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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पञ्चमो गान्धर्वः स वैश्यानां भवति । अष्टमः पैशाचः स शूद्राणाम् ॥१३॥

विंशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने एकादशोऽध्यायः १४३

पञ्चमाष्टमौ वैश्यशूद्राणाम् ॥ १३ ॥

अनु०—पाँचवें और आठवें ( गान्धर्व तथा पैशाच ) क्रमशः वैश्यों और शूद्रों के लिए उचित हैं ॥ १३ ॥

पञ्चमो गान्धर्वः स वैश्यानां भवति । अष्टमः पैशाचः स शूद्राणाम् ॥१३॥
ईदृश्याः व्यवस्थायाः को हेतुरिति बुभुत्सूनामाह—

अयन्त्रितकलत्रा हि वैश्यशूद्रा भवन्ति ॥ १४ ॥

टि०—क्योंकि वैश्य और शूद्र पत्नियों के विषय में बहुत नियम का ध्यान नहीं रखते ॥ १४ ॥

अयन्त्रितं अनियतं कलत्रं भार्या येषां ते भवन्ति अयन्त्रितकलत्राः । दारेष्वत्यन्तनियमस्तेषां न भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥
तद्वा कथमिति चेत्—

कर्षणशुश्रूषाधिकृतत्वात् ॥ १५ ॥

अनु०—क्योंकि वे कृषि कर्म और दूसरों की सेवा का कार्य करते हैं ॥ १५ ॥
टि०—यहाँ कृषि कर्म से वाणिज्य का भी अर्थ लिया जायगा । निकृष्ट कर्म करने से वैश्य और शूद्र के विवाह भी उसी तरह के अनियमित होते हैं ।

कर्षणं वाणिज्यादीनामुपलक्षणार्थम् । निकृष्ट कर्माधिकृतत्वात्तयोर्विवाहा अपि तादृशा एवेत्यभिप्रायः ॥ १५ ॥

गान्धर्वमप्येके प्रशंसन्ति सर्वेषां स्नेहानुगतत्वात् ॥ १६ ॥

इति बौधायनधर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने विंशः खण्डः ॥ २० ॥

अनु०—कुछ आचार्य सभी वर्णों के लिए गान्धर्व विवाह की अनुमति देते हैं, क्योंकि वह प्रेम के ऊपर आश्रित होता है ॥ १६ ॥

एतद्धि गन्धर्वस्य लक्षणम्—'सकामेन सकामायाम्' इति । तत्र स्नेह मनश्चक्षुषोर्निबन्धः । तदन्वयगतं विहितविवाहकर्म । तथा चाऽऽपस्तम्ब- 'यस्यां मनश्चक्षुषोर्निबन्धस्तस्यामृद्धिर्नेतरदाद्रियेत' इति ॥ १६ ॥


एकविंशः खण्डः

'यथायुक्तो विवाहस्तथायुक्ता प्रजा भवति विज्ञायते ॥ १ ॥


१. See आप. ध. २. २१. ४. ।

१४४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ विवाहाः

अनु०—वेद में यह बताया गया है कि जिस प्रकार के गुणवाला विवाह होता है उसी प्रकार के गुणवाले पुत्र भी होते हैं ॥ १ ॥

प्रशस्ते विवाहे यत्न आस्थेय इत्यभिप्रायः । तथा च सति तत्रोत्पन्नाः पुत्रा अपि साधवो भविष्यन्ति ॥ १ ॥

'अथाऽप्युदाहरन्ति—

साधवस्त्रिपुरुषमार्षाद् दश दैवाद् दश प्राजापत्याद् दश पूर्वान् दशाऽपरानात्मानं च ब्राह्मीपुत्र इति विज्ञायते ॥ २ ॥

अनु०—इस सन्दर्भ में धर्मशास्त्रज्ञ निम्नलिखित पद्य भी उद्धृत करते हैं—
आर्ष विवाह से उत्पन्न साधु आचरण वाले पुत्र तीन पुरुषों को, दैव विवाह से उत्पन्न दस, प्राजापत्य से उत्पन्न दस को तथा ब्राह्म विवाह से उत्पन्न पुत्र दस पूर्ववर्ती, दस परवर्ती पुरुषों को तथा स्वयं को पवित्र करता है ॥२॥

