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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३०९

द्वितीयः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३०९

शिष्टों ने जिसका आचरण किया है वह शौच दो प्रकार का बताया गया है। दुर्गन्ध तथा अपवित्र वस्तुओं के लेप को दूर करना बाह्य शौच है तथा किसी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना अन्तः शौच है ॥ २३ ॥

द्विविधस्याऽप्युदाहरणमाह—
'अद्भिश्शुद्ध्यन्ति गात्राणि बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यतीति ।
अहिंसया च भूतात्मा मनस्सत्येन शुद्ध्यतीति ॥ २४ ॥

इति तृतीयप्रश्ने प्रथमः खण्डः॥

**अनु०—**शरीर के अंगों की शुद्धि जल से होती है और बुद्धि की शुद्धि ज्ञान से होती है। अहिंसा से आत्मा की शुद्धि होती है और सत्य से मन शुद्ध होता है ॥२४॥
व्याख्यातश्लोकः । अन्तश्शौचमहिंसनमित्येतद्विधानपरोऽयं प्रपञ्चः ॥ २४ ॥

इति श्रीगोविन्दस्वामिकृते बौधायनधर्मविवरणे
तृतीयप्रश्नेऽप्रथमोऽध्यायः ।


तृतीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः

द्वितीयः खण्डः

अथोक्ता वृत्तीरानुपूर्व्येणाऽनुक्रमं विवृणोति—
यथो एतत् षण्णिवर्तनीति ॥ १ ॥

**अनु०—**षण्णिवर्तनी वृत्ति के नियम इस प्रकार होते हैं ॥ १ ॥

यथो एतदिति निपातः उक्तानुभाषणार्थः 'यथा एतद्हुतः प्रहुत आहुतः' इति । यथा वा 'यथो एतदेकस्य सतः' इति । नवानां वृत्तीनां षण्णिवर्तनेति या प्रथमं पठिता तां विवरिष्यामीत्यर्थः ॥ १ ॥

षडेव निवर्तनानि निरुपहतानि करोति स्वामिने भागमुत्सृजत्य-
नुज्ञातं वा गृह्णाति । प्राक्प्रातराशात्कर्षी स्यादास्यूतनासिकाभ्यां समु-
ष्काभ्यामतुदन्नारया मुहुर्मुहुरभ्युच्छन्दयन् । एतेन विधिना षण्णिवर्त-
नानि करोतीति षण्णिवर्तनी ॥ २ ॥


१. See मनु ५. १०९.

३१०बौधायन-धर्मसूत्रम्[ वृत्त्युपायाः

**अनु०—**बिना जोती हुई छः निवर्तनं भूमि में खेती करे। भूमि के स्वामी को भाग देकर अपना अंश ग्रहण करे अथवा खेत के स्वामी की आज्ञा होने पर सम्पूर्ण अंश स्वयं ग्रहण करे। प्रातःकालीन भोजन की वेला से पहले ही ऐसे बैलों से जिनकी नाक में छेदकर रस्सी न पिन्हाई गयी हो और जिन्हें बधिया न किया गया हो, कोड़े या डण्डे का प्रयोग किये बिना, बार-बार पुचकारते-दुलारते हुए जुताई करे। इस विधि से छः निवर्तनं भूमि में कृषि कर्म करने वाला षण्णिवर्तनी कहलाता है॥ २॥

निवर्तनं नाम भूम्याः कर्षणं कृषीबलानां प्रसिद्धम्-इयदेकं निवर्तनमिति। निरुपहतं अकृष्टक्षेत्रं षट्संख्याविशिष्टानि निवर्तनान्यकृष्टक्षेत्राणि समापाद-यन्तीत्यर्थः। तत्र निष्पन्नौषधेरयं विशेषः—स्वामिने भागमित्यादि। भूस्वा-मिने भागोंऽशः परक्षेत्रविषयमेतत्। सामर्थ्यात् स चेदनुजानीयात्सर्वं स्वयमेव गृह्णीयात्। स्वक्षेत्रेषु नाऽयं विधिः स्वक्षेत्रत्वात्। आपदुपायोऽयम्। प्राक्प्रातरित्यादि व्याख्यातम्। एतेन विधानेन षण्णिवर्तनीशब्दं व्युत्पाद-यन्नुपसंहरति॥ २॥

कथं कौद्दालीत्याह—

कौद्दालीति जलाभ्याशे कुद्दालेन वा फालेन वा तीक्ष्णकाष्ठेन वा खनति बीजान्यावपति कन्दमूलफलशाकौषधीर्निष्पादयति। कुद्दा-लेन करोतीति कौद्दाली ॥ ३ ॥

**अनु०—**कौद्दाली वृत्ति का अनुसरण करने वाला किसी जलाशय के समीप कुदाल से, फाल से या नुकीले लकड़ी के टुकड़े से भूमि को खोदे और उसमें बीज बोकर कन्द, मूल, फल, शाक, ओषधि उत्पन्न करे। इस प्रकार कुद्दाल से भूमि खोद कर उससे उत्पन्न वस्तुओं से जीविका-निर्वाह करने वाला कौद्दाली होता है॥ ३॥

अभ्याशे समीपे अपरिग्रहे। कुद्दालमयौमुखं काष्ठम्। फालमायस्यं खनित्र-मिति यावत्। तीक्ष्णाग्रं काष्ठं प्रसिद्धम्। एतेषां सम्भवापेक्षो विकल्पः खनति विखनति। ततो बीजान्यावपति कन्दादीनाम्। कन्दमामोपयोग्यम्। मूलं पक्कोपयोग्यम्। अन्यत्प्रसिद्धम्॥ ३॥

तृतीया वृत्तिः ध्रुवा। तामाह—

ध्रुवायां वर्तमानश्शुकलेन वाससा शिरो वेष्टयति—"भूत्यै त्वा शिरो वेष्टयामी" ति ॥ ४ ॥

**अनु०—**ध्रुवा वृत्ति से जीविका निर्वाह करने वाला श्वेत वस्त्र से शिर को