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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७५

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७५

**अनु०—**स्थूल, अनियन्त्रित चित्त वाला, शब्द करने वाला या गानप्रिय, बैलों के सहारे जीविका चलाने वाला, प्राणियों को आघात पहुँचाने वाला, तीखे स्वभाव-वाला तथा स्वच्छन्द बोलने वाला, दुर्बलों को कष्ट देने वाला और अणुवत् क्षुद्र व्यक्ति निःसन्देह कदापि देवों के लोक को नहीं पहुँचते, किन्तु वहीं जाते हैं जहाँ उत्पन्न होते हैं अर्थात् इस लोक में ही चक्कर काटते रह जाते हैं ॥ ३२ ॥

**टिप्पणी—**उपर्युक्त अनुवाद गोविन्दस्वामी की व्याख्या के अनुसार है । व्यूह्लेर ने अन्तिम पंक्ति 'कृशास इत्यणवः तत्र यान्ति' को भिन्न वाक्य के रूप में ग्रहण किया है और इस अर्थ में अनुवाद किया है : 'किन्तु जो (तपस्या एवं व्रत से दुर्बल बनकर) अणुओं के समान हल्के हैं वे वहाँ जाते हैं।' इस प्रकार व्यूह्लेर ने 'कृशासः इत्यणवः' बहुवचन को यान्ति के साथ जोड़ा है। गोविन्द स्वामी के अनुसार 'कृशासः' का अर्थ है दुर्बलों को पीड़ित करने वाला (कृशान् दुर्बलान् अशक्तान् अस्यति क्षिपति बाधते इति कृशासः । इसी प्रकार 'अणवः' का अर्थ है क्षुल्लकाः क्षुद्रा इत्यर्थः । किन्तु यहाँ एकवचन तथा बहुवचन का अन्तर विशेष रूप से द्रष्टव्य है । संभवतः 'अणवः तत्र यान्ति' को अलग वाक्य मानकर 'अणु के समान हल्के व्यक्ति ही वहाँ अर्थात् देवलोक को जाते हैं' ऐसा अर्थ करना अधिक संगत होगा। 'पीवरः' से 'अणवः' का विपर्यास भी उचित ही है। गोविन्द स्वामी के अनुसार इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार होगी। पीवरः-दूसरे के मांस से अपने मांस की वृद्धि करने वाला; असंयतात्मा—असंयत बुद्धि वाला, निषिद्ध कर्म में प्रवृत्ति रखने वाला, मन को संयत करने में असमर्थ; रोरूयमाणः-नरगानप्रिय, गन्धर्वविद्या आदि गाने बजाने में मन रमाने वाला; ककुदी—ककुदी अर्थात् बैल से जीविका चलाने वाला; चलत्तुन्दी=चलतः प्राणिनः यस्तुदति हिनस्ति, प्राणियों को जो कष्ट पहुँचाता है, मारता है, प्राणिघातक, रभसः--तीक्ष्ण, वाणी, शरीर, कर्म में उग्र या तीक्ष्ण; कामवादी-यथेष्ट बोलने वाला, बेमतलब अविचारित भाषण करने वाला ।

पीवरोऽतिपीनः परमांसेन स्वमांसं वर्धयन् । आह च मनुः—

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्य पितॄन् देवान् ततोऽन्योऽस्त्यपुण्यकृत् ॥ इति ॥

प्यायतेर्वृद्धिकर्मण औणादिकः क्त्वरच्प्रत्ययः । असंयतात्मा असंयतबुद्धिः निषिद्धकर्माभिमुखं मनो निरोद्धुमक्षम इत्यर्थः । रोरूयमाणः रौतेश्शब्दकर्मणः क्रियासमभिन्याहारे यङ्प्रत्ययो द्रष्टव्यः । नरगानप्रियः गान्धर्वादिष्वासक्तमना इत्यर्थः । ककुदी ककुद्वान् स च बलीवर्दः, तदुपजीवीत्यर्थः । चलत्तुन्दी चलतः प्राणिनो यस्तुदति हिनस्ति तदुपजीवीत्यर्थः ।