टि०—गोविन्द स्वामी ने इसकी व्याख्या नहीं दी है। ब्यूह्लर ने दो सूत्रों का अनुवाद टिप्पणी में दिया है, क्योंकि उनकी प्रति में इनका अभाव है। उनके अनुवाद का भाव इस प्रकार है : "दैव विवाह से दस सदाचारी पुत्र और पुत्रियां ( उत्पन्न होती हैं ), प्राजापत्य विवाह से दस । वेद में यह कहा गया है कि ब्राह्म विवाह से विवाहित पुत्री का पुत्र दस पूर्वजों, दस वंशजों को और स्वयं को पवित्र करता है ।' प्रथम अंश चिन्त्य है। द्रष्टव्य—गौतमधर्मसूत्र १.४.२४-२७. "पुनन्ति साधवः पुत्राः । त्रिपुरुषमार्षात् । दश दैवाद्दशैव प्राजापत्यात् । दश पूर्वान्दश पराना-त्मानं च ब्राह्मीपुत्राः ।" मेरे अनुवाद सहित संस्करण, पृ० ४५ । इस सूत्र का ब्यूह्लर कृत अनुवाद में 'उत्पन्न होने' का अर्थ संगत नहीं है।

तेनाऽस्मिन्नर्थे ब्राह्मणमपि भवतीत्येतदाह ॥ २ ॥

तदाह—
वेदस्वीकरणशक्तिरप्येवंविधानामेव पुत्राणां भवतीति ॥ ३ ॥

अनु०—वेद को ग्रहण करने की शक्ति भी इसी प्रकार के पुत्रों (आर्ष, दैव, प्राजापत्य तथा ब्राह्म विवाह से उत्पन्न पुत्रों) में ही होती है ॥ ३ ॥

ऋग्ध्येतत् ॥ ३ ॥

आसुरादिविवाहो ब्राह्मणानां निन्द्य इत्याह—

क्रीता द्रव्येण या नारी सा न पत्नी विधीयते ।
सा न दैवे न सा पित्र्ये दासीं तां कश्यपोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥


१. इदमग्रिमं च सूत्रं मूलपुस्तकेषु न स्तः ।

एकविंशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने एकादशोऽध्यायः १४५

अनु०—जो नारी धन देकर खरीदी गयी होती है वह पत्नी नहीं होती । वह न तो दैवकार्यों में सहधर्मिणी हो सकती है और न पित्र्यकर्मों में । कश्यप ने ऐसी नारी को दासी बताया है ॥ ४ ॥

क्रीताया वेदोक्तकर्मण्यधिकारो नास्तीत्यर्थः ॥ ४ ॥
कन्याविक्रयोऽपि न कर्तव्य इत्याह—

शुल्केन ये प्रयच्छन्ति स्वसुतां लोभमोहिताः ।
आत्मविक्रयिणः पापाः महाकिल्बिषकारकाः ॥
पतन्ति नरके घोरे घ्नन्ति चाऽऽसप्तमं कुलम् ।
गमनागमनं चैव सर्वं शुल्को विधीयते ॥ ५ ॥

अनु०—जो अधम व्यक्ति लोभाभिभूत होकर धन लेकर पुत्री को ( विवाह के लिए ) देते हैं, वे स्वयं अपना ही विक्रय करते हैं, अत्यन्त पापी होते हैं, वे घोर नरक में गिरते हैं और अपने वंश की सातवीं पीढ़ी तक को नष्ट कर देते हैं। वे बार-बार जन्म लेते हैं और मरते हैं, ये सभी दोष कन्या के बदले धन लेने पर उत्पन्न बताये गये हैं ॥ ५ ॥

कन्याविक्रयी कुत्सितजन्मभाग्भवति, अधःपाती च । तस्मात्कन्याविक्रयो न कर्तव्य इत्यर्थः ॥ ५ ॥

ब्राह्मादिविवाहोत्पन्नानां पुत्राणां वेदस्वीकरणे शक्तिरित्युक्तम् । तत्राऽविघ्नेन वेदस्वीकरणायाऽनध्ययनप्रकरणमारभ्यते—

पौर्णमास्यष्टकामावास्याग्न्युत्पातभूमिकम्पश्मशानदेशपतिश्रोत्रियैकतीर्थप्रायणेष्वहोरात्रमनध्यायः ॥ ६ ॥

अनु०—पौर्णमासी को, उसके बाद की अष्टमी को, अमावस्या को, गांव में अग्निदाह होने पर, भूमिकम्प होने, श्मशान में जाने पर, देश के राजा, विद्वान् ब्राह्मण, या अपने ही गुरु से विद्या ग्रहण किये हुए सतीर्थ के मरने पर एक दिन और रात के लिए वेद का अनध्याय होता है ॥ ६ ॥

पौर्णमासी तिथिः यस्यां चन्द्रमाः पूर्ण उत्सर्पेत् । अष्टका पौर्णमास्या उपरिष्टादष्टमी । अमावास्या अमा सह सूर्येण यस्यां तिथौ चन्द्रमा भवति सा । अग्न्युत्पातः यस्मिन् ग्रामे गृहदाहस्तस्मिन् ग्रामे । भूमिकम्पो भुजञ्चलनम् । श्मशानं शवशयनम्, शरीरस्य दहनभूमिः निक्षेपभूमिर्वा । तत्र गमनदिवसेऽपि प्रायणं मरणम् । तच्च देशपत्यादिभिः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । देशपती. राजा

