच्छति तस्मात्तंडुलानेव स्वयं गृह्णीयात्। तुषविहीनग्रहणं तुषाणामप्यसंग्रहणार्थम्। तेषु मिश्रणसम्भावना यतः ॥ ० ॥

सिलोञ्छा पुनः—

सिलोञ्छेति। अवारितस्थानेषु पथिषु वा क्षेत्रेषु वाऽप्रतिहतावकाशेषु वा यत्रयत्रौषधयो विद्यन्ते तत्रतत्रैकैकं कणिशमुञ्छयित्वा काले-काले सिलैर्वर्तयतीति सिलोञ्छा ॥ ११ ॥

अनु०—सिलोञ्छा वृत्ति इस प्रकार है। जिन स्थानों पर जाना निषिद्ध नहीं है, ऐसे मार्ग में या खेतों में या जहाँ प्रवेश का मार्ग अवरुद्ध नहीं है ऐसे स्थानों पर, जहाँ ओषधियाँ ( अन्न, वृक्षादि ) हों वहाँ एक-एक कण समय-समय पर एकत्र कर उसी के भक्षण से जीवन निर्वाह करना सिलोञ्छा वृत्ति है ॥ ११ ॥

कणिशो धान्यस्तम्बः। उञ्छनं उत्पाटनम्। उञ्छनकालः वीप्सया सम्बध्यते। 'सर्वावश्यककालः उञ्छनकालः। सिलाः ग्रासविशेषाः। यावद्भिरात्मयात्रा भवतीति। शेषं पूर्ववत् ॥ ११ ॥

कापोताऽष्टमी, सेदानीमुच्यते—

कापोतेति। अवारितस्थानेषु पथिषु क्षेत्रेषु वाऽप्रतिहतावकाशेषु वा यत्र यत्रौषधयो विद्यन्ते तत्र तत्राऽङ्गुलिभ्यामेकैकामोषधिमुञ्छयित्वा सन्दर्शनात् कपोतवदिति कापोता ॥ १२ ॥

अनु०—कापोता वृत्ति इस प्रकार होती है। उन स्थानों में जहाँ जाना निषिद्ध नहीं है, मार्गों में या खेतों में या जिन स्थानों पर प्रवेश का मार्ग अवरुद्ध नहीं है, उन स्थानों पर जो ओषधियाँ विद्यमान हों, उनमें दो अंगुलियों से केवल एक-एक ओषधि

३१४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ वृत्त्युपायाः

( अन्न या फल ) ग्रहण कर कपोत के समान जीविका निर्वाह के कारण कापोता-वृत्ति होती है ॥ १२ ॥

संदर्शनादात्मनः प्रकटीकरणात् । संदंशनादिति पाठे खादनादित्यर्थः । तद्यथा कपोतो द्वाभ्यां चञ्चुभ्यां एकस्थान्यव्यक्तं गृहीत्वा पतति एवं कापोतामास्थाय वर्तते ॥ १२ ॥

सिद्धेच्छेच्छा तर्हि वक्तव्या—

सिद्धेच्छेति । वृत्तिभिश्चान्तो वृद्धत्वाद्धातुक्षयाद्वा सज्जनेभ्यः सिद्धमन्नमिच्छतीति सिद्धेच्छा ॥ १३ ॥

**अनु०—**सिद्धेच्छा वृत्ति इस प्रकार है । यदि अन्य वृत्तियों से थक कर वृद्ध होने के कारण या दुर्बल होने के कारण सज्जनों के घर से पके-पकाये अन्न को प्राप्त कर जीवन निर्वाह करता है तो वह सिद्धेच्छा वृत्ति है ॥ १३ ॥

पूर्वोक्ताभिर्वृत्तिभिः । श्रान्तः परिक्षीणः । वृद्धता वयसा, धातुक्षयेण रोगेण । सिद्धं पक्वान्नम् ॥ १३ ॥

तस्याऽऽत्मसमारोपणं विद्यते संन्यासिवदुपचारः पवित्रकाषायवासोवर्जम् ॥ १४ ॥

**अनु०—**यदि सिद्धेच्छा वृत्ति ग्रहण करता है तो सभी यज्ञाग्नियों को अपने में समारोपित करे और संन्यासी के समान आचरण करे, किन्तु पवित्र का प्रयोग न करे तथा गेरुआ वस्त्र भी न धारण करे ॥ १४ ॥

तस्य सिद्धेच्छावृत्तेरपरो नियमः—अग्नीनामात्मनि समारोपणं परिव्राजकधर्माणामनुष्ठानं च । किं सर्वेषाम् । नेत्याह--जलपवित्रं पक्षपवित्रं काषायवासश्च वर्ज्यम् ॥ १४ ॥

अथ वान्या वृत्तिः—

वान्याऽपि वृक्षलतावल्ल्योषधीनां च तृणौषधीनां च श्यामाकजर्तिलादीनां वान्याभिर्वर्तयतीति वान्या ॥ १५ ॥

**अनु०—**यदि वृक्षों और लताओं से उत्पन्न फलों को, तृणों से उत्पन्न वस्तुओं को, श्यामाक, तिल आदि जंगली अन्न को खाकर जीविका निर्वाह करे तो वह वान्या वृत्ति कहलाती है ॥ १५ ॥

वृक्षलतासूत्पादिता वल्लीगुल्मलतासु च । ओषध्यः फलपाकान्ताः यद्वा--द्विविधा ओषध्यः वल्ल्योषध्यः तृणौषध्यश्च । यासां वल्लीभ्य एव धान्यं गृह्यते