७६बौधायन-धर्मसूत्रम्[स्वेच्छाचारनिन्दा

प्राणिघातक इति यावत् । यद्वा चलत्तुन्दो चलदुदरः । उदरपूरणपरायणः । रभसस्तीक्ष्णो वाक्कायकर्मभिः दीर्घवैरी वा । कामवादी यथेष्टवादी निर्विशङ्कमसदृश्यं च यो भाषते । कृशासः कृशान् दुर्बलानशक्तानस्यति क्षिपति बाधते इति कृशासः । इतिशब्दः प्रकारवचनः । अणवः क्षुल्लकाः क्षुद्रा इत्यर्थः । एते देवान्न समश्नुवते । किं तर्हि कुर्वन्ति ? तत्र यान्ति यत्र जाताः, इहैव परिभ्रमन्तीत्यर्थः ॥ ३२ ॥

असंयतात्मेत्युक्तम्, तत्राऽपवादमाह—

यद्यौवने चरति विभ्रमेण सद्धाऽसद्वा यादृशं वा यदा वा ।
उत्तरे चेद्वयसि साधुवृत्तस्तदेवाऽस्य भवति नेतराणि ॥३३॥

अनु०— जो पुरुष युवावस्था में भूल करता हुआ जिस प्रकार का जहाँ भी अच्छा या बुरा कर्म करता है वह यदि उसके बाद की अवस्था में उत्तम आचरण करता है तो वह उत्तम आचरण ही पुण्य फल उत्पन्न करने वाला होता है, पूर्व अवस्था के दूसरे कर्मों का कोई फल नहीं होता ॥ ३३ ॥

टि०— यह सूत्र स्पष्टतः अधिक उदारवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है । युवावस्था में पथभ्रान्त होकर, विभ्रमवश मनुष्य जो कुछ भला-बुरा कर्म करता है उन कर्मों का उस समय कोई फल नहीं रह जाता जब वह युवावस्था के बाद उत्तम आचरण अपना लेता है । इस प्रकार युवावस्था में किये गये प्रतिषिद्ध कर्मों को पुनः न करना भी स्वतः प्रायश्चित्त है । यौवन में व्यामोह का प्राधान्य रहता है, अतः मनुष्य कर्म के उचित अनुचित स्वरूप का या समय का ठीक निर्णय नहीं कर पाता और स्वभावतः निषिद्ध कर्म करता है, किन्तु सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो भूला हुआ नहीं समझा जाता ।

उत्तरं वयः पञ्चाशद्वर्षादुपरि एतस्योर्ध्वम् । आचार्याभिमतं 'ऊनषष्टेश्च वर्षेभ्यो ह्यष्टाभ्यश्च मासेभ्यः' एतस्मादर्वाग्यौवनम् । सद्धाऽसद्वेति विहितप्रतिषिद्धोभयाभावः । यादृशं वेति प्रकारानियमः । यदा वेति कालानियमः । अयमत्राऽर्थः—यौवनोद्धतः पुरुषो व्यामोहात्पूर्वस्मिन् वयसि साध्वसाधु वाऽत्यन्तनिकृष्टमपि कर्म यदा आचरति, स चेदुत्तरस्मिन् वयसि साधुवृत्तः कल्याणाचारो भवति प्रतिषिद्धं परिहाप्य स्वविहितमनुतिष्ठति तदेवाऽस्य फलदं भवति नेतराणि दुष्कृतानि पूर्ववयोऽनुष्ठितानि । अनेन च प्रायश्चित्तारूपत्वं स्थापितं भवति । न पुनरकरणमेव प्रायश्चित्तस्य ॥ ३३ ॥

तदाह—

शोचेत मनसा नित्यं दुष्कृतान्यनुचिन्तयन् ।