१३ बौ० ध०

१४६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ अनध्यायः

तस्य राष्ट्रे वसन् तन्मरणदिवसेऽपि । एकः तीर्थः गुरुः ययोरिति विग्रहः । एतेष्वहोरात्रं नाऽधीयीतेति ॥ ६ ॥

वाते पूतिगन्धे नीहारे नृत्तगीतवादित्ररुदितसामशब्देषु तावन्तं कालम् ॥ ७ ॥

**अनु०—**वेगपूर्वक वायु के बहने, दुर्गन्ध आने, ओस गिरने, नृत्य होने, गीत और वाद्ययन्त्र की ध्वनि सुनाई पड़ने, रोने की ध्वनि आने पर या साम का गान सुनाई पड़ने पर उतने समय तक अनध्याय होता है, जब तक ये घटनायें होती रहती हैं ॥ ७ ॥

वातो वायुः दिवा चेत्पांशुगन्धहरः । नक्तं चेत् कर्णश्रावी । पूतिगन्धो दुर्गन्धः । नीहारो हिमप्रावरणम् । ( तच्च हिमानी ) तत्राऽऽहिमात् तावदनध्यायः । वादित्रं वीणावादनम् । यावदेतानि निवर्तन्ते तावदनध्यायः ॥ ७ ॥

^१स्तनयित्नुवर्षविद्युत्सन्निपाते त्र्यहमनध्यायोऽन्यत्र ^२वर्षाकालात् ॥ ८ ॥

**अनु०—**मेघगर्जन, बिजली की चमक तथा वर्षा के एक साथ होने पर, वर्षाकाल से अन्य समय में तीन दिन का अनध्याय होता है ॥ ८ ॥

स्तनयित्नुर्मेघगर्जितम् । विद्युत्तडित् । अप्रमुष्टमन्यत् ॥ ८ ॥

वर्षाकालेऽपि वर्षवर्जमहोरात्रयोश्च तत्कालम् ॥ ९ ॥

**अनु०—**वर्षाकाल में भी मेघगर्जन और बिजली की चमक साथ-साथ होने पर दूसरे दिन या दूसरी रात के उसी समय तक का अनध्याय होता है ॥ ९ ॥

**टि०—**गोविन्द स्वामी के अनुसार रात्रि या दिन की समाप्ति तक ही अनध्याय होता है ।

वर्षाकालेऽपि विद्युत्स्तनयित्नुसन्निपातेऽहनि चेदास्तमयादनध्यायः । रात्रौ चेद्दोषसः ॥ ९ ॥

^३पित्र्यप्रतिग्रहभोजनयोश्च तद्दिवसशेषम् ॥ १० ॥

**अनु०—**श्राद्ध के अवसर पर दान लेने या भोजन करने पर दिन के शेषभाग में अनध्याय रहता है ॥ १० ॥


१. See. आप. ध. १.११.२३. २. वार्षिकात् इति क. पु.
३. cf. आप. ध. १.११.२२.

एकविंशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने एकादशोऽध्यायः १४७

टि०—गोविन्द के अनुसार जब श्राद्धभोजन का निमन्त्रण प्राप्त हो उसी समय से अनध्याय होता है ।

पितरो देवता यस्य कर्मणस्तत्पित्र्यं, तस्मिन् आमश्राद्धार्थे वा भोजनार्थे वा निमन्त्रणप्रभृत्यनध्यायः ॥ १० ॥

भोजनेऽप्वा¹जरणम् ॥ ११ ॥

**अनु०—**श्राद्धभोजन करने पर जब तक भोजन पच न जाय तब तक अनध्याय होता है ॥ ११ ॥

अनध्याय इत्येव । भोजनपक्ते निमन्त्रणप्रभृत्याजरणमित्यर्थः ॥ ११ ॥

कथं पुनर्भुक्तवत्येव भोजनाभ्युपगममात्रे आमन्त्रणरूपे पाणौ चामश्राद्धेऽनध्याय इत्याशङ्कयाऽऽह—

पाणिमुखो हि ब्राह्मणः ॥ १२ ॥

**अनु०—**क्योंकि ब्राह्मण का हाथ ही उसका मुख होता है ॥ १२ ॥

आमश्राद्धस्याऽप्येतदेव लिङ्गम् ॥ १२ ॥

एतदेव द्रढयितुमाह—

अथाऽप्युदाहरन्ति—

भुक्तं प्रतिगृहीतं च निर्विशेषमिति श्रुतिः ॥ १३ ॥

**अनु०--**इस विषय में निम्नलिखित उद्धृत किया जाता है ।
( श्राद्ध के अवसर पर ) भोजन करने तथा दान ग्रहण करने में कोई अन्तर नहीं है, ऐसा श्रुति का कथन है ॥ १३ ॥

