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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

तृतीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः २५

तृतीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः २५

'शक्तिविषये मुहूर्तमपि नाप्रयतस्स्यात् ॥ ३१ ॥

अनु०—( ब्रह्मचारी या अन्य व्यक्ति भी आचमन या स्नान से शुद्धि करना ) संभव हो तो एक क्षण भी अपवित्र न रहे । ३१ ॥

शक्ताविति वक्तव्ये विषयग्रहणं ब्रह्मचारिणोऽन्यस्य वा प्राप्त्यर्थम् । स्नाननिमित्ते स्नायादेव, आचमननिमित्तेऽप्याचामेदिति ॥ ३१ ॥

अथ पर्युदस्यति—

समिद्धार्युदकुम्भपुष्पान्नस्तो नाऽभिवादयेद्यच्चान्यदप्येवं युक्तम् ॥३२॥

अनु०—समिध् लिये हुए, हाथ में जल का घड़ा, पुष्प या अन्न लिये रहने पर या इसी प्रकार अन्य ( पितृ देवता अग्नि संबन्धी ) कार्य में संलग्न होने पर इसी 'प्रकार के कर्मों में संलग्न गुरु का अभिवादन न करे ॥ ३२ ॥

समिद्धारी समित्पाणिः । उदकुम्भादिषु हस्तशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । एवं युक्तं पितृदेवताग्निकार्यादिषु व्यापृतो व्यापृतमपि नाऽभिवादयेत् ॥ ३२ ॥

न समवायेऽभिवादनमत्यन्तशः ॥ ३३ ॥

अनु०—गुरु के अत्यन्त समीप स्थित होकर अभिवादन न करे ॥ ३३ ॥

अत्यन्तशस्समवायेऽत्यन्तसमीपे स्थित्वेत्यर्थः ॥ ३३ ॥

भ्रातृपत्नीनां युवतीनां च गुरुपत्नीनां जातवीर्यः ॥ ३४ ॥

अनु०—युवावस्था प्राप्त करने पर भाई की युवती पत्नी या गुरु की युवती पत्नी का चरण स्पर्श कर अभिवादन न करे ॥ ३४ ॥

टि०—सूत्र में 'च' शब्द से अन्य निकट संबन्ध वाली युवती स्त्रियों यथा चाची आदि का ग्रहण करना चाहिए ।

'न समवायेऽत्यन्तश' इति वर्तते । जातवीर्यो जातशुक्लः । चशब्दात्पितृव्यादिपत्नीनामपि युवतीनाम् । स्थविराणां बालानां च न दोषः ॥ ३३ ॥

नौशिलाफलककुञ्जरप्रासादकटकेषु चक्रवत्सु चाऽदोषं सहासनम् ॥३५॥

अनु०—नौका, शिला, फलक, हाथी, मकान की छत, चटाई या पहियेदार यानों पर उनके ( अर्थात् गुरु, उनकी पत्नी आदि के ) साथ बैठने में कोई दोष नहीं होता ॥ ३५ ॥

टि०—इस सूत्र से यह अर्थ ध्वनित है कि इन स्थानों के अतिरिक्त अन्यत्र एक साथ बैठने से दोष उत्पन्न होता है ।


१. समानाकारमेव सूत्रमापस्तम्बीये । Cf with आपस्तम्बधर्म. १. १५ ८.

२६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ ब्रह्मचारिधर्माः

चक्रवन्तो रथशकटायः । इतरे प्रसिद्धाः । एषु गुरुणा तत्पत्नीभिर्वा सहा-
सनं अदोषं दोषावहं न भवति । एषु सहासनाभ्युपगमादन्यत्र सदोषं सहास-
नमिति गम्यते ॥ ३५ ॥

प्रसाधनोच्छादनस्नापनोच्छिष्टभोजनानीति गुरोः ॥ ३६ ॥

अनु०—गुरु के प्रसाधन, उच्छादन (छत्र धारण) तथा स्नान कराने का कार्य करे तथा उनके उच्छिष्ट अन्न का भोजन करे ॥ ३६ ॥

टि०—सूत्र में 'इति' शब्द से इसी प्रकार के अन्य गुरु-सेवापरक कार्यों का ग्रहण होता है—जैसे पीठ मलना, पैर दबाना आदि।

शिष्येण कार्याणीति शेषः । प्रसाधनं मण्डनम् । उच्छादनं छत्रधारणम् । स्नपनं गात्रमलापकर्षणम् । इतिकरणात् पादमर्दनपृष्ठधावनादयो गृह्यन्ते ॥३६॥

उच्छिष्टवर्जं तत्पुत्रेऽनूचाने वा ॥ ३७ ॥

अनु०—गुरु को पुत्र यदि अनूचान (वेद की एक शाखा का अङ्गों सहित अध्ययन कर चुका हो तो उसकी भी सेवा करे किन्तु उसके उच्छिष्ट अन्न का भोजन न करे ॥ ३७ ॥

उच्छिष्टभोजनवर्जं कार्यम् । अनूचाने चाऽगुरुपुत्रेऽपि । अनूचानः एक-शाखायास्साङ्गध्यायी । वाशब्दोऽवधारणार्थः, अनूचान एवेति ॥ ३७ ॥

प्रसाधनोच्छादनस्नापनोच्छिष्टवर्जं च तत्पत्न्याम् ॥ ३८ ॥

अनु०—प्रसाधन, उच्छादन, स्नपन तथा उच्छिष्ट भोजन को छोड़कर गुरु की पत्नी की भी सेवा करे ॥ ३८ ॥

टि०—यहाँ गुरु की युवती पत्नी का अभिप्राय है अर्थात् वृद्धों की वैसी सेवा भी करे।

युवत्यामिति शेषः । स्थविराया उच्छादनादिप्राप्त्यर्थोऽयमारम्भः ॥ ३८ ॥

¹धावन्तमनुधावेद्गच्छन्तमनुगच्छेत्तिष्ठन्तमनुतिष्ठेत् ॥ ३९ ॥

अनु०—गुरु के दौड़ने पर उनके पीछे दौड़े, उनके चलते रहने पर पीछे चले, उनके खड़े रहने पर उनके निकट खड़ा रहे ॥ ३९ ॥

ऋज्वेतत् ॥ ३९ ॥

नाप्सु श्लघमानस्स्नायात् ॥ ४० ॥

अनु०—जल में क्रीडा करते हुए स्नान न करे ॥ ४० ॥


१. Cf with आपस्तम्बधर्मसूत्र १. ६. ७-९.