बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १३
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १३
'गङ्गायमुनयोरन्तरमित्येके ॥ ११ ॥
अनु०—कुछ आचार्यों के अनुसार गंगा और यमुना नदियों के बीच का भूप्रदेश आर्यावर्त है ॥ ११ ॥
आर्यावर्तत्वे विकल्पः ॥ ११ ॥
अथाऽप्यत्र भाल्लविनो गाथामुदाहरन्ति ॥ १२ ॥
अनु०—इस सम्बन्ध में भाल्लविन् शाखा के अनुयायी एक गाथा भी उद्धृत करते हैं ॥ १२ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी की टीका में भाल्लवियों को सामवेद की एक शाखा का बताया गया है ।
आर्यावर्तान्तरप्रदर्शनार्थं भाल्लविनः छन्दोगविशेषाः । गाथा श्लोकः ॥१२॥
तमाह—
पश्चात् सिन्धुर्विसरणी सूर्यस्योदयनं पुरः ।
यावत्² कृष्णो विधावति तावद्धि ब्रह्मवर्चसमिति ॥ १३ ॥
अनु०—पश्चिम में लुप्त होनेवाली नदी पूर्व में सूर्य के उदय का स्थान —इनके बीच जहाँ तक कृष्णमृग पाया जाता है, वहाँ तक ( अध्ययन, ज्ञान, अनुष्ठान से उत्पन्न ) ब्रह्मतेज भी पाया जाता है ॥ १३ ॥
टि०—'सिन्धुः विसरणी' का सामान्यतः लुप्त होनेवाली नदी अर्थ किया गया है, किन्तु 'विकरणी' या 'विकरण' पाठ भी मिलता है जिसका अर्थ विभाजन करनेवाली नदी है । 'सिन्धु-विसरणी' से सरस्वती का अर्थ लेना अधिक संगत प्रतीत होता है ।
कृष्णः कृष्णमृगः । ब्रह्मवर्चसं अध्ययनज्ञानानुष्ठानाभिजनसम्पत् । म्लेच्छ-देशस्त्वतः परम् ॥ १३ ॥
तदाह-
अवन्तयोऽङ्गमगधाः सुराष्ट्रा दक्षिणापथाः ।
उपावृत्सिन्धुसौवीरा एते संकीर्णयोनयः ॥ १४ ॥
१. अस्य च मूलम्—तैत्तिरीयारण्यके द्वितीयप्रपाठकान्तिमानुवाकस्यं "नमो गङ्गायमुनयोर्मुनिभ्यश्च नमः" इति वाक्यमिति विभावयामः ॥
२. कृष्णा विधावन्तीति क. पु. अत्र वासिष्ठान्यपि सूत्राणि प्रायश इमान्येवा-ऽनुकुर्वन्ति ।
१४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ अगम्यदेशाः
**अनु०—**अवन्ति, अङ्ग, मगध, सुराष्ट्र, दक्षिणापथ, उपावृत्, सिन्धु देशों के निवासी तथा सौवीर संकीर्णयोनि (मिश्रित उत्पत्तिवाले) होते हैं ॥ १४ ॥
**टि०—**इस गाथा का भाव यह है कि इन देशों में जो नियम या आचार प्रचलित है वे प्रामाणिक नहीं हैं, क्योंकि इन देशों के निवासियों की उत्पत्ति शुद्ध नहीं है।
^१स्त्रीषु व्यवस्था नाऽस्तीति यावत् । अवन्त्यादिषु कल्याणचारो नाऽस्ति ॥ १४ ॥
किञ्च–केचिद्देशाः प्रवेशार्हा अपि न भवन्ति । तत्प्रवेशे प्रायश्चित्तविधा-नात् । तत्र दूरोत्सारितमाचारग्रहणमित्याह—
आरट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान् वंगान् कलिङ्गान् प्रानूनानिति च गत्वा पुनस्तोमेन यजेत सर्वपृष्ठया वा ॥ १५ ॥
**अनु०—**आरट्ट, कारस्कर, पुण्ड्र, सौवीर, वंग, कलिग, प्रानून—इनमें से किसी प्रदेश की यात्रा करने पर (प्रायश्चित्तस्वरूप) पुनस्तोम या सर्वपृष्ठा इष्टि करनी चाहिए ॥ १५ ॥
**टि०—**इस सूत्र के अनुसार उपर्युक्त प्रदेशों में प्रवेश करना पापजनक या दोष का कारण होता है और उसके लिए प्रायश्चित्त करना होता है । अवन्ती प्रयाग से पश्चिमोत्तर प्रदेश, अंग पूर्वी बंगाल, मगध बिहार, सौराष्ट्र दक्षिणी काठियावाड़ का प्रदेश है । सौवीर सम्भवतः पश्चिमी-दक्षिणी पंजाब के निवासी थे ।
आरट्टों का निवासस्थान पंजाब था, कारस्कर सम्भवतः दक्षिण भारतीय थे । कलिग कृष्णा नदी के मुहाने और उड़ीसा के बीच का प्रदेश है । उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण ७।१८ में तथा महाभारत में भी है । इस विषय में ब्यूह्लैर के अंग्रेजी अनुवाद की टिप्पणी द्रष्टव्य है ।
^२पुनस्तोमो नाम एकाहः । इष्टप्रथमसोमस्यैव प्रायश्चित्तमेकाहकाण्डोक्तं द्रष्टव्यम् । 'यदि पद्धयामेव विशेषं कुर्वीतैष ह वै पद्धयां पापं करोत्यारट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान् वा गच्छति' इति । ^३सर्वपृष्ठेष्टिस्त्वाहिताग्नि-
१. स्त्रीपुंसयोरिति, ग. पु.
२. अथैष पुनस्तोमः “यो बहु प्रतिगृह्य गरगीरिव मन्येत स एतेन यजेत” ( तां. ब्रा. १९.४. १) ( का. श्रौ. २२.१०.१६) इत्यनेन यो विहितस्सोमयाग एकाहा-त्मकः सः । एकसुत्याकस्सोमयाग एकाह इत्युच्यते ।
३. बृहत्, रथन्तर वैरूप, नैराज, शाक्वर, रैवताख्यानि, षट् सामानि पृष्ठाख्य-स्तोत्रसाधनभूतानि । तत्प्रतिपाद्यगुणविशिष्ट इन्द्रो देवताऽस्या इष्टेरिति कृत्वा इष्टि-रियं सर्वपृष्ठेष्टिरिति कथ्यते ।