**टि०—**यह समानता का नियम अनध्याय के विषय में ही समझना चाहिए। प्रायश्चित्त के सन्दर्भ में नहीं ।

अनध्यायं एवाऽयमविशेषः । प्रायश्चित्तं तु प्रतिगृहीतेऽर्धमेव 'आमश्राद्धेऽर्धमेव' इति स्मरणात् । भोजनप्रायश्चित्तं च स्मृत्यन्तरादवगन्तव्यम्--

चान्द्रायणं नवश्राद्धे पराको मासिके तथा ।
पक्षत्रये तु कृच्छ्रं स्यात् षाण्मासे कृच्छ्रमेव तु ॥
सपिण्डे तु त्रिरात्रं स्यादेकरात्रं तथाऽब्दिके ॥
दशकृत्वः पिबेदापो गायत्र्या चाऽभिमन्त्रिताः ।
मासि श्राद्धे च तामेव नित्यश्राद्धे जपेच्छतम् ॥ इति ॥ १३ ॥


१. वाजीर्णान्तिम इति.

१४८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ अनध्यायः

पितुर्युपरते त्रिरात्रम् ॥ १४ ॥

अनु०--पिता की मृत्यु होने पर तीन दिन का अनध्याय होता है ॥ १४ ॥
टि०--यह नियम गुरुकुल में अध्ययन करने वाले ब्रह्मचारी के लिए है और यहाँ पिता से तात्पर्य है उपाध्याय से, क्योंकि उपाध्याय को वेद प्रदान करने के कारण पिता ही कहा जाता है। साक्षात् पिता की मृत्यु पर शुद्धिपर्यन्त द्वादश दिन का अनध्याय करना होता है। गोविन्दस्वामी।

उपरते मृते। अनध्याय इत्यनुवर्तते। असमावृत्तस्याऽयम्। समावृत्तस्य त्वशुचिमात्रादेवाऽनध्यायः प्राप्तः। अत्रोपाध्यायमेव वेदप्रदानात् पितेत्याह। साक्षात्पितरि द्वादशाहविधानात्—'मातरि पितर्याचार्य इति द्वादशाहः' १। इति ॥ १४ ॥

कथमयमपि पितेति चेत्तदाह—

'द्वयमु ह वै सुश्रवसोऽनूचानस्य रेतो ब्राह्मणस्योर्ध्वं नाभेर्-
धस्तादन्यत् स यदूर्ध्वं नाभेस्तेन हैतत् प्रजायते यद्ब्राह्मणानुपिनयति
यदध्यापयति यद्याजयति यत्साधु करोति सर्वाऽस्यैषा प्रजा भवति।
अथ यदवाचीनं नाभेस्तेन हास्यौरसी प्रजा भवति तस्माच्छ्रोत्रियम-
नूचानमप्रजोऽसीति न वदन्ति ॥ १५ ॥

अनु०--क्रमपूर्वक वेदाध्ययन करने वाले विद्वान् ब्राह्मण का वीर्य दो प्रकार का होता है—नाभि से ऊपर के भाग में विद्यमान रहने वाला तथा उससे नीचे रहने वाला। नाभि से ऊपर विद्यमान वीर्य से उसके पुत्र होते हैं जिन ब्राह्मणों का वह उपनयन करता है, अध्यापन करता है, यज्ञ कराता है तथा जिन्हें पवित्र बनाता है—ये सभी उसकी सन्तान होते हैं। जो वीर्य नाभि से नीचे होता है उससे शरीर से उत्पन्न होने वाले पुत्र होते हैं। इस कारण वेद के विद्वान् से यह नहीं कहा जाता है कि तुम निःसन्तान हो।

टि०--अनूचान वह है जो वेद का अर्थसहित तथा अंगोंसहित अध्ययन करता है। नाभि के ऊपर विद्यमान रहने वाला वीर्य प्राणवायु है जो मुख में अनेक प्रकार के शब्दों का अभिव्यंजक होता है। इसके द्वारा चार प्रकार के पुत्र होते हैं—जिनका उपनयन करता है, जिनका अध्यापन करता है, जिनका यज्ञ करता है और जिन्हें पवित्र करता है। यही प्रजाओं का श्रेष्ठ जन्म है। इस विषय में आपस्तम्ब का


१. cf. वासिष्ठ ध. २.७–१०

एकविंशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने एकादशोऽध्यायः १४९

कथन है--तच्छ्रेष्ठं जन्म । शरीरमेव मातापितरौ जनयतः इति । इस प्रकार वेद प्रदान करने वाले पिता की मृत्यु होने पर तीन दिन का अनध्याय होता है ।

उह वै इति पदद्वयं त्रयं वा शब्दशोभार्थम् । सुश्रवस इति शृणोतेरौणादि-कोऽसुन् प्रत्ययः । श्रमेण श्रुतवत इत्यर्थः । अनूचानो वेदतदर्थाङ्गाध्यायी । ईदृशस्य ब्राह्मणस्य द्वयं रेतः प्रजननहेतुर्विद्यते । तत्र ऊर्ध्वं नाभेरेकम् । स च प्राणवायुः नाभेरूत्थितो वक्त्रे विचरन् विविधानां शब्दानाभिव्यञ्जकः । अवाचीनो न्यक् । स च नाभेरवाचीनाग्रे उत्पन्नः शुक्रविसर्गे हेतुः वायुः । तत्र ऊर्ध्वाग्रेण रेतसा चतस्रः प्रजा उत्पादयति—उपनयनाध्यापनयाजनसाधु-कृत्याभिः । अस्यैव हीत्थं प्रजा उत्पादयितुं शक्तिरस्ति । एतद्धि प्रजानां श्रेष्ठतरं जन्म । शरीरान्तरेऽप्यनुग्राहकल्वात् । तथा चाऽऽपस्तम्बः—'तच्छ्रेष्ठं जन्म । शरीरमेव मातापितरौ जनयतः' इति । पशुवदेवेत्यभिप्रायः । उक्तं च—'कामं मातापितरौ चैनमुत्पादयतो मिथः' इति । अथ यदवाचीनं नाभेरूस्तेन हाऽ-स्यौरसी प्रजा भवति । यस्मादेवंविधस्य पुरुषस्य चतस्रः प्रजास्सन्ततिः केवलं श्रोत्रियस्याऽध्यापननिमित्ताऽस्ति तस्मादौरस्यभावेऽप्यमुमप्रजोसीति विद्वांसो न वदन्ति । तस्माद्वेदप्रदानपितरि मृते त्र्यहमनध्यायो युक्तः ॥ १५ ॥

यस्मादेवम्—

तस्माद् द्विनामा द्विमुखो विप्रो द्विरेता द्विजन्मा चेति ॥ १६ ॥

अनु०—इस कारण ब्राह्मण के दो नाम, दो मुख, दो प्रकार का वीर्य तथा दो जन्म होते हैं ॥ १६ ॥

द्वे नामनी यस्य स द्विनामा 'तस्माद् द्विनामा ब्राह्मणोऽधुकः' इति श्रुति-मधुकस्संवृद्धः । द्वे चास्य मुखे पाणिरस्यमिति द्विमुखः । द्वे रेतसी शुक्लमॆकं, द्वितीयं ब्रह्म । जन्मनी अपि द्वे माता ब्राह्मणश्च ॥ १६ ॥

अथ प्रकृतमनुसरामः—

शूद्रापपात्रश्रवणसंदर्शनयोश्च तावन्तं कालम् ॥ १७ ॥

अनु०--शूद्र या अपपात्र की ध्वनि सुनाई पड़ती हो या वे दिखलाई पड़ते हों तो उतने समय तक अनध्याय होता है, जितने समय तक उनकी ध्वनि का श्रवण हो या वे दिखलाई पड़ते हों ॥ १७ ॥

'समुच्चितयोरप्यपपात्रनिषेधः । ततश्च कुर्यादतिरोहिते अपपात्रे अनध्या-यम् ॥ १७ ॥


१. सर्वेष्वपि पुस्तकेष्वशुद्धिरेवाऽत्र,

१५० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [अनध्यायः

नक्तं शिवाविरावे नाऽधीयीत स्वप्नान्तम् ॥ १८ ॥

**अनु०—**रात्रि में यदि एक शृगाल का विशेष प्रकार का रुदन सुनाई पड़े तो उस समय तक अनध्याय होता है जब तक सोकर फिर न जागे ॥ १८ ॥

रात्रौ शिवाविरावे वृद्धगोमायुरुते । तच्च विशिष्टरुतम् । तस्मिन् सति सुप्त्वा बुद्ध्वाऽध्येतव्यम् ॥ १८ ॥

अहोरात्रयोः¹स्सन्ध्ययोः पर्वसु च नाऽधीयीत ॥ १९ ॥

**अनु०—**दिन और रात्रि की सन्धियों अर्थात् सन्ध्या और प्रातःकालीन गोधूलि के अवसर पर तथा पर्व दिनों (दोनों अष्टमी तथा दोनों चतुर्दशी) को अध्ययन न करे ॥ १९ ॥

तत्रैका सन्ध्याऽरुणप्रभातमारभ्य आ सूर्योदयदर्शनात् । अपराऽस्तमयादारभ्य आ नक्षत्रोदयात् । पर्वस्विति बहुवचनात् बह्व्यस्तिथयो गृह्यन्ते । एका तावत्पर्वद्वयमध्यगता अष्टमी । उभयोरपि पर्वणोरभितस्तिथिद्वयं चतुर्दशी प्रतिपच्चेति । अतोऽष्टमीद्वयं चतुर्दशीद्वयं प्रतिपद्द्वयं च गृहीतं भवति । चशब्दाद्यस्यां तिथावादित्योऽस्तमेति साऽभिप्रेता । तथा हि—

या तिथिं समनुप्राप्य अस्तं याति दिवाकरः ।
सा तिथिर्मुनिभिः प्रोक्ता दानाध्ययनकर्मसु ॥ इति ॥

तावन्तं कालं सा सा तिथिरित्यर्थः ॥ १९ ॥

पर्वप्रसङ्गादित्थमन्यः पर्वणि नियम उच्यते—

न मांसमश्नीयान्न स्त्रियमुपेयात् ॥ २० ॥

**अनु०—**इन पर्व दिनों को मांस भक्षण न करे और न पत्नीसमागम ही करे ॥ २० ॥

एतदतिक्रमेऽप्यध्ययनविघ्न एव भवतीति कल्प्यते ॥ २० ॥

पर्वसु हि रक्षःपिशाचा²व्यभिचारवन्तो भवन्तीति विज्ञायते ॥ २१ ॥

**अनु०—**श्रुति में कहा गया है कि पर्व दिनों में राक्षस तथा पिशाच मनुष्यों को हानि पहुंचाने के लिए विचरण करते रहते हैं ॥ २१ ॥

**टि०—**पर्व दिनों में राक्षस और पिशाच ही मांस भक्षण करते हैं तथा संभोग-रत होते हैं, अतः मनुष्यों को इन कर्मों से उन दिनों विरत रहना चाहिए, अन्यथा राक्षस और पिशाच बाधा का अनुभव कर मनुष्यों को हानि पहुँचाते हैं । गोविन्दस्वामी ।


१. सन्धयोः इति इ पु.
२. "व्यतिचारवन्तः" इति. इ. ई. ख. पुस्तकेषु ।

एकविंशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने एकादशोऽध्यायः १५१

श्रुतिरेवेत्यभिमानिना विज्ञायत इति गमयति । पर्वसु रक्षांसि पिशाचाश्च व्यभिचारवन्तः । वि वैविध्ये, अभीत्याभिमुख्ये. चरतिः गमने भक्षणे च वर्तते । पर्वसु विविधं गच्छन्ति विविधं भक्षयन्ति च । पर्वसु स्त्र्यभिगमन-मांसाशनवन्तइत्यर्थः । तद्यदि मनुष्या अपि कुर्युः तान् रक्षःपिशाचाः बाधन्ते । अतोऽस्मादेव भया^१न्निवर्तितव्यम् ॥ २१ ॥

प्रकरणार्थमेवाऽनुसरति—

अन्येषु चाद्भुतोत्पातेष्वहोरात्रमनध्यायोऽन्यत्र मानसात् ॥२२॥

**अनु०—**अन्य प्रकार के अद्भुत उत्पातों के होने पर भी रात्रि-दिन का अनध्याय होता है, किन्तु मन से वेद का अध्ययन किया जा सकता है ॥ २२ ॥

**टि०—**उपर्युक्त अनध्याय विषयों में मानस अध्ययन का निषेध नहीं है, किन्तु कुछ अन्य अवसर है जब मानस अध्ययन भी निषिद्ध है ।

अद्भुतमाश्चर्यम् । यथा अम्बुनि मज्जन्त्यलाबूनि, ग्रावाणः प्लवन्ते, जले चाऽग्न्युद्भवोऽग्नौ पत्रोद्भवः इत्याद्युत्पातः । परार्थं विपर्ययप्रदर्शनम् । यथा स्थावरस्य देशान्तरगमनं प्रतिमारोदनरुधिरस्रवणादि । यद्वा—षष्ठीतत्पुरुषोऽ-यमद्भुतोत्पातेष्विति । अन्येषु चाद्भुतोत्पातेष्विति । एतेष्वहोरात्रमनध्यायो-ऽन्यत्र मानसाद्ध्यायनात् । मानसाध्ययनविशिष्ट एव सर्वानध्यायविशेषो द्रष्टव्यः । क्वचिन्मानसेऽपि निषेधदर्शनात् । यथा—

उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्रे च विसर्जयन् ।
उच्छिष्टश्राद्धभुक्त चैव मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥ इति ॥

मानसेऽपि जननमरणयोरनध्यायः ॥ २३ ॥

**अनु०—**जन्म और मरण के अवसर पर मानस वेदाध्ययन भी नहीं करना चाहिए ॥ २३ ॥

अपिशब्दाद्वाचिकेऽपि । जननमरणग्रहणं सर्वेषामात्माशुचिभावानामुपल-क्षणम् । तथा च स्वाध्यायब्राह्मणम्—'तस्य वा एतस्य यज्ञस्य द्वावनध्यायौ यदात्माऽशुचिर्यद्देशः' इति ॥ २३ ॥

'अशुचिर्नाऽधीयीत' इति यदुक्तं तद्वाचिकस्यैव, मा विज्ञायीति ज्ञापनार्थं विनिन्दन्ति—

अथाऽप्युदाहरन्ति—

हन्त्यष्टमी ह्युपाध्यायं हन्ति शिष्यं चतुर्दशी ।


१. न कर्तव्यं क. गु.

१५२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ अनध्यायाः

हन्ति पञ्चदशी विद्यां तस्मात्पर्वाणि वर्जयेत् ॥२४ ॥

अथाऽतः प्रायश्चित्तानि ।

'यथायुक्तो विवाहः । अष्टौ विवाहाः । क्षत्रियवध गोसहस्रम् । षड्भागभृतो राजा रक्षेत् । रथकाराम्बष्ठ । चत्वारो वर्णाः । उत्तरत उपचारो विहारः । मृन्मयानां पात्राणाम् । शुचिमप्लवं देवा जुषन्ते । अभक्ष्याः पशवो ग्राम्याः । सपिण्डेष्वादशाहम् । गोचर्ममात्रम् । नित्यं शुद्धः कारुहस्तः । अथाऽतश्शौचाधिष्ठानम् । कमण्डलुद्विजातीनाम् । अथ कमण्डलुचर्यामुपदिशन्ति । अथ स्नातकस्य । घमार्थौ यत्र न स्याताम् । अष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि । पञ्चधा विप्रतिपत्तिः । उपदिष्टो धर्मः प्रतिवेदम् ॥

इति बौधायनीये धर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने एकविंशः खण्डः ॥

अनु०—इस विषय में निम्नलिखित पद्य उद्धृत किया जाता है अष्टमी को अध्ययन करना उपाध्याय का ही नाश करता है, चतुर्दशी का ( अध्ययन ) शिष्य का ही विनाश करता है, पंचदशी विद्या का ही नाश करती है, इस कारण इन पर्व दिनों पर अनध्याय नहीं करना चाहिए ॥ २४ ॥

उपाध्यायहनने तदलाभकृतो विघ्नो लक्ष्यते । एवं शिष्यहननेनाऽपि तदध्येत्रभावकृतः । विद्याहननेनाऽपि पुरुषान्तरनैरपेक्ष्याभावो लक्ष्यते । अन्योऽप्यध्ययनविघ्नसद्भावो द्रष्टव्यः । अत्यन्तनिःश्रेयसत्वादध्ययनस्य विघ्नसन्ततिरवश्याम्भाविनी । सा च तद्वर्जनेनैव परिहरणीया तथा चोक्तम्—'श्रेयांसि बहुविघ्नानि' इति ॥ २४ ॥

इति बौधायनीयधर्मसूत्रविवरणे गोविन्दस्वामिकृते प्रथमप्रश्ने
गृह्यसूत्रे चतुर्दशप्रश्ने एकादशोऽध्यायः ।
प्रथमः ( गृह्यसूत्रे चतुर्दशः ) प्रश्नः समाप्तः


१. इमानि सूत्रैकदेशरूपाणि तत्तत्खण्डप्रतीकरूपाणि प्रश्नसमाप्त्यनन्तरमध्येतृ-सम्प्रदायेऽधीयन्ते प्रातिलोम्येन । तदनुसारेण मूलपुस्तकेषु लिखितानीत्यत्राऽपि मूल-सूत्रानन्तरं सम्प्रदायाविच्छेदाय लिखितानि ।

अथ द्वितीयः प्रश्नः

प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः

ब्रह्महत्यादिषु दण्ड उक्तः 'अवध्यो वै ब्राह्मणस्सर्वापराधेषु' इत्येवमादिना—

अथातः प्रायश्चित्तानि ॥ १ ॥

अनु०—अब हम प्रायश्चित्तों का वर्णन करेंगे ॥ १ ॥

वक्ष्याम इति शेषः । विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवानिमित्तदोषफलं यैः कर्मभिः नाऽनुभुङ्क्ते तानि प्रायश्चित्तानि । ^१तत्राऽपराघिनोऽननुतापिनो बलादानीतस्य दण्डप्रायश्चित्तयोरुसमुच्चयः । ^२स्वयमेवाऽऽगत्य राज्ञे निवेद्यमानस्य दण्ड एव । यः पुनरनुतापेन प्रायश्चित्तमनुतिष्ठति तस्य तेनैव भवितव्यम् । एनोभूयस्त्वेव कमनियम हेतुः ॥ १ ॥

इदमत्र प्रथमं ब्रह्मघ्नं आह—

भ्रूणहा द्वादश समाः ॥ २ ॥

अनु०—विद्वान ब्राह्मण की हत्या करने वाला बारह वर्षों तक निम्नलिखित प्रायश्चित्त करे ॥ २ ॥

टि०—भ्रूण का अर्थ है यज्ञ और भ्रूण और यज्ञ को धारण करने वाले विद्वान ब्राह्मण का वध करने वाला भ्रूणहा कहा गया है ।

भ्रूणं यज्ञं बिभर्त्ति पाति नयतीति तत्साधनवधकारी भ्रूणहा ब्रह्महेति यावत् । समाः संवत्सरान् । वक्ष्यमाणव्रतं चरेत् ॥ २ ॥

तदाह —

कपाली खट्वाङ्गी गर्दभचर्मवासा अरण्यनिकेतनः श्मशाने ध्वजं शवशिरः कृत्वा कुटीं कारयेत्तामावसेत् सप्ताऽगारणि भैक्षं चरेत् स्वकर्माऽऽचक्षाणस्तेन प्राणान्धारयेदलब्धोपवासः ॥ ३ ॥

अनु०—कपाल (खोपड़ी) लेकर, चारपाई का एक पाया (दण्ड के स्थान पर) लेकर, गदहे का चर्म धारण कर, वन में निवास करते हुए, श्मशान में मनुष्य की खोपड़ी को ध्वजा की तरह धारण करते हुए, कुटी बनावे और उसी में निवास


१. अनुपतापिना इति ग. पु.
२. यस्तु स्वयमेवागत्य राज्ञे निवेदयेत् तस्य दण्ड एव इति ग. पु.

१५५ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ प्रायश्चित्तम्

करे। अपने पाप कर्म की घोषणा करते हुए केवल सात घरों से भिक्षा मांगे, जो कुछ मिले उसी से जीवन धारण करे और कुछ भी भोजन न प्राप्त होने पर उपवास करे ॥ ३ ॥

टि०—भिक्षा मांगते समय खोपड़ी को चिह्न के रूप में धारण करे। यह खोपड़ी उस व्यक्ति की हो जिसकी हत्या की हो अथवा किसी अन्य मृतव्यक्ति की भी हो सकती है। 'ब्रह्महा अस्मि' अथवा 'ब्रह्मघ्ने भिक्षां देहि' कहकर भिक्षा मांगे। इस प्रकार बारह वर्ष तक का प्रायश्चित्त करे। यह प्रायश्चित्त ब्राह्मण का ब्राह्मण द्वारा हत्या के प्रसंग में है।—गोविन्द स्वामी।

खट्वाया अङ्गं पादादि तद्दण्डार्थं भवति। गर्दभस्य चर्म वासो यस्य स तथोक्तः। अरण्यमस्य निकेतनं विहरणदेशः; चङ्क्रमणदेश इति यावत्। श्मशानं निरुक्तम्। तत्र कुटीं कारयेदिति सम्बन्धः। शवस्य शिरो ध्वजं चिह्नं कुर्यात् भिक्षाकाले—यं हत्वा एतच्चरति तस्य शिर इति। यस्य कस्य चिदित्यन्ये। तथा च सति शवग्रहणमकिञ्चित्करं स्यात्। स्वकर्माऽऽचक्षणः—'ब्रह्महाऽहमस्मीति' 'ब्रह्मघ्ने भिक्षां देही'ति ब्रुवन् भिक्षां चरन्नपि यदि भिक्षां सप्तागारेष्वपि न लभेत तदोपवासः कार्यः। तामेव कुटीमधिवसेत्। एवं द्वादश समाश्चरन् पूतो भवति। ब्राह्मणाधिकारिकमिदं प्रायश्चित्तम्। यत्तत्सुमन्तुराह—'ब्राह्मणो ब्राह्मणं हत्वा' इति ॥ ३ ॥

अधुना द्वादशवार्षिकस्य व्रतस्य प्रायश्चित्तान्तरमाह—

अश्वमेधेन गोसवेनाऽग्निष्टुता वा यजेत ॥ ४ ॥

अनु०—अथवा अश्वमेध, गोसव, और अग्निष्टुत यज्ञ करे ॥ ४ ॥

टि०—अश्वमेध का विधान विशेष रूप से राजा के लिए किया गया है।

आहिताग्नेरिष्टप्रथमसोमस्य एतयोः प्रायश्चित्तसमाधानं कार्यम्। अश्वमेधस्तु राजयज्ञत्वात् 'राजा विजितसार्वभौमः' इत्येवं विशिष्टस्य राज्ञो भवति॥४॥

अश्वमेधावभृथे वाऽऽत्मानं प्लावयेत् ॥ ५ ॥

अनु०—अश्वमेधयज्ञान्त स्नान में अपने को जल में अथवा आप्लुत करे ॥ ५ ॥

अन्यस्याऽप्यश्वमेधावभृथे वा आत्मानं स्नापयेत्। एतानि प्रायश्चित्तानि हन्तृगुणापेक्षया हन्यमानगुणापेक्षया वा विकल्प्यन्ते ॥ ५ ॥

अथाऽप्युदाहरन्ति—

अमत्या ब्राह्मणं हत्वा दुष्टो भवति धर्मतः।
ऋषयो निष्कृतिं तस्य वदन्त्यमतिपूर्